रविवार, 15 मार्च 2009

शिखर की अंतरिक्ष यात्रा भाग-५ :कहानी: हेम चन्द्र जोशी

एक पल  में जब सब  ने आंखें खोली तो देखा एडवर्ड अपनी जगह पर न था. वह तेज गति से पीछे की ओर उड.ता हुआ अंतरिक्ष में चला जा रहा था शिखर झटके के साथ दौड.ता हुआ मामाजी के पास पहुंचा. उनको को मुसकराता  देख कर उस की जान में जान आई.

लिफ़्ट से उतरते ही शिखर ने मामाजी स प्रश्न किया,"एडवर्ड पिस्तौल के धमाके के साथ अंतरिक्ष में कहां और कैसे उड.ता चला गया?"

"बेटा अच्छा तुम बताओ.... यदि एक गुब्बारे में हवा भरी जाए और फिर उस के सिरे को बिना बांधे छोड. दिया जाए तो क्या होगा?"

शिखर ने कहा, "मामाजी गुब्बारे की हवा तेजी से पीछे को निकलने लगती है और गुब्बारा तेजी से आगे की ओर भागता है,"

मामाजी खुश हो कर बोले "बस कुछ ऐसा ही एडवर्ड के साथ भी हुआ है जितनी ताकत से गोली पिस्तौल से आगे को निकली उतनी ही ताकत से एडवर्ड को पीछे की ओर धक्का भी लगा है. इसीलिए वह अंतरिक्ष में उड.ता चला गया...." 

शिखर  ने बीच में ही बात काट कर कहा, "किंतु धरती पर तो ऐसा नहीं होता है"

"यह तो वही पुराना चक्कर है बेटे,  अंतरिक्ष में हमारा भार समाप्त हो जाता है, जिसे हम भारहीनता कहते है. इसीलिए पिस्तौल का धक्का हम को आराम से अंतरिक्ष में धकेल सकता है."

"तो क्या एडवर्ड अंतरिक्ष में भूखाप्यासा मर कर यों ही उड.ता रहेगा?" शिखर ने आश्चर्य से पूछा. 

"हां यदि उस को हमारे खोजी अंतरिक्ष यानों ने ढूंढ न निकाला..." थोडा रूक कर वह बोले, "किंतु  एडवर्ड को जीवित पकडना अति आवश्यक है ताकि जासूसों के गिरोह का भंडाफोड. हो सके, इसलिए कर्नल उस की खोज में खोजी यानों को अवश्य भेजेंगे."

बदमाश एडवर्ड की वजह से खेल आधे में ही समाप्त  हो गए सभी लोग बोर हो कर चले गए. सभी की जबान पर एक ही चर्चा थी कि एडवर्ड अंतरिक्ष नगर में क्यों आया था? सारी सुरक्षा व्यवस्था को चौकस कर दिया गया. खोजी दस्तों की सहायता से किसी तोड.फोड. की आशंका से बचने के लिए खोंजबीन शुरू कर दी गई. 

थोडी देर में वे घर पहुंच गए. मामी ने उन को जल्दी आया देख कर आश्चर्य  प्रकट किया. काफी देर तक एडवर्ड के बारे में बातचीत होती रही. तथी मामी को कोई बात एकाएक याद आ गई और वह मामाजी से बोलीं, "सुनिए, कल ग्रहण लगने वाला है. आप जब खेलकूद देखने गऐ थे, तब टीवी में यह सूचना प्रसारित हुई थी."

"तो मैं क्या करूं?" मामाजी ने कहा  
मामी बोलीं, "मैं आप से इसलिए कह रहीं हू  ताकि आप आवश्यक प्रकाश की व्यवस्था कर दें, क्योंकि ग्रहण करीब 2 घंटे तक रहेगा  पूरे अंतरिक्ष नगर में घटाटोप  अंधियारा छाने की सूचना हैं"

शिखर ने आश्चर्य से मामी से पूछा, "क्या यहां भी सूर्यग्रहण लगता है?"
तब मामाजी ने शिखर से पूछा कि क्या उस ने सूर्यग्रहण के बारे  में पढ.  रखा है. शिखर के सहमति में सिर हिलाने पर उन्होंने पूछा "बताओ पृथ्वी पर सूर्यग्रहण कब दिखाई देता है?" 

"मामाजी, जब पृथ्वी  और सूर्य के बीच में चंद्रमा आ जाता है तो हमें सूर्यग्रहण  दिखई देता है, क्योंकि सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा मार्ग में ही रोक लेता है. पर आप यह पूछ क्यों रहे है?" 

मामाजी ने हंस कर कि वह कल उस को अंतरिक्ष नगर की छत पर ले जाएंगे और दिखाएंगे  कि ग्रहण कैसे लगता है. लेकिन यहां का सूर्यग्रहण पृथ्वी के सूर्यग्रहण  से अलग है. चंद्रमा की जगह कल हमारे अंतरिक्ष नगर और सूर्य के बीच में कोई दूसरा अंतरिक्ष नगर आने वाला है, जिस के कारण ग्रहण लगेगा.

"वह कैसे?" शिखर ने आश्चर्य से पूछा.

"कल जब तुम इस घटना को अपनी आंखों से देखोगे तो तुम्हें  सब समझ में आ जाएगा."

इस के बाद मामाजी घर में प्रकाश की व्यवस्था  करने में जुट गए. उन्होंने  घर की सभी इमरजेसी लाइटों की जांच की ताकि दूसरे दिन किसी प्रकार की परेशानी न हो. 

दूसरे दिन ग्रहण से काफी पहले मामाजी घर आए और शिखर को ले कर अंतरिक्ष नगर की छत पर पहुंच  गए. कल जहां खेलकूद हो रहे थे उसी स्थान से कुछ दूरी  पर एक छोटी सी वेधशाला थी. मामाजी ने वहां के किसी कर्मचारी से बात की. कर्मचारी उन को एक टेलीस्कोप के पास ले गया और उस ने शिखर से टैलीस्कोप में देखने को कहा.

 शिखर ने किसी गोलाकार वस्तु को अंतरिक्ष में घूमता  हुआ  पाया. कर्मचारी  ने बताया कि वह एक अन्य अंतरिक्ष नगर को देख रहा है, जो धीरे धीरे सूर्य और उनके अंतरिक्ष नगर के बीच में आ रहा है यह अंतरिक्ष नगर जैसे ही बीच में आना शुरू होगा, वैसे ही हमें सूर्यग्रहण दिखाई देना शुरू हो जाएगा क्योंकि यह मार्ग में ही सूर्य  के प्रकाश को रोक लेगा.

थोडी देर में कर्मचारी ने कहा कि वह अब आगे की घटना परदे पर देखें. टेलीस्केप से सूर्य को देखना संभव नहीं है, क्योंकि सूर्य के तेज प्रकाश से हमारी आंखें खराब हो जाएंगी.

शिखर ने एक विशेष परदे पर देखा, जिस में सूर्य  का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था. धीरे धीरे  वह अंतरिक्ष नगर बीच में आने लगा और इस की वजह से सूर्य  का एक किनारा कटा हुआ दिखाई देने लगा. फिर धीरे धीरे पूरा सूर्य ही ढक गया अंतरिक्ष नगर में पूर्ण अंधेरा छा गया शिखर ने पहली बार अंतरिक्ष नगर में रात होती देखी.

तब एक कर्मचारी ने शिखर से कहा कि वह थोडी देर के लिए ग्रहण लगाने वाले अंतरिक्ष नगर को देख सकता है. शिखर ने विशेष टेलीस्कोप से देखा. अंतरिक्ष नगर धंुधला सा दिखाई दे रहा था. उस के किनारे गोल थाली के किनारों की भांति चमक रहें थे. सचमुच यह एक अद्भुत दृश्य था. 
तब मामाजी  ने अंधेरे में शिखर का हाथ पकड. कर कहा, "क्यों अब घर चला जाए? आज  तो अंतरिक्ष नगर में भी रात हो गई तुम ने यहां का अनोखा ग्रहण भी देखा लिया है."

अनोखें ग्रहण को देख कर शिखर बहुत उत्साहित था. उस ने थोडा आराम किया.  फिर उसे एकाएक याद आया कि उसे अपनी मां को एक पत्र जरूर लिख देना चाहिए. उस ने अपनी अटैची खोली. कागज और पेन  निकालते समय  उसे याद आया कि वह धरती से अपने साथ ढेर सारे पेन ले कर आया था  वह लौटते समय अंतरिक्ष नगर के अपने नए दोस्तों  को    एक-एक पेन भेंट करना चाहता था.  शिखर ने लगे हाथों आने अंतरिक्ष नगर के मित्रों की एक सूची बनाने की भी सोची. 

शिखर ने पत्र में लिखी जाने वाली चीजों के बारे में कुछ देर सोचा और फिर लिखना शुरू  किया.

प्यारी मां....

 पर कागज में लिखावट न उभरी. शायद  पेन की रिफिल खराब थी. उस ने अटैची से एक दूसरा पेन निकाला और फिर लिखना शुरू किया पर फिर वही बात. पेन कागज पर नहींं चला  उसे लगा कि कागज के पन्ने में कुछ खराबी है उस ने एक नए पन्ने में लिखने की कोशिश  की पर पेन से कुछ न लिखा जा सका

उस ने पेन को काफी देर तक कागज पर घिसा ताकि स्याही आनी शुरू  हो आए पर नतीजा जीरों रहा. तब उस ने अटैची में रखे सभी पेनों से लिखने की कॊशिश की पर नतीजा कुछ भी न निकला आखिर सारे के सारे पेनों को क्या हो गया. "क्या दुकानदार ने उसे खराब पेन पकडा दिए थे." शिखर के मन में विचार आया. शिखर ने एक पेन की रिफल को बाहर निकाला और उस के पीछे से फूक मारी. तभी रजत वहां आ गया. मेज पर रखे ढेर सारे पेनों को देख कर वह चौक गया. उस ने शिखर  से पूछा  कि वह इतने ढेर सारे पेन ले कर क्यों आया है?

जब शिखर ने पूरी बात बताई तो रजत ने उस को बताया कि इस प्रकार के बाल पेन यहां प्रयोग नहीं किए जा सकते. इसलिए उनको उपहार के रूप् में बांटने से कोई फायदा नहीं है. शिखर ने आश्चर्यचकित हो कर कहा- "क्यों ये पेन अंतरिक्ष में काम  क्यों नहीं आ सकते है? मैं ने सभी पेनों से लिखने की कॊशिश   की पर इन में से किसी से भी मैं  लिख न पाया समझ में नहीं आता है कि पेन से स्याही क्यों नहीं निकल रही है?" 



2 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

पढ़कर बचपने में खो गया हूँ . बहुत बढ़िया आखिर बच्चो के लिए भी कुछ तो होना चाहिए . आभार.

विनीता यशस्वी ने कहा…

kahani padh ke achh laga...

bacpan ki kai baate bhi yaad aa gayi...