गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पीड़ा में सहभागी


पीड़ा में सहभागी

घर में बहुत गरीबी थी। इतनी गरीबी कि सुबह खाना खाते समय शाम के खाने का पता नहीं होता था। घर में हम पांॅच भाई बहन खाने वाले थे और कमाने वाली मात्रा हमारी मां थी। सच। कभी कभी दुखी होकर मैं सोचता था कि घर छोड़कर कहीं दूर चला जाऊंॅ । पर फिर विचार आता था कि मां के बाद घर में सबसे बड़ा मैं ही हूॅं। मुझे मां की सहायता करनी चाहिए। पर कैसे ? इसका उत्तर मैं नहीं ढूंढ पाता था। फिर हमारे कस्बे के पास एक कारखाना लगना शुरू हुआ। बहुत से लोगों को कारखाने में काम मिल गया। मैंने भी मौका देखकर कारखाने के साहब के घर मंे घरेलू नौकर की जगह प्राप्त कर ली। मेरे दिन आराम से बीतने लगे। मां की सहायता होने लगी। वेतन के साथ-साथ मुझे ढेर सारी खाने पीने की चींजें मिल जाती थीं। घर में कोई विशेष काम भी न था। वहां तो मात्रा साहब और मेमसाहब थीं। गर्मियों में तो मेरे और भी मजे हो गये। साहब का बेटा राजन गर्मियों की छुट्टियों में घर आ गया था। उसका कारखाने में कोई साथी न था। अतः काम के वक्त मैं उसका नौकर था तथा अन्य समय में मैं उसका दोस्त। कभी कभी राजन जब अपनी रंग बिरंगी किताबें पढ़ता तो मौका देखकर मैं भी पन्ने पलट लेता था। फिर पता नहीं राजन को क्या हुआ वह मुझे पढ़ना लिखना सिखाने की कोशिश करने लगा। मैंने राजन को समझाया, ”छोटे साहब, हम पढ़ लिख कर क्या करेंगे ? पढ़ाई के लिए न तो हमारे पास पैसा है और न ही वक्त। आप हमारे उपर अपना वक्त कीमती खराब न करें।“ पर शायद राजन को इस प्रकार घरेलू नौकर बने रहना मंजूर न था। वह अक्सर मेम साहब से सिफारिश करता कि वे मुझे कारखाने में नौकरी दिलवा दें। मेम साहब उसे समझातीं कि जब मैं बड़ा हो जाउंगा तो वे इस बात पर विचार करेंगी। फिर भी वह हमेशा जिद करता ओर अपनी मां से कहता, ”मां, जब यह हमारे घर में काम कर सकता है तो फिर इसे कारखाने में नौकरी क्यों नहीं मिल सकती है ? यह तो हमारे चपरासी अंगद लाल से दोगुना काम करता है। आप पापा से कह कर तो देखिए। तब मेमसाहब उसे सिर में प्यार से चपत लगातीं और कहतीं, ”पगला कहीं का। जब तुम बड़े हो जाओगे तब समझोगे। बच्चों को कारखाने में नहीं रखा जा सकता है। मुझे भी समझ नहीं आता था कि आखिर ऐसा क्यों है ? फिर एक दिन राजन की दादी भी वहां आ गयी। वे बहुत अच्छी थीं। उनको पान खाने का शौक था। दादी मां अपना पान खुद लगाया करती थीं। मैं उनकी खूब सेवा करने लगा। धीरे धीरे मैं उनसे पान लगाना भी सीख गया। अब उनको पान बना कर खिलाना मेरे काम मंे शामिल हो गया। दादी मां मेरा लगाया पान खा कर कहतीं, ”अरे तूने तो हमारे शहर के पनवारी को भी मात दे दी है। तू तो बहुत अच्छा पान लगाने लगा है। अगर तू पान की दुकान खोल ले तो सारा कस्बा तेरी दुकान से पान खाना शुरू कर देगा।” राजन को दादी मां की यह बात जॅंच गयी। उसने मुझसे कहा कि मैं क्यों नहीं कारखाना के गेट के पास पान का एक खोखा लगा लेता हूं ? उसकी बात में दम तो था पर जब मैंने दादी मां से हिसाब लगवाया तो मुझे मालूम चला कि दुकान लगाने को कम से कम एक हजार रुपयों की आवश्यकता थी। इतने सारे रुपये। मैं तो सोच भी नहीं सकता था। राजन ने मेरी मां से बातचीत की। पर मां इस बात के लिए कतई तैयार न थी। मां के पास रुपये न थे। लेकिन राजन न माना। उसने मेरे मां से पूछा कि जब मैं नौकरी नहीं करता था तब भी तो हमारे घर का खर्चा चलता था। अब मेरी कमाई के रुपयों का क्या होता है ? मेरी मां के पास राजन की बातों का कोई उत्तर नहीं था। समय बीतता गया। एक शाम मैं और राजन कमरे में बैठे खेल रहे थे। तभी राजन के पिताजी कमरे में आये। उन्होंने हम दोनों के सामने एक हजार रूपये मेम साहब को दिये। मेम साहब ने रूपये वहीं पर एक फोटो के नीचे दबा कर रख दिये। खेलने के बाद मैं काम में लग गया। शाम को जब मैं घर जाने को तैयार हो रहा था तो मेम साहब ने मुझको बुलाया। राजन वहीं पर खड़ा था। मेम साहब ने मुझसे डांटते हुये पूछा ‘‘कल्लू सच सच बता दो। तुमने रूपये कहां छिपाये हैं नहीं तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा? ’’ मैं समझ नहीं पाया कि मेम साहब किन रूपयों की बात कर रही थीं पर राजन ने मेरे सामने गवाही दी कि उसने मुझे रूपयों को छूते हुये देखा था। मैं सकपका कर रह गया। राजन इतना बड़ा झूठ बोल सकता है। मैं सोच भी नहीं सकता था। कितना झूठा था राजन। पर मेरी सुनने वाला वहां कोई नहीं था। बगल के कमरे से दादी मां आयी और उन्होंने कहा ”बहू राजन ठीक कह रहा है। पान की दुकान खोलने के लिए इसे एक हजार रूपये चाहिए थे। चोरी जरूर इसी ने की होगी।“ मेम साहब ने मुझसे बहुत पूछा पर मैं निरूत्तर था। मेरेे पास कोई सफाई हेतु शब्द नहीं थे। राजन ने एक सुनियोजित षडयंत्र के अंदर मुझे फंसा दिया था। मेरे पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। मैं रूपये देता तो कहां से लाकर देता। अतः मेरी मां को बुलाया गया। मां ने मुझे बहुत भला बुरा कहा और मेम साहब से विनती की कि मुझे पुलिस को न दें। अंत में यह फैसला हुआ कि मेरे वेतन से सौ रूपया महीना काट लिया जायेगा। मैं खून का घूंट पी कर रह गया। कुछ दिनों बाद राजन वापस अपने कालेज चला गया पर मेरे माथे पर कलंक लगवा गया। धीरे धीरे महीने गुजरते गये। फिर गर्मियों की छुट्टियां आ गयी। राजन फिर छुट्टियों में घर वापस आ गया। मैंने मन ही मन निश्चय किया कि मैं साहब की नौकरी अब छोड़ दूंगा क्योंकि मेम साहब के एक हजार रूपये पूरे होने वाले थे। मैंने राजन से कोई बात नहीं की। मेरा जब भी उससे सामना होता तो मुझे उसकी चमकती हुयी आंखों में छिपी हुयी शरारत साफ झलकती हुयी दिखायी पड़ती। ठीक एक तारीख को मेरी मां मेरा वेतन लेने आयी। इससे पहले कि मैं मेम साहब से कुछ कहता मेरी मां ने कहा- ”मेमसाहब, कल्लू अब काम नहीं करेगा। हम गलती के लिए आपसे क्षमा चाहते हैं।“ ”ऐसा क्यों ?“ मेमसाहब ने आश्चर्य से पूछा। मेमसाहब, आज आपके एक हजार रूपये पूरे हो गये हैं। अब कल्लू के उपर कोई इल्जाम नहीं है। मैं जानती हूं कि कल्लू निर्दोष है पर फिर भी मैंने एक हजार रूपये की भरपायी कर दी है। मैं आपकी अहसानमंद हॅूं। अन्यथा बदनामी के कारण हमेंे किसी भी घर में काम नहीं मिलता। चोरों को अपने घर में कौन रखता है ? चाहे किसी को झूठा ही चोर क्यों नहीं बना दिया जाये। मेरा सीना गर्व से तन गया। मैंने आंॅखे मिला कर राजन की ओर देखा। आखिर मेरी मां को मेरी बात पर पूरा विश्वास था जो मेरे लिए गर्व की बात थी। एकाएक राजन बोला, ”ठीक है कल्लू की मांॅ। बिल्कुल ठीक है। कल्लू अब हमारे घर काम नहीं करेगा पर वह किसी और के घर भी काम नहीं करेगा। अब वह पान की दुकान खोलेगा और सब लोग उसकी दुकान के पान की तारीफ करेंगे। तुमने बिल्कुल सच कहा कि कल्लू चोर नहीं है। यह मैं भी जानता हूंॅ कि कल्लू चोर नहीं है क्योंकि उस दिन के खोये हुये एक हजार रुपये आज भी मेरे पास हैं। ये रुपये मैंने आज तक छुपा कर रखे हुये हैं ताकि मजबूर होकर तुम एक हजार रूपये जमा कर सको और कल्लू अपनी दुकान खोल सके।“ यह कहते हुये राजन ने एक हजार रुपये मेरी ओर बढ़ा दिये। राजन की बात सुनकर मैं असमंजस में पड़ गया। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं राजन को उसके इस कार्य के लिए प्रताडि़त करूं या उसकी प्रशंसा करूं। इस एक साल के अंतराल में मैं पल पल चोर होने की पीड़ा को भोगता रहा था पर यह भी सच था कि बिना राजन की सहायता से मैं वह रूपये इकट्ठे नहीं कर सकता था। मेरे मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। तब राजन ने मुझसे कहा, ”कल्लू भाई कभी कभी एक बड़े काम के लिए बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। यह मत सोचो कि पीड़ा को मात्र तुमने ही भोगा है। सत्य तो यह है कि मैं भी इस पीड़ा से साल भर तुम्हारा सहभागी रहा हूं। मुझे माफ करना दोस्त, पर मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।“ राजन की आंखों मंे बरबस खुशी के आंसू छलक आये। राजन के कहने पर मैंने वह एक हजार रूपये ले लिये और कारखाने के गेट के पास पाप का खोखा डाल लिया। जब भी दादी मां कसबे में आती तो मैं पान लेकर सुबह शाम उनके पास जाता था। छुट्टियों में राजन मेरे कहने पर पान खा लेता था तो मुझे बहुत संतोष मिलता था। घटना बहुत पुरानी हो गयी है। राजन के माता पिता यहां के कभी के जा चुके हैं। राजन भी अब पता नहीं कहां होगा। पता नहीं कितने कल्लू उसके जीवन में आकर पारस बन गये होंगे पर मेरे जीवन में तो राजन जैसा एक ही हीरा आया है। उसे मैं कैसे भूल सकता हूं। हमारा कस्बा अब बहुत बड़ा हो गया है। राजन की दया से मैं शहर के बीचों बीच कल्लू पान भंडार के नाम की प्रसिद्व दुकान चलाता हूं। मेरी दुकान का हर ग्राहक मेरे पान की तारीफ करता है। क्योंकि शायद मेरे लगाये पान में दादी मां के आशीर्वाद व राजन के प्यार की सुगन्ध बसी हुयी हैे।



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2 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर कहानी . आभार.

Vinay ने कहा…

रोचक है
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