शनिवार, 21 जून 2008

सुबह का भुला

सुबह का भूला

मैंने सालों पहले पंडित संपूर्णानन्द से गुस्से में कहा था - ”पण्डितजी, आपने मुझे बेकार में मारा। मैं आपको देख लूंगा आप बिरादरी वालों की तरफदारी करते हैं। आपके लिए यह शोभा नहीं देता।“
तब मेरे हिन्दी के शिक्षक संपूर्णानन्द बिफर कर बोले -”नालायक! मुझसे जुबान लड़ाता है। अरे मूर्ख, इसके साथ तू क्या मुकाबला करता है ? ये नहीं भी पढ़ेगंे तो भी इनका पिता इतनी दौलत छोड़ जाएगा कि ये आराम से जिंदगी बिता लेंगे। यदि तू नहीं पढ़ा तो तू किसी के खेत जोतेगा या फिर सड़क पर मारा-मारा फिरेगा।“ पण्डित जी ने कक्षा के अन्य लड़कों की ओर इशारा करते हुए कहा।
मैं अपमानित हो उठा। लड़के मुझे देखकर हंस रहे थे। मुझे समझ में नहीं आता था कि पण्डित जी मेरे पीछे क्यों पड़ गये थे।
गांव के स्कूल में सालों बाद हम तीन लड़के हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी से पास हुए थे। मैंने स्कूल में सबसे ज्यादा अंक पाए थे। शायद इसीलिए पण्डित जी मुझसे नाराज थे। आखिर दूसरी जात का लड़का सबसे ऊँचा स्थान कैसे प्राप्त कर सकता है ? यही विचार शायद पण्डितजी को कचोटता था। उनको कितनी ईष्र्या थी मुझसे। मैं सदा यही सोचता रहता।
मैं पण्डितजी की मार से परेशान था। छोटी-छोटी बातों में वे मुझे मारा करते। कक्षा में सबसे पहले मेरा गृहकार्य देखा जाता। कभी-कभी तो हद ही हो जाती थी। पण्डित जी दूसरे विषयों में अंक कम आने पर भी मुझे मारते थे। बस उनको तो किसी बहाने की तलाश रहती थी।
एक दिन मैंने घर मेंे जिद ठान ली और अपने पिता से कहा- ”बापू, मैं भी आपके साथ काम पर जाऊँगा। मुझे स्कूल में अब नहीं पढ़ना है। पण्डित जी की मार खाते खाते मैं परेशान हो गया हूँ। हम दूसरी जाति के हैं न, इसीलिए पण्डितजी नहीं चाहते कि मैं पढूँ।“
बापू मेरी बात सुनकर अवाक रह गये। उनके अनुसार आखिर ऐसा हो ही कैसे सकता था ? पण्डित जी ने ही तो एक दिन कहा था - ”सुन भैया पालीराम, तुम्हारा बेटा बहुत बुद्विमान है। इसकी पढ़ाई का ध्यान रखना। यह तुम्हारा नाम रोशन करेगा।“
बापू ने कुछ देर सोचकर मुझसे कहा - ”बेटा, ऐसा सोचना ठीक नहीं है। वे बुरे आदमी नहीं है। तुमने जात-पांत की बात सोची कैसे? जाओ, पण्डितजी से माफी मांग कर आओ।“
मुझे क्या सोचना है ? सारी कक्षा यही बात कहती है बापू।“ मैंने मुंह फुलाकर कहा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बापू का पण्डितजी के प्रति इतना लगाव क्यों है ? तब मैंने मन ही मन प्रण किया - ”ठीक है पण्डितजी जितना मार सकते हो मारो। पर स्कूल में प्रथम इस बार भी मैं ही आऊंगा ? फिर जिस दिन स्कूल छोड़ कर जाऊंगा उस दिन आपको सबसे सामने गालियां दूंगा। आपके सामने सिगरेट पियंूगा। जितनी बदतमीजी हो सकेगी करूंगा। आपको अपमानित कर अपने अपमान का बदला अवश्य लंूगा।“
अपनी पिटाई को मैंने नियति मान ली। पिटाई से बचने के लिए मैं समय से काम करता और ध्यान से पढ़ने लगा। दो साल का समय पलक झपकते ही बीत गया। परीक्षा फल आने में, अभी समय था।एक दिन बापू ने मुझे एक फार्म दिया और कहा - ”बेटा इसे भर के भेज दे। मैं चाहता हूँ तू इंजीनियरिंग में दाखिला ले।“
मैंने फार्म भर कर भेज दिया। कुछ दिन बाद इण्टर का परीक्षाफल आया। मैं प्रथम श्रेणी में पास हो गया। एक बार फिर मैंने कालेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। मैंने कालेज से अंक तालिका लेकर इंजीनियरिंग कालेज को भेज दी। इन्हीं नम्बरों के आधार पर प्रवेश की सूची बननी थी।
फिर एक दिन डाक से एक रजिस्ट्री आई। मुझे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया था। मैं खुशी से फूला हुआ स्कूल गया। मेरे मन में एक ही चाह थी। मैं पण्डितजी को नीचा दिखा सकूं। इंजीनियरिंग में दाखिला पाकर व स्कूल में प्रथम आकर आधा काम तो हो चुका था। अब मैं पण्डितजी का अपमान करने का एक मौका प्राप्त करना चाहता था। अतः मैं चार-पांच बार कालेज गया। पर मालूम चला पण्डितजी सख्त बीमार हैं। मैंने मन ही मन कहा - ”करनी का फल तो सभी को मिलता है। अभी तो तुमको कीड़े पडेंगे पण्डितजी।“
फिर एक सुबह मैं गांव छोड़ कर इंजीनियरिंग कालेज चला गया। मैंने कालेज में लगी प्रवेश सूची देखी। मेरा नाम सूची में सबसे नीचे था। सबसे नीचे! ओह ? मैं कितना भाग्यवान हूं। मेरे मन मंे विचार आया मात्रा एक अंक कम आने पर मेरा एडमीशन न हो पाता।
एक भय सा मेरे मन में बैठ गया। एक अंक का जीवन में कितना महत्व हो सकता है। यह मैं जान चुका था। चार साल की पढ़ाई के पूरे दौर में यह एक अंक का चक्कर मुझे हमेशा पढ़ाई और समय के महत्व का अनुभव करवाता रहा।
आखिर कालेज सये ”विदाई“ का दिन आ गया। हमारी डिग्रियां पूरी हो चुकी थीं। मैंने अपने पक्के दोस्त राजीव से पूछा कि उसका अब क्या इरादा है ? राजीव ने कहा - ”दोस्त, मैं सीधे अपनी दीदी के पास बड़ौदा जाऊंगा। यदि उन्होंने सख्त कदम न उठाए होते तो शायद मैं कुछ भी न बन पाता और किसी छोटी सी नौकरी में होता। उन्होंने मार व डांट कर मुझे वैसे ही तराशा है जैसे जौहरी हीरे को तराशता है।“
मैं सोच में पड़ गया। मुझे यहां तक पहुंचाने वाला कौन है ? किसने सोचा था कि मैं इंजीनियर बनने योग्य हूं ? मेरे अनपढ़ पिताजी कहां से लाए थे इंजीनियरिंग कालेज का फार्म ? यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।
घर पहुंचने तक दो ही बातें मेरे मन में थीं। इंजीनियरिंग का फार्म व पण्डितजी से अपने अपमान का बदला। तांगे से उतरते ही मैंने अपने पिता जी से प्रश्न किया - ”बापू, मैं इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर आया हूं। पर बापू मुझे यह बताइये कि मेरा दाखिले का फार्म आप कहां से लाए थे ? किसने कामना की थी मेरे इंजीनियर बनने की?“
”इसबात को तुम आज पूछ रहे हो?“ बापू ने आश्चर्य से कहा और बोले - ”और कौन लाता, पण्डित संपूर्णानन्द दे गये थे मुझे। उन्हीं ने कहा था कि तुमसे भरवा कर भेज दूं। तुम्हारी बहुत तारीफ की थी उन्होंने। सच, वे असली पारखी थे। तुम्हारी योग्यता को तो शायद उन्होंने बचपन में ही पहचान लिया था।“
मेरी आंखे डबडबा उठीं। सच यदि पण्डितजी ने मुझे बात बात में मारा नहीं होता तो क्या होता ? क्या मैं इतने अंक ला पाता कि मेरा प्रवेश हो पाता ? उनके करारे थप्पड़ों ने ही शायद मेरे भविष्य की नींव रखी थीं। मुझे माफ करना गुरूजी। फिर मैं बेतहाशा दौड़ता हुआ पण्डितजी के घर की ओर दौड़ पड़ा। मेरा दिल बार बार रो रहा था ”गुरूजी, आपका बहका हुआ शिष्य वापस आ रहा है। सच गुरूजी, आप ने ही तो सिखाया था कि सुबह का भूला यदि शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।“

1 टिप्पणी:

anne ने कहा…

बचपन
की
कहानियाॅं