रविवार, 16 अगस्त 2020

अदिति दी

 अदिति दी❤❤❤❤😊


           हम फौजियों की तो कुछ जिंदगी ही कुछ ऐसी है कि हर दूसरे तीसरे साल हमारा ट्रांसफर हो ही जाता है। ट्रांसफर के बाद ट्रांजिट एकोमोडेशन में रहना, ढेर सारे क्रमबद्ध बनाये गए बक्से जिनको जरूरत के अनुसार खोलना फिर पूरी एकोमोडेशन का अलॉटमेंट ! और फिर दोबारा ट्रांसफर। 

    अपने पति के नए ट्रांसफर के पश्चात एक बार मैं फिर एक नए शहर में आ बसी। फिर वही चक्कर, बच्चों के लिए नए स्कूल और अपनी नौकरी के लिए एक नया कॉलेज ढूँढना। सारी समस्याएं सेटल्ड हुई और मैं नौकरी करने के लिए अपने नए स्कूल में पहुंच गई। स्टाफ रूम में मुझको अदिति मैम के बगल में बैठने की सीट मिली। मेरी उनसे बातचीत हुई और वह मुझे एक बहुत ही स्पष्ट वक्ता लगीं। 

       कुछ दिन स्कूल में रहने के पश्चात मुझको मालूम चला कि अदिति मैम के पति आर्मी में कर्नल थे और रिटायर हो गए हैं। वे एक बड़े सम्पन्न परिवार से थीं। पर पता नहीं क्यों उनकी रेपुटेशन स्कूल में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसा क्यों है मुझे कुछ समझ में नहीं आया। पर मैंने महसूस किया कि वे तो दूध का दूध और पानी का पानी करने वाली महिला थीं। उनके कामों में तो कोई बनावट नहीं थी। फिर भी मुझे ऐसा लगने लगा था कि उनसे दोस्ती बढ़ाकर कहीं मैं फँस न जाऊं। उनकी और मेरी कोई बराबरी भी न थी । मेरे पति तो काफी छोटे पद पर थे। पर मेरी मजबूरी थी कि स्टाफ रूम में मुझको सदैव उनके पास ही बैठना पड़ता था। 

         समय बीतता गया और मेरी उनके साथ दोस्ती दिन-प्रतिदिन गहरी होती ही चली गई । मानो मेरी बड़ी बहन हों। पर वह सदैव मेरे साथ भी पाई पाई का हिसाब किया करतीं थीं। ना किसी का लेना ना किसी का देना। पर अपने दो-तीन वर्ष के स्टे के दौरान मैंने देखा की उन्होंने मुझको एक से एक खूबसूरत गिफ्ट भेंट किए थे। पर जब भी मैंने उनसे कोई छोटी सी भी चीज मंगाई तो चाहे वह पांच ही रूपयों की भी क्यों ना हो उन्होंने पैसे तुरन्त मुझसे मांग लिए। यह एक अजीब बात थी। एक और तो वह महंगे गिफ्ट भी मौके बेमौके ऐसे ही दे दिया करती थीं और दूसरी ओर वह पाई पाई का हिसाब रखती थीं । मुझको भी कोई आपत्ति न थी क्योंकि मैं भी रुपियों सम्बन्धी हिसाब को बड़ा स्पष्ट रखने पर विश्वास रखती थी। 

        फिर वही हुआ । मेरी पति का ट्रांसफर ऑर्डर आ गया और हमारे शहर छोड़ कर जाने का समय निश्चित हो गया। मैंने सोचा की अदिति दी के मेरे ऊपर बहुत सारे अहसान हैं और जब मैं स्कूल छोड़ कर जाऊंगी तो वह अपनी आदत के अनुरूप मुझको जरूर ही कोई अच्छा गिफ्ट भेंट करेंगी। अतः उनके अहसान से बचने के लिए मैंने अपने पति से कहा कि इस मौके पर मैं अदिति जी को एक बहुत सुंदर और महंगी साड़ी भेंट करना चाहती हूँ ताकि वे सदैव मुझको याद रखें । मेरे पति ने पूर्ण सहमति दे दी और मैंने उनके लिए शानदार कांजीवरम की साड़ी खरीदी।

    साड़ी देते समय मैंने कहा - "मैम, आप जब भी इसे पहनेंगीं मुझे याद जरूर करेंगीं। "

    उन्होंने कहा -"तुमको इतनी महंगी साड़ी नहीं लानी चाहिए थी। याद दिलाने के लिए महंगी चीज की जरूरत नहीं होती। बहुत छोटी छोटी चीजें भी बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।"- मैं उनकी बात को समझ नहीं पायी।

       हमारे जाने के दिन आ गए। ठीक जाने की सुबह वह अपने हस्बैंड के साथ मेरे घर आयीं और उन्होंने एक छोटा सा डिब्बा मुझको भेंट किया और मुस्कराकर कहा -"अनुराधा, देखना मैं तुमको रोज सुबह-शाम याद आया करूँगी।"

       मैंने जल्दी में डिब्बे को एक बक्से में रख लिया क्योंकि मुझको उसको खोलने के लिए अब अवसर ही नहीं था। हम दूसरे शहर में चले गये। काफी समय बाद वह डिब्बा मुझको एक बक्से में मिला। मैंने बड़ी ही आतुरता से उसको खोला तो पाया कि उसमें एक छोटा सा प्लास्टिक का आटा निकालने का स्कूप रखा हुआ है। मुझे समझ में नहीं आया अदिति मैम ने इतना छोटा और सस्ता गिफ्ट मुझको क्यों दिया होगा!इससे अच्छा तो होता कि वह मुझको गिफ्ट ही नहीं दी देतीं। खैर मैंने उस आटे के स्कूप को अपने आटे के बर्तन में दैनिक प्रयोग के लिए रख दिया। सचमुच, मेरे लिए यह बहुत बड़े आश्चर्य का विषय है कि रोज सुबह और शाम आटा निकालते समय आज भी मुझको अदिति दी की याद आ जाती है। मैं उनको कभी भूल नहीं पाती हूँ। अब मुझे समझ में आया है कि उन्होंने इतना छोटा व इतने कम पैसे का पर इतना महत्वपूर्ण गिफ्ट मुझको क्यों भेंट किया था। सचमुच अदिति जी आप अद्भुत व्यक्तित्व की धनी हैं।

नाराजगी

 अप्पू एक बहुत ही प्यारा बच्चा है। मोहल्ले के नुक्कड़ पर उसके पिताजी की किराना की दुकान है। मैं सालों पहले जब इस मोहल्ले में आयी तो अप्पू छोटा सा बच्चा था। तब वह ठीक से बोल भी नहीं पाता था। उसके पिताजी अक्सर उसको दुकान पर ले आते थे। मैं सुबह शाम जब भी स्कूल से पढ़ाकर लौटती तो मेरी आँखें बरबस दुकान की ओर चली जातीं थी शायद इसका कारण अप्पू का आकर्षण था। मुझे देखकर वह शरमा कर अपनी आँखें नीची कर लेता था मैं जब कभी दुकान पर जाती तो अप्पू से बातचीत की कोशिश जरूर करती। धीरे-धीरे हमारे बीच एक मधुर संबध सा स्थापित हो गया था । अब वह कुछ बड़ा भी हो गया। वह अब मुझे देखते ही नमस्ते करने लगा। दुकान के कार्यो में वह अपने पिताजी का हाथ भी बटाने लगा। दुकान से चीजें वह फटाफट ढूॅंढ कर लाता और थैलियों में भरकर तौलने की भी कोशिश करता। शिक्षक होने के नाते मुझे यह सदैव लगता था कि वह कुशाग्र बुद्वि बालक है। एकदिन मैंने उसके पिताजी से कहा कि वह अप्पू का किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करवा दें। अप्पू बड़े ध्यान से मेरी बातें सुनता रहा फिर बाल सुलभता से बोला-”आंटी, मैं आपके ही स्कूल में पढॅ़ूंगा. मुझे आप पढ़ायेंगी न? बड़े होकर मैं भी आपकी तरह बच्चों को पढ़ाने स्कूल जाऊॅंगा ।" मैंने धीमे से हामी भर ली पर मैं जानती थी कि अप्पू को मेरी क्लास में आने में अभी कई वर्ष लगेंगे। फिर एकदिन उसके पिताजी ने अप्पू का दाखिला सचमुच हमारे स्कूल में करा दिया। साल पर साल बीतते गये। अप्पू सदा मुझसे पूछता कि मैं उसको कब पढ़ाऊंगी? मैं उसकेे भोलेपन पर मुस्करा देती। फिर एकदिन वह वक्त भी आ गया जिसकी अप्पू सालों से प्रतीक्षा कर रहा था। अब वह मेरी ही कक्षा में था। वह बहुत खुश था। उसकी वर्षो की मनोकामना पूरी हो गयी थी। मुझे भी मन ही मन अप्पू की इच्छा पूरी होने की खुशी थी।आखिर उसने इस बात का वर्षो तक इंतजार किया था।अप्पू क्लास के सभी बच्चों और अपने दोस्तों के बीच मेरी बहुत की तारीफ किया करता था।मेरी थोड़ी सी भी बुराई सुनने को वह तैयार न था।कभी कभी तो वह इस बात पर कक्षा में झगड़ा भी कर डालता था। अर्धवार्षिक परीक्षायें हुई। मेरे विषय संस्कृत में अप्पू के बहुत अच्छे नंबर आये थे। किन्तु उसका कक्षा के सबसे अच्छे विद्यार्थी से एक नंबर कम था। अतः वह अपनी कापी लेकर मेरे पास आया और उसने बड़े ही अपनेपन से मुझसे कहा-”मैडम, मेरा एक नंबर बढ़ा दीजिए न।“ 

” क्यों अप्पू? तुम्हारे तो बहुत अच्छे नंबर आयें हैं ।“ मैंने आश्चर्य से पूछा। वह कुछ नहीं बोला। उसको पूरी आशा थी कि मैं उसका नंबर बढ़ा दॅूंगी। काफी देर बाद उसने मुझसे अपने मन की बात बताई। मैं खिलखिलाकर हँस दी और फिर उसे समझाया-”अप्पू, तुम्हें और ज्यादा मेहनत करनी चाहिए। मात्रा कक्षा में सबसे ज्यादा अंक आ जाने से कोई फायदा नहीं है। तुम्हारा मुकाबला तो ढेर से अन्य विद्याथिर्यो से भी है जिनको तुम जानते भी नहीं हो और शायद वे कहीं और पढ़ रहे हैं। ”

तब अप्पू ने रोआंसा होकर कहा-”मैडम, बस एक अंक की ही तो बात है। बढ़ा दीजिए न।“ उसकी बात सुनकर मैैंने उसे फिर समझाया कि प्रश्न एक अंक का नहीं है। असल में बात सिद्वान्त की है और इसलिए मैं अंक नहीं बढ़ा पाऊंगी। तब अप्पू ने जिद छोड़ दी और वह कापी जमा करके अपनी सीटमें बैठ गया। मुझे लगा कि उसको मेरी बात समझ में आ गयी है। रिजल्ट निकले सात आठ दिन बीत गये। अप्पू कक्षा में प्रथम आया किन्तु रिजल्ट के बाद एक दिन मुझे महसूस हुआ कि अप्पू अब मेरे सामने नहीं आता है। वह कक्षा में मुझसे निगाहें भी नहीं मिलाता है। उसने मुझे नमस्ते करनी भी करनी छोड़ दी है। उसमें आये परिवर्तन के लिए मैं हैरान थी। मैं समझ नहीं पा रही थी अप्पू इस प्रकार का व्यवहार क्यों करने लगा है। उसने हमारे घर भी आना छोड़ दिया। हमारे घर के अन्य लोग जब उसको दिखाई देते तो वह उनको भी अभिवादन न कर देखा अनदेखा करने लगा। अप्पू में आये इस बदलाव को देखकर मैं चक्कर में पड़ गयी। उसे पता नहीं क्या हो गया था। क्लास में वह खोया-खोया सा दिखाई पड़ता था। उसके व्यवहार में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? यह मेरी उत्सुकता का विषय था।

फिर उस रात न जाने मेरे मन में कैसे एक विचार आया। मुझे लगा मैंने अप्पू की उदासी का कारण जान लिया है। मैंने फिर चैन की नींद ली। दूसरे दिन शाम को अप्पू अपने पिताजी के साथ दुकान में बैठा था। मैं थैला लेकर उसकी दुकान में पहुँची। मैंने अप्पू से एक किलो चीनी देने को कहा। अप्पू जब चीनी तौल चुका तो मैंने अप्पू से कहा-”अप्पू, मेरी थैली में थोड़ी ज्यादा चीनी भरो।मुझे लग रहा है कि चीनी कम है।"

तब अप्पू बोला-”नहीं मैडम, चीनी तो पूरी है। मैंने कम नहीं तौली है।“

”पर अपनी जान-पहचान वालों को तो तुम्हें कुछ ज्यादा तौलना चाहिए।“ मैंने उसे समझाते हुए कहा।

”पर मैडम, हमारी दुकान में तो सब जान पहचान वाले ही ग्राहक आते हैं। यदि मैं ज्यादा चीजें तौला करूंगा तो हमको कुछ समय में ही घाटा हो जाएगा। हम सभी को पूरा और अच्छा सामान बेचते हैं।” उसने बड़े ही आत्म-विश्वास से कहा। ”बिल्कुल ठीक अप्पू! तुम तो बहुत समझदार हो। पर अब तुम यह बताओ कि जब तुम अपनी दुकान में किसी को भी ज्यादा चीज तौल कर नहीं देते हो तो तुम यह उम्मीद कैसे करते हो कि शिक्षक अपने छात्रों को उचित से ज्यादा नम्बर दे दे? तुम मुझसे इसीलिए नाराज हो न कि मैंने तुम्हारा एक अंक नहीं बढ़ाया था?“- मैंने अप्पू से प्रश्न किया।

अप्पू ने शर्म से अपनी ऑंखें नीचे कर ली। फिर उसने आँखें झुकाए हुए कहा - "मैडम, मुझे अपनी गलती समझ में आ गई है। सच, आपने मेरी आँखें खोल दी हैं।“ फिर उसने अपनी पलकें उठाकर मुझे देखा।अपनी पुरानी मुस्कराहट के साथ।अब उसकी आँखों में कोई शंका या नाराजगी न थी। दूसरे दिन से अप्पू पहले की भांति ही प्रफुल्लित था।


रविवार, 9 अगस्त 2020

दादाजी

 दादाजी


        दादाजी सत्तर साल के हो चुके हैं पर हैं बिल्कुल फिट। आज भी वे सारे कार्यों को बड़ी बखूबी से निभाते हैं। इंटरनेट की दुनिया में फेसबुक हो या व्हाट्सएप या फिर गूगल सर्च, दादा जी का कोई मुकाबला नहीं है। मैं अक्सर देखा करता हूँ कि दादा जी अपने दोस्तों को उनकी समस्याओं के समाधान बारे में अक्सर बताया करते हैं । इसीलिए उनके सारे दोस्त उनको एक अच्छा गुरु भी मानते हैं। 

    इतने ज्यादा स्मार्ट दादाजी होने के बाद भी उनकी घर में की जाने वाली हरकतें मुझे पसंद नहीं थी। डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए दादा जी जब बिस्कुट को चाय में डुबो डुबो कर खाते हैं तो मुझको यह कतई भी अच्छा नहीं लगता था। 

        "यह भी कोई खाने का तरीका है ?" - मैं मन ही मन सोचता था। 

         जब कोई बाहर वाला आदमी डाइनिंग टेबल पर बैठा हुआ हो और दादा जी अपने बिस्कुट चाय में डूबा कर खा रहे होते थे तो स्थिति बहुत ही असामान्य सी हो जाती थी। चाय पीने का तो दादाजी को अत्यधिक शौक है। कितनी ही बार भी चाय दे दी जाए वो कभी मना नहीं करते हैं। पर बेचारे शुगर के मरीज होने के कारण वे चाय में चीनी नहीं लेते थे। सुबह की चाय हो या फिर दोपहर की चाय या फिर खाना खाने के बाद तुरंत पीने की चाय वो कभी मना नहीं करते थे।पर हद तो तब हो जाती थी जब खाना खाने के तुरंत बाद भी यदि वो चाय पीते तो साथ में बिस्कुट जरूर मांगते थे। मैं पूछता था -" दादाजी, आपने अभी तो खाना खाया है अब आप फिर बिस्कुट खाने बैठ गए ?"

    दादाजी हँस कर कहा करते थे - " बेटा तुम नहीं समझोगे ! यह बुड्ढों की बातें हैं। जब तुम बड़े हो जाओगे तो शायद बहुत सारी बातें तुम को समझ में अपने आप आ जायेंगी। " - बस यूँ ही हँस कर वे बातों को टाल दिया करते।

    फिर एक बार छोटी बुआ घर में आयीं। खाना खाने के तुरंत बाद दादा जी ने चाय की डिमांड की थी । बुआ ने उनको चाय बना कर दी और मुझसे कहा -"अरविंद जाओ मीठे बिस्कुट का पैकेट दादा जी को ला कर दे दो। "

     मैंने कहा बुआ से कहा - "उन्होंने तो अभी खाना खाया है। अब वह बिस्कुट लेकर क्या करेंगे ? उनको भूख कहाँ लगी होगी? "

    बुआ ने हँस कर कहा - "तुम नहीं समझोगे ।"

     मैंने कहा - "बुआ समझा दो न ?"

     तब बुआ जी ने कहा -"दादा जी की चाय फीकी होती है । इसलिए वह एक या दो बिस्कुट चाय के साथ लेकर अपने मुँह के जायके को ठीक कर लेते हैं। इस प्रकार कम चीनी लेकर वे डॉक्टर की राय का पालन कर लेते हैं। सच में अपने ऊपर अंकुश लगाना बहुत मुश्किल काम है।"

     तब मैंने बुआ से पूछा - "बुआ, एक बात और बता दीजिए। ये दादाजी बिस्कुट को चाय में डूबा कर क्यों खाते हैं ? मुझे यह बड़ा अटपटा लगता है।"

     बुआ जी ने हँस कर कहा - "यह बात तुमको तब समझ में आएगी जब तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारे दाँत टूट गए होंगे ।" और फिर बुआ जी जोर जोर से हँसने लगी।

          तब मैं मन ही मन सोचने लगा कि मुझे अपने को दादाजी की स्थिति में रखकर ही दादाजी के बारे में विचार बनाना चाहिए। यदि मैं जीवन में ऐसा करूँ तो शायद मुझको बहुत सी बातें अपने आप समझ में आ जायेंगी। आखिर लोगों की कुछ अपनी निजी समस्याएँ भी तो होती हैं !

हिसाब बराबर

 हिसाब बराबर


         एसी चेयर कार के उस कंपार्टमेंट में अपनी सीटों को ढूँढते हुए जब मेरी नजर उन पर पड़ी तो मैं तो तुरन्त उनको पहचान गया। वह हमारे शहर में एक प्रतिष्ठित सरकारी पद पर कार्य कर चुके थे। जब उनका हमारे शहर से ट्रांसफर हुआ था तो उनको फेयरवेल भी हमारे घर से हुआ था। उनसे इस शुभ अवसर पर जब बातचीत हो रही थी तो मेरी माता जी ने मेरा परिचय उनसे करवाया और कहा था - "पांडे जी, यह मेरा बेटा है और इसी वर्ष इसने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की है। यदि आपका आशीर्वाद मिल जाए तो अवश्य ही कोई अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाएगी।"

        उस समय तो मैं अपनी माताजी से कुछ नहीं बोला पर बाद में मैंने अपनी माता  जी को समझाया -"अम्मा, मुझे कोई क्लास फोर्थ की नौकरी तो मिलने वाली नहीं है। जो मात्र सिफारिश से दे दी जाये। मुझे तो यूपीएससी से इम्तिहान पास करना पड़ेगा तभी कोई नौकरी मिलेगी। इसलिए आप मेरी नौकरी के बारे में कभी भी किसी से कुछ भी ना कहें।"

      बात आई और चली गई। फिर मुझे यूनिवर्सिटी में एक पद प्राप्त हो गया और सौभाग्य से मुझको एक ट्रेनिंग के लिए भी सेलेक्ट कर लिया गया। यह ट्रेनिंग टोक्यो जापान में होने वाली थी। पर मेरे पास तो पासपोर्ट ही नहीं था। अब जल्दी पासपोर्ट बनवाने के लिए मेरे लिए जरूरी था कि मैं अपने डाक्यूमेंट्स को किसी बड़े अधिकारी से सत्यापित कर के भिजवाऊँ। मैं बहुत परेशान था। 

     तब माताजी ने कहा यह तो बहुत आसान है तुम पाण्डे जी के पास चले जाना वह तुम्हारा काम कर देंगे। मैं उनके घर में गया और मैंने सारी बातें उनको बतलाईं। तब उन्होंने मुझको प्रत्युत्तर दिया -"बेटा, यह तो ठीक है। पर इस कार्य को वही कर सकता है जो कम से कम पिछले दो वर्ष से तुम को भली भांति जानता हो।"

     मैं उनकी बात का आशय समझ गया और धीरे से उनके घर से चलता बना। खैर ईश्वर एक रास्ता बंद करता है तो कहते हैं कि वह दूसरा रास्ता खोल देता है। यही कुछ मेरे साथ भी हुआ। मेरा पासपोर्ट बन गया किसी दूसरे अफसर की अनुशंसा पर। मैं जापान से लौट कर वापस आया तो पता चला कि मेरा सेलेक्शन यूपीएससी में हो गया है। फिर आने वाले समय में मैंने न जाने कितने लोगों का पासपोर्ट हेतु वेरिफिकेशन किया। आज इतने साल बाद आज ट्रेन में उनसे सामना न जाने कितनी बीती बातों की याद दिला रहा था। मैंने उनको देखा और अनायास ही अनदेखा भी कर दिया। जाने कुछ घटा ही ना हो।

       पूरी यात्रा के दौरान मैं उनके ऊपर निगाहें बनाए रखा और मैंने देखा वह बड़ी असमंजस में हैं। लगातार बीच बीच में वे मुझको देख रहे थे। मैं मन ही मन उनकी दुविधा का आनंद लेता रहा। आखिर में ट्रेन गंतव्य में पहुंची। स्टेशन आ चुका था और मुझको लेने के लिए मेरा स्टाफ चलती ट्रेन में चढ़कर यह बताने के लिए पहुंच चुका था कि वे कितने कुशल हैं। अब पांडे जी की दुविधा चरण में पहुंच चुकी थी। वह अपने को रोक न सके। 
   उन्होंने खड़े होकर पूछा -"आप बिशन हो ना? 

      मैंने सपाट आँखों से उनकी ओर को देखा और कहा -"  जी मैं बिशन स्वरूप, एसएसपी ! शायद आज आपने अखबार में मेरे आने का समाचार देख लिया होगा। इसीलिए शायद आप मुझे पहचान रहे हैं।"

     फिर बिना उनकी ओर देखे अपने स्टाफ की ओर अग्रसर हो गया। मैंने स्टाफ को बताया कि कौन कौन सा मेरा सामान है। स्टाफ के जय हिंद सर, जय हिंद सर के अभिवादन के बीच मैंने पांडे जी की आवाज सुनी। वह कह रहे थे -"मैं, जेके पांडे, एडीशनल डायरेक्टर................"

     मैंने उनकी बातों को अनसुना कर दिया और दरवाजे की ओर बढ़ चला। साथ में चल रही मेरी बहन ने मुझसे कहा-    " आपने पहचाना नहीं उनको ?  वे तो पांडे अंकल हैं।"

    शायद पांडे जी हमारे पीछे कान लगाए हमारी बातें सुन रहे थे। यह जानकर मैंने थोड़ी जोर से कहा - "हमारे मैनुअल में बताया गया है कि आप उसी आदमी को पहचानते हैं जिसको आप कम से कम दो साल से जानते हों। मैं तो निजी रूप से उनको एक दिन के लिए भी नहीं जानता हूँ।"

       मैं पांडे जी के चेहरे पर आते हुए उतार-चढ़ाव को नहीं देख पाया क्योंकि वह मेरे पीछे से थे। पर मैंने अपना हिसाब ईश्वर की कृपा से पूरा कर लिया था। फिर थोड़ी ऊँची आवाज में कहा -" तुम नहीं समझोगी। यह एक पुराना हिसाब था जो आज बराबर हो गया है।"😊😊

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

हैरानी

★■हैरानी■★

जिंदगी 
तुझसे हैरान हूँ
बार बार
इस बात से 
परेशान हूँ
ये दिलकश 
जिंदगी के लम्हे
क्यों 
इस तरह गुजार दिये।
कुछ पल
शिकायतों में
और कुछ
आशंकाओं में
निकाल दिये ।
क्यों समझ न सका
कुछ भी तो नहीं
यहाँ अपना
आया हूँ यहाँ मैं 
कुछ पल 
किसी से उधार लिये !
ये सामान
जो किसी का भी नहीं कभी 
इकट्ठा
कर बैठा हूँ क्यों 
इतने अरमान लिये ।
कल सुबह की तो
खबर नहीं
क्यों जीता रहा
अब तक 
इतना अभिमान लिये ?
अब जब 
ज़िंदगी का अर्थ समझा 
जड़ व चेतन का 
फ़र्क़ समझा 
शायद देर हो चुकी 
तभी तो कहते हैं आयु व बुद्धि में
साथ नहीं होता।
बस ख़ुशी है अब इतनी
जाऊँगा यहाँ से
बिना कोई अरमान लिये😋😋

हेम/  16.04.2018
डाक्टर हीरक भट्टाचार्य की डेंटल क्लीनिक से 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

भाषा

★★भाषा ★★

खराब हूँ
क्या करूँ
अपनी ही भाषा बोलता हूँ।
सबकी बातें
एक ही तराज़ू में
तौलता हूँ ?
नहीं कर पाता हूँ
कहीं भी काट छाँट
सच के लिये
क्यों रखता हूँ 
एक सा ही बाँट ?
ऐसे कहीं
जिंदगी चलती है ?
दूसरे की भाषा भी तो
यहाँ समझनी पड़ती है  !
यह जिंदगी है
जनाब !
वक्त व स्थान के हिसाब से
यहाँ भाषा 
पल पल बदलती है
अपनी ही भाषा का 
अनचाहा मोह 
अच्छा नहीं है यहाँ
नफे नुकसान को
समझे बिना
सच बोलना
अच्छा  है कहाँ ?
समझदार हो
समझ लो जरा
रोम में रोमन बोले बिना
सफलता मिलती है कहाँ ?😎😎
पर ये लोग हैं
हर हाल ही में 
बोलते ही रहते हैं
खराब ही रहता हूँ
तब भी 
क्या करूँ
जब चेहरों को
देख कर मैं यहाँ बोलता हूँ !!🙁🙁

हेम/ 08.04.2018

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

अद्भुत अँधेरे

माँ लौटा दे मुझको
अंधेरे से वे पल 
नाभि से जुड़ा 
जब तेरी शय्या पर पड़ा था
धक धक 
वो धक धक 
तेरी दिल की धड़कनों का
मैं ने न जाने कितना 
अद्भुत संगीत सुना था 
खन खन वो खन खन
चूड़ियों की वो खन खन
हँसी का वो अमृत
न जाने वो मैंने कब कब पिया था 
माँ लौटा दे मेरे 
अँधरे से वो पल !! 
सूनसान था
छाया था अँधेरा
ये कैसी थी दुनिया
ये कैसा था डेरा
न डर था कहीं भी
न कोई था संकट
कहाँ कब पता था
तू भूखी थी सोयी
नहीं ये भी पता था
तू खुश थी या रोयी
मुझे तो तेरा स्पर्श मिला था
तेरे छूने पर मैं इतरा के हिला था !!
माँ लौटा दे मेरे
अँधेरे से वो पल
जब ममता में तेरी
मैं पल पल जिया था !
कहाँ से मैं आया 
कैसे मैं आया 
कब ये मिला था 
मुझे यह स्पंदन 
कैसे बना मैं
माटी से चंदन
सुनी थी कब तू ने 
मेरे दिल की पहली धड़कन 
छुआ था कब मुझको
जब मैं पहली बार हिला था 
मारी थी कुलांचें 
बताने को तुझको 
प्रकट हो गया हूँ 
जताने को तुझको
कोई लौटा दे मेरे
वे सुनहरे अँधेरे
जिसमें नहीं थे
साँझ और सवेरे !!
है कैसी पहेली
है कैसी ये दुनिया
शुरू में अँधेरा
अन्त में भी तो अँधेरा !!
अँधेरे से अँधेरे का
अजब सिलसिला है
पर कभी क्या कोई
उससे भी मिला है ??

हेम/23.03.2018
I

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

फर्क

बात बात में
फर्क होता है
एक बात से दर्द
कहीं बात का 
मलहम सा होता है
कोई हाल चाल
जब कभी पूछता है
एक में समाचार जानने की उत्सुकता
दूसरे में किसी का ख्याल होता है ।
इसीलिए कहता हूँ 
बात बात में
फर्क होता है।
कहीं झूठी स्वागत की हँसी
कहीं जबान पर दिखावटी सा दर्द
पर हर कोई क्या कभी
अपना हमदर्द होता है ?
कोशिश करो
महसूस तो करो
तभी तो एक हाथ गरमजोशी से भरा
और एक हाथ सर्द होता है !
तभी तो बात बात में
फर्क होता है।
वैसे ही
जैसे हँसी हँसी में फर्क होता है
एक हंसी में आमंत्रण
एक में तिरस्कार होता है
एक हँसी से आनन्द
एक से फसाद होता है
एक हँसी से
महफ़िल खिलखिला जाती है
दूसरी हँसी
न जाने कितनों रुलाती है!
इसीलिए बात बात में
फर्क होता है।

हेम/19.12.207

रविवार, 10 दिसंबर 2017

मुस्कान


मुस्कान

क्या मैं थका हूँ
या फिर परेशान हूँ  
पल पल मैं देता
क्या इम्तिहान हूँ ?
कभी इस से 
कभी फिर उससे
या फिर सभी से भी 
नसीहतें लेता हूँ
जो 
जो भी देता है 
वह समेट लेता हूँ
कान से सुनकर
हाथ में लपेट लेता हूँ
काम का तो जेब में
बेकाम जमीन को भेंट देता हूँ
दूसरे के झूठ को भी
धीरे से समेट लेता हूँ
पर झूठे को कभी
झूठा नहीं कहता हूँ
बेवकूफ सा बन कर
बस मुस्कुरा देता हूँ
अपनी मुस्कराहट का 
मन ही मन मजा लेता हूँ
न जहर पीता हूँ
न उड़ेलता हूँ
नीलकंठ तो हूँ नहीं
पर कुछ कुछ झेल लेता हूँ
बुराइयों के बीच भी
अच्छाईयों से खेल लेता हूँ।

हेम/10.12.2017

मंगलवार, 6 जून 2017

*झूठ*
झूठ के पाँव नहीं होते
झूठ की यादाश्त भी नहीं
बहुत देर तक झूठ 
ग्रहण की तरह कभी
ठहर पाता भी नहीं
झूठ तो बर्फ है
पिघलना तो इसकी फितरत है
सच तो पानी है
बर्फ की जो हकीकत है
झूठ की खपच्चियों क्या कभी
क्या सच की
बल्लियां बन सकी हैं?
और इन बल्लियों पर
क्या विश्वास की कभी
हरी भरी बेल चढ़ी है?
झूठ की जीत नहीं होती
जीत कर भी
हारा होता है
अहम बहल सकता है
कुछ क्षण
पर सच ही प्यारा होता है
झूठ की औलाद भी
झूठ ही होती है
किसी ने सच ही कहा है
जीवन में जैसी बुवाई
वैसी ही कटौती है
झूठ को तो होती है
फिर और झूठ के
सहारे की जरुरत
लिखो कुछ भी रेत में
शाश्वत रह सकती क्या
विश्वास की कभी कोई इबारत ?