शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

अन्धे हो क्या


अन्धेहो क्या?


कहानी
हेम चन्द्र जोशी



            कम्प्यूटर में विडियो गेम खेलते-खेलते पता नहीं कब मेरी आंखे कमजोर हो गयी यह पता ही नहीं चला। बस अक्सर सिर में दर्द रहने लगा था और वह भी खास कर किताबें पढ़ने पर। कक्षा में जब ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ कुछ धुधंला सा दिखायी देने लगा तो मैंने इस बात को पापा से कहा। फिर पापा मुझे आँखों के डाक्टर के पास ले गये फिर क्या था डाक्टर ने मेरी आंखे टैस्ट की और बताया कि आंखे कमजोर हो गयी हैं। इसके बाद उन्होंने कुछ आँखों की कसरतें बतायी और चश्मा लगाने के लिये कह दिया। वह दिन है और आज का दिन है कि चश्मे ने मेरा पीछा ही नहीं छोड़ा।  इस घटना को लगभग पांच साल बीत गये हैं। यहाँ  तक कि हाईस्कूल तक मेरे पहुँचते पहुँचते मेरे साथियों ने मुझे चश्मुद्दीन कह कर चिढ़ाना भी छोड़ दिया। क्यों कि कक्षा में अब मेरे जैसे चश्मे वाले मेरे और भी कई साथी हो गये थे।
           
            सभी बच्चे मानते थे कि हाईस्कूल की कक्षा विशेष हो जाती है। क्यों कि तब हमको बोर्ड की परीक्षा देनी होती है और हम अपने को कुछ बड़ा  समझने  लगते हैं। तभी तो चश्मा अब मेरे फैशन  का हिस्सा बन गया था। मैंने  स्टाईलिस चश्मा खरीद रखा था जो नजर के साथ धूप के चश्मे का काम भी करता था। आखिर धूप को देखकर रंग हल्का गाढ़ा करने वाले इन फोटोक्रोमेटिक लैन्सों का कक्षा में रौब ही कुछ अलग था। और फिर इस फैशन की आंधी में, मैं कुछ उद्दंड सा हो चला था। अब किसी भी बात का सीधा उत्तर देना मुझे भाता ही नहीं था। क्लास में भी यदा कदा मौका देखकर मैं शरारतें कर ही जाता था।

            उस दिन मोहल्ले में साईकिल में एक गाँव वाला व्यक्ति घूम रहा था। उसको एक पते की तलाश थी  पर उसको घर नहीं मिल पा रहा था। उसने मुझे रोक कर कहा- ”बाबू जी क्या आप यह पता बता देंगे। मैं बहुत देर से ढूंढ़ रहा हूँ।कहकर उसने एक हिन्दी में लिखा पता मेरी ओर बढ़ा दिया।
            मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। दरअसल में मुझे उसका बाबू जी कहना अच्छा नहीं लगा। आखिर मेरे जैसे अपटूडेट लड़के को उसने  साहब या सर कह कर पुकारना चाहिये था। मैंने  तिरछी निगाहों से परचे को देखा और पढ़ा। पता मुझे मालूम नहीं था।  पर- ”मुझे मालूम नहीं है।कहना मुझे ठीक नहीं लगा। मुझे  लगा कि इससे मेरा रौब कुछ कम हो जायेगा। अतः मैंने  अपना चश्मा ठीक करते हुये रौब से कहा-” भय्या यह पर्चा तो हिन्दी में लिखा है। यदि अंग्रेजी में लिखवा कर लाओ तो शायद बता सकूँ।

             गाँव वाला आवाक् सा मुझे देख कर आगे बढ़ गया। उसे कोई बात समझ में नहीं आयी पर मैं अपने मद में चूर आगे बढ़ गया। मुझको  लगा था कि मैंने एक बहुत बेहतरीन उत्तर दिया था। बस ऐसे ही ऊट पटांग बातों पर मैं मन ही मन खुश हो जाता था।

            फिर एक दिन मैं अपनी नयी स्कूटी में ऐसे ही इधर से उधर के चक्कर मार रहा था कि घर के मोड़ पर एक लाठी वाले व्यक्ति के एकाएक स्कूटी के सामने आने से मैं गिर पड़ा मुझे  एकाएक  जोर को ब्रेक लगाना पड़ा था। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिस व्यक्ति को बचाने के लिये मैं जमीन में गिर पड़ा  था उस व्यक्ति के पास इतना शिष्टाचार भी था कि वह कर मुझे सहारा दे दे।

            मुझे मन ही मन क्रोध गया। मैंने गुस्से में चिल्लाकर कहा- ”सड़क में देख कर नहीं चल सकते यह कहते हुये मैं कपड़ो की मिट्रटी झाड़ता हुआ उठ खड़ा हुआ।

            ”बाबू जी, अन्धा हूँ तभी तो इस लाठी के सहारे चलता हूँ जरा मेरी लाठी उठाकर मुझको दे दीजिये।उसने दीनता से आग्रह किया।

            ”दिखता नहीं तो मैं क्या करूँ ? सड़क  पर चलते क्यों हो? बेकार में मुझको चोट लगवा दी। अन्धे कहीं के।कह कर मैंने अपनी स्कूटी उठा ली पर उसका डण्डा उठाकर उसको नहीं दिया। मेरा आपा गुस्से में चढ़ गया था।  मेरा विवेक मेरा साथ नहीं दे रहा था कि मैं इतना समझ सकता कि एक अंधा अपने डण्डे को कैसे ढूंढ़  कर उठायेगा।

            तभी दो-चार आदमी वहां पर गये और उन्होंने उसका डण्डा उठाकर उस व्यक्ति को दे दिया। उस व्यक्ति  ने धन्यवाद कहा और फिर आगे बढ़ गया। पर मैं मन ही मन बडबड़ाता रहा कि आखिरी ये अन्धे लोग सड़क पर घूमते क्यों हैं। इनकी वजह से मुझे फोकट में चोट लग गयी थी। इनको तो बन्द करके रखना चाहिये।


            शाम को ताऊ जी को रेलवे स्टेशन जाना था। वे यात्रा में कहीं बाहर जा रहे थे। मैंने मौका अच्छा पाकर कहा- ”ताऊ जी, मैं आपको स्टेशन छोड़ आऊँगा।दरअसल में अपनी स्कूटी चलाना चाहता था। ताऊ जी ने हामि भर दी। फिर मैं शाम तक इस बात का इन्तजार करता रहा। रात के नौ बजे की गाड़ी थी मैं ताऊ जी को लेकर  जल्दी ही स्टेशन में पहुँच गया। असली में मुझे स्कूटी चलाने की बहुत जल्दी थी। ताऊ जी भी थोड़ी जल्दी ही स्टेशन पहुँचना चाहते थे क्यों कि उनका आरक्षण कन्फर्म नहीं हुआ था।

            स्टेशन पहुँच कर ताऊ जी अपने परिचित किसी व्यक्ति को ढूंढ़ने के लिये चले गये और उन्होंने मुझसे कहा- ”जाओ, जरा रिजर्वेशन चार्ट को देखकर आओ। क्या पता वेटिंग लिस्ट में नाम हो।

            मैं रिजर्वेशन बोर्ड को ढूंढ़ने आगे निकल गया। एक जगह लोगों की भीड़ लगी थी। लोग अपना नाम देखने की कोशिश कर रहे थे। मैं भी भीड़ में घुस गया। आरक्षण चार्ट के पास पहुँचने पर मैंने  पाया कि मैं कुछ पढ़ नहीं पा रहा हूँ। दरअसल में मैं जल्दी के कारण अपना चश्मा लाना भूल गया था। मैंने बहुत कोशिश  की पर कुछ भी नहीं पढ़ पाया। पीछे से लोग जोर लगा रहे थे। सभी को जल्दी थी कि वे ट्रेन में जल्दी से जल्दी बैठें।

            मेरे लिये बड़ी मुश्किल थी। चश्मे के बिना में पढ़ा लिखा अनपढ़ बन कर रह गया था। मुझे  महसूस हुआ कि आंखे कमजोर होना जब इतना परेशानी भरा है तो अन्धा होना कितना बड़ा श्राप है। इन मुश्किल क्षणों में मैंने बगल में खडे़ अपने हमउम्र लड़के से फरियाद की- ”भाई, जरा एल0 एम0 त्रिपाठी का रिजर्वेशन देख दीजिये।

            उसने मुझे झिड़कते हुये कहा-  ”अन्धे हो क्या ? खुद क्यों नहीं देख लेते।फिर वह बड़बड़ाता हुआ भीड़ से बाहर चला गया।
            मैं चश्मा साथ होने के कारण कितनी बेइज्जती झेल रहा था। मैंने मन ही मन सोचा कि यदि मैं अंधा होता तो क्या होता। मुझे सुबह मेरी स्कूटी से टकराये अन्धे की याद गयी मैंने भी उसको कितना भला बुरा कहा था।हे ईश्वर , मुझको माफ करना। मैं बहुत खराब आदमी हूँ अब मैं कभी ऐसे काम करूँ मैंने मन ही मन  प्रार्थना की। मुझे अपनी सभी बद्तमीजियाँ  एक एक करके याद रही थीं और पछतावा हो रहा था।

            ”आओ, मेरा रिजर्वेशन हो गया है।“  पीछे से ताऊ जी ने आवाज दी। पछतावे के साथ मैं धीरे-धीरे ताऊ जी के पीछे चल दिया।
            ”भगवान किसी की आंखे खराब मत करना।ऐसे भाव अब मेरे मन में उठ रहे थे।

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

पार्वती बाई Hindi story by Hem Chandra Joshi


पार्वती बाई

कहानीः हेम चन्द्र जोशी  


आजकल पता नहीं मुझे क्या हो गया है । जाने अनजाने मेरी घर में किसी न किसी बात पर बहस हो  ही जा रही थी। ऐसा हो क्यों रहा हैं? मुझे स्वयं भी समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु एक बात मैं भली  भांति  जानता था कि मेरा पक्ष सदैव ही सही होता था। पर घर के लोग मेरी बातें अनसुनी कर दे रहे थे। तो क्या छोटों की सही बातें भी  बड़ो  ने नहीं सुननी चाहिये ? ऐसा अक्सर मेरे मन में विचार आता रहता था और मैं मन ही मन शायद खीझ सा जाता था।

एक दिन  मैंने मम्मी को पापा से बातें करते हुये सुना । मम्मी कह रही थीं- ‘‘अतुल आजकल बड़ा हो रहा है। उस पर ध्यान देने की  आवश्कता  है। आप कुछ समय अतुल को भी दिया करें।“
पापा ने धीरे से हामी भरी और बोले- ”क्या करूँ। चाहते हुये भी बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाता हूँ।  कोशिश  करूँगा।“

फिर बात आयी-गयी हो गयी क्यों कि पापा के पास तो आफिस के कामों से ही फुर्सत नहीं थी। अक्सर उनको टूर में जाना पड़ता था। फिर वे आफिस से आते भी काफी देरी से थे। ऐसे में पापा से बहुत ज्यादा बातचीत करना संभव ही न था। पर एक दिन पापा ने मुझको बुलाया और पूछा- ”अतुल आजकल तुम्हारी  पढाई  कैसी चल रही है? घर में तो तुम ज्यादा पढ़ाई करते दिखते नहीं हो।“
”ठीक चल रही है पापा । आप तो टीचर-पेरेन्टस मीटिंग में कालेज आते नहीं । नहीं तो आप मेरी टैस्ट की कापियाँ खुद देख लेते। “ -मैंने कहा।
”यह बात तो सही है।“- पापा ने हामी भरते हुये पूछा-”फिर भी कैसे हुये तुम्हारे टैस्ट । तुमने तो कुछ बताया ही नहीं।“
”बहुत अच्छे हुये पापा। टीचर कर रही थी कि यह लड़का इस बार कक्षा मे प्रथम आ सकता है। सभी बच्चों ने ऐसा ही काम करना चाहिये।“- मैंने उत्तर दिया।
”गुड, वेरी गुड।“ - पापा ने मुस्कराते हुये कहा और पूछा-”दोस्तों के साथ कैसा चल रहा है?“
”बढि़या चल रहा है। अनुज आजकल खेलने नहीं आ रहा है। उसके दादाजी बीमार हैं। ज्यादातर बच्चे आने वाली परीक्षाओं को देखते हुये खेलने कम ही आ रहें हैं।“- मैंने उत्तर दिया।
”भाई तुम भी खेलना कम करों और दूसरों की तरह पढ़ाई में ज्यादा ध्यान दो।“-पापा ने कहा।

”पापा ये सभी लोग अपना काम समय पर नहीं किया करते हैं इसलिये अब आखिरी समय पर उछल-कूद मचा रहे हैं। मैं तो अपने कार्य नियमित रूप से करता  हूँ । इसी लिये मेरे ऊपर परीक्षाओं का कोई दबाव नहीं है।“- मैंने कहा।
पापा ने मुझे बडे़ गौर से देखा और मेरे  आत्मविश्वाश  को देखते हुये उनके चेहरे पर एक चमक सी आ गयी । वे प्रसन्न थे।
 मैंने मौका ठीक जान कर मन ही मन सोचा कि क्यों न अपने मन की बात पापा से कह  दूँ । अतः मैंने कहा- ”पापा एक बात पूछूँ?“
”हाँ हाँ क्यों नहीं“-पापा ने कहा।
”क्या छोटों की बात को बड़ों ने ध्यान नहीं देना चाहियें ?“- मैंने कहा।
क्यों   क्या बात हुयी ?“- पापा ने  चौंक  कर पूछा।
”पापा मैंनें जाने कितने समय से घर  में  सब से कह रहा हूँ कि यह हमारी काम वाली बर्तन ठीक से साफ नहीं कर रही है पर कोई ध्यान ही नहीं देता । मुझे रोज कुछ न कुछ गन्दा मिलता है। कभी गिलास, कभी चम्मच तो कभी थाली। पर कोई पार्वती बाई से कोई कुछ कहता ही नहीं है और पार्वती बाई मेरे कहे पर सिर्फ हँस देतीं  है । मेरी बात पर कोई ध्यान देती ही नहीं है।“- मैं एक साँस में पूरी की पूरी बात कह बैठा।
पापा कुछ नहीं बोले। तब मैंने फिर कहा- ”पापा आप काम वाली को बदल क्यों नहीं देते?“
”बेटे, पार्वती हमारे वहाँ तुम्हारे पैदा होने से पहले से काम कर रही है। उसको एकाएक तो हम ऐसे निकाल नहीं सकते। फिर भी मैं  उससे बात करूँगा।“- पापा ने कहा।
”पापा आप उसको डाटियेगा जरूर।“-मैंने खुश होकर कहा।
”ठीक है।“ -कह कर पापा अन्दर चले गये।

दो चार दिन बीत गये। मुझे लगा कि पापा भूल गये होंगे। इसलिये मैंने  मौंका  देखकर पार्वती बाई के साफ किये वे बर्तन दिखाये जिन पर किसी पर साबुन लगा रह गया था या जो ठीक से साफ नहीं हुये थे। पापा ने मेरी बात को ध्यान से सुना और फिर रविवार के दिन पार्वती बाई को समझाते हुये कहा-”पार्वती, आजकल बर्तन ठीक से साफ नहीं हो रहे हैं। कभी-कभी तो इनमें साबुन लगा रह जा रहा है। आप थोड़ी ध्यान से सफाई किया करो।“

”जी साहब।“- पार्वती ने कहा और बोली- ”साहब छोटे भय्या भी शिकायत कर रहे थे। क्या  करूँ  साहब यह बुढ़ापे की वजह से सब गड़बड़ हो जाती है। मैं छोटे भय्या की शिकायत के बाद से ही काफी ध्यान दे रही हूँ।“

बात आयी और गयी । पार्वती बाई के बर्तनों में अब पहले से कम शिकायत थी। फिर भी यदा-कदा गड़बड़ हो ही जाती थी। जो मुझको परेशान करती थी। मुझे ऐसा लगने लगा कि घर वाले और पार्वती बाई भी मेरी बातों में कोई विशेष महत्व नहीं दे रहे हैं।

फिर छुटिटयों में मेरे बड़े भय्या आ गये। मैंने फिर अपना दुखड़ा उनके सामने रोया तो उन्होने मुझसे कहा-”अतुल, पार्वती बाई हमारे घर  में  सालों से काम कर रही है। इस बुढ़ापे में उनको काम से निकालना उचित नहीं है। मैं फिर भी कुछ न कुछ करता हूँ।“
 फिर मैंने एक दिन देखा कि भय्या और पार्वती बाई बहुत देर तक आपस में बातें करते रहे और फिर बाई ने सहमति से दो तीन बार सिर हिला कर हाँ कहा। फिर अगले दिन शाम को जब मैं खेलकर लौटा तो मैंने पाया कि पार्वती बाई भाई साहब के स्कूटर से नीचे उतर रही थी।

तीन चार दिन बाद भाई साहब वापस लौट गये पर एक बात बड़ी विचित्र  हुयी । भाई साहब के जाने के बाद से पार्वती बाई के बर्तनों में अब कोई कमी मैं नहीं  पकड़  सका। बर्तन अब चकाचक साफ मिलते थे। मैं अब बाई के काम से प्रसन्न था। पर यह चमत्कार कैसे हो गया मैं समझ नहीं पाया।
एक सप्ताह बीता और फिर धीरे धीरे पन्द्रह दिन भी बीत गये पर अब पार्वती बाई के काम में कोई कमी नहीं थी। तब मेरे से रहा नहीं गया। मैंने बाई से कहा -” बाई मैंने कहा, पिताजी ने कहा, मम्मी ने कहा पर आपने बिलकुल ध्यान नहीं दिया। पर अब भय्या ने तुमसे ऐसा क्या कह दिया कि तुम ठीक से बर्तन साफ करने लगी हो।“

पार्वती बाई खिलखिला के हँस दी और काफी देर तक हँसती रहीं । मुझे समझ में नहीं आया कि इसमें हँसने की क्या बात थी। उनको इतनी हँसी आयी कि नाक से उनका चश्मा नीचे निकल सा पड़ा। जब पार्वती बाई ने चश्मा ऊपर को किया तो एकाएक मुझे याद आया कि पार्वती बाई तो चश्मा पहनती ही नहीं है। आज यह चश्मा एकाएक उनकी नाक में कहाँ से आ गया?

”बाई आप ने यह चश्मा लगाना कब से शुरू कर दिया?“- मैंने एकाएक पूछा।

“यह ही तो तुम्हारे भय्या का कमाल है।”- पार्वती बाई बोली-“भय्या, मुझे आंखो के डाक्टर के पास ले गये और मुझे यह चश्मा बनवा कर दे दिया। बस हो गया तुम्हारी समस्या का समाधान । मैं अब अच्छी तरह देख सकी हूँ अतः बर्तन गन्दे छूटने का तो अब कोई सवाल ही नहीं है।”

मैं ठगा सा रह गया। मैं जान गया कि भय्या कितने होशियार हैं कि  उन्होंने  एक ही क्षण में हम सब की समस्या का समाधान कर दिया। पर मैं अब भी फुर्सत के क्षणों में सोचता हूँ कि इस बात की अक्ल मुझे क्यों नहीं आयी?



हिंदी कहानी पार्वती बाई

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

अनुभूति Hindi story by Hem Chandra Joshi

अनुभूति


 

            मैं कक्षा चार में पढ़ती थी और मेरे छोटे भाई ने अभी स्कूल जाना भी शुरू नहीं किया था। पता नहीं मां को क्या हो गया था। वह अक्सर बीमार हो जाती थीं। हमारे घर अक्सर डाक्टर अंकल आते थे। तीन चार दिन दवा खाने के बाद मां कुछ ठीक हो जाती थीं और वे एक बार फिर रोजाना के कामों में व्यस्त हो जाती थीं। बागवानी से मां का विशेष शौक था।  तरह-तरह के फूल, फल व सब्जियों को उगाना उनके जीवन का एक हिस्सा था। पिताजी उनको काम करता देखकर अक्सर नाराज होते थे। पर मैं या तो उनको चारपाई पर बीमार देखती थी या फिर कड़ी मेहनत करते हुये। पिताजी को अक्सर आफिस के काम से बाहर ही रहना पड़ता था।

                        एक दिन पिताजी ने मां से बातचीत की। उनका मानना था कि मेरी देखभाल घर में ठीक-ठाक नहीं हो पा रही है क्योंकि मां का स्वास्थ ठीक नही रहता था। वह भी बच्चों को घर में ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि उनको अक्सर आफिस के काम से बाहर रहना पड़ता है। इस कारण से मां के ऊपर बच्चों का बोझ पड़ जाता है। यही उनका मानना था। इसलिए उन्होंने हम दोनों को नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में भेजने का फैसला कर लिया था ताकि मां के ऊपर कुछ बोझ हल्का हो सके। किन्तु मां इसके लिये तैयार नहीं थी। उनका कहना था कि बच्चों  को अभी मां-बाप की बहुत जरूरत है। फिर बिटटू तो अभी बहुत छोटा है। बहुत देर तक दोनों आपस में बातें करते रहे और अन्ततः केवल मुझे नैनीताल भेजने का निर्णय ले लिया गया। मां की इच्छा न होते हुये भी पिताजी एक सुबह मुझे लेकर चल दिये। मां उस दिन भी बीमार थी। मेरे विछोह ने मां का चेहरा और भी क्लान्त कर दिया। मैं बहुत रोई। मुझे घर छोड़ने की तनिक भी इच्छा न थी । मैंने अपनी डबडबायी आंखों से मां के पीले चेहरे को देखा । मां अशक्त थी। पर मां के क्लान्त चेहरे पर आयी वेदना को मैं मन ही मन समझ गयी। मां की आंखे कह रही थी जा बेटी, खूब मेहनत करना। मेरे वश में अब कुछ नहीं है। पिताजी शायद तेरे भले के लिए ही यह सब कर रहे हैं।मैंने रोते हुये मां से पूछा-मां तुम मुझसे मिलने कब आओगी, आओगी न? "मां" कुछ नहीं बोली। उसने डबडबायी आंखों से स्वीकृति के साथ सिर हिला दिया। पर उनके मन में स्वयं ही शायद एक प्रन था। क्या ऐसा दिन वास्तव में कभी आयेगा ईवर?

            पिताजी मेरा नैनीताल में एडमीशन कर के चले गये। मैं बहुत रोई व गिड़गिड़ा़यी। पर पिताजी का हृदय न पसीजा। पिताजी इतने कठोर हो सकते हैं, मैंने कभी सोचा भी न था। मेरे उन उदास दिनों में मेरा साथ दिया उमा दीदी ने। उमा दीदी हास्टल में हमारे कमरों की मानीटर थीं। वे मुझसे पांच-छह वर्ष  बड़ी होंगी। मुझे रोता देखकर वे मुझे समझाने मेरे पास आ जाती थीं। एक दिन मेरी मां की बीमारी की बात सुनकर वे दुखी हो गयीं। उन्होंने बताया कि उनकी मां नहीं है। इसलिये पिताजी ने उन्हें हाॅस्टल में भेज दिया है। जब मैं मां के बारे में बात करती तो वे बड़े चाव से सुनती। मुझे लगता था कि जैसे बातें सुनकर उमा दीदी अपनी मां की यादों में खो जाती हैं और कुछ पल वे अपनी मां के सानिध्य में बिताने का आनन्द प्राप्त कर लेती हैं । बस सदैव उनके मुंह से मेरी बातें सुनकर एक ही बोल फूटता था- हां, बस ऐसी ही मेरी मां भी थी । उनकी बातें सुन कर मैं सोचती थी कि क्या सभी मांऐ एक जैसी ही होती हैं? कैसी होंगी उनकी मां ? क्या बिल्कुल मेरी मम्मी की तरह?

            समय बीतता गया। मैं जाड़ों की लम्बी छुटिटयों में इस आशा से घर आयी कि मां ठीक हो गयीं होगी। अब मुझे वापस हास्टल नहीं जाना पड़ेगा। पर नियति कुछ और ही थी। मुझे सदैव ही मां को छोड़कर वापस नैनीताल जाना पड़ता था। मां मेरे लिये ढेर सारे शकर-पारे, लड्डू व मठरियां बना कर भेजती थीं। उमा दीदी और मैं अक्सर साथ-साथ बैठ कर उन्हें खाते और मां की बातों करते थे। तीन-चार वर्ष बीत गये। उमा दीदी ने मुझे पहाड़ी नीबू की फूट चाट बनाना सिखा दिया। मैं अब ढेर सारे पहाड़ी नीबू लेकर छुट्टीयों में घर आती थी । जब मैंने पहली बार पहाड़ी नीबू की चाट बनाते वक्त नीबू में मूली, दही, नमक, चीनी व मसाला सब एक साथ मिलाया तो मेरी मां चैंक पड़ी । उन्होंने कहा कि यह सब मिलकर जो जहर बन जायेगा। पर पहाड़ी नीबू के इस जहर का अपना ही स्वाद था। एक बार जो खा ले वह चटकारे लेते ही रह जाता था। मां समझ गयी कि मुझे यह चाट बहुत पसन्द है । छुटिटया बिता कर मैं फिर वापस चली गयी। मां ने मेरे लाये नीबूओं के बीज क्यारी में बो दिये। जब मैं दोबारा छुटिटयों में घर आयी तो ये बीज छोटे-छोटे पौधों की शक्ल ले चुके थे।

            मैं जब भी छुटिटयों घर आती तो उमा दीदी एक ही रट लागाती थीं। इस बार तुम जरूर मां  को नैनीताल लेकर आना। वे एक दो दिन यहां रूक कर अंकल के साथ वापस चली जायेंगी। मेरी बहुत इच्छा है कि मैं उनके दर्शन करूं। मैं सदा हामी भर देती थी। मुझे सदैव यही आशा रहती थी कि मां  इस बार ठीक हो गयी होंगी। जब मैं वापस लौटती तो मैं उमा दीदी से यही कहती थी कि मां अभी ठीक नहीं है। अब वे अगली बार आयेंगी। तब उमा दीदी मां के दर्शन के लिये अगली बार की प्रतीक्षा में लग जातीं।

            पर यह अगली बार कभी नहीं आया। फिर एक बार घर से एकाएक मेरे चाचा जी नैनीताल पहुंचे। कभी भी छुटटी न देने वाली सिस्टर ने मुझे छुटटी दे दी। मैं मां से मिलने के लिये खुशी खुशी चाचा जी के साथ चल दी। चाचा जी ने रास्ते मे बताया कि मां की तबीयत ठीक नहीं है। इसीलिये पापा ने मुझे  बुलवाया है। मैं घर पहुंची तो मुझे  कुछ समझ नहीं आया। घर मे ढेर सारे रिश्तेदार थे। ड्राईगरूम में मां की एक बडी सी तस्वीर लगी हुयी थी। ऐसा लगता था कि मां मेरे स्वागत के लिये खड़ी है और अपना स्नेह भरा हाथ मेरे सिर में रखने ही वाली हैं। थोड़ी ही देर में मुझे पता लग गया। मां अब नहीं थी। मात्र उनकी फोटो रह गयी थी और कुछ यादें । मैं उदास हो गयी। चैथे दिन नैनीताल से मुझे उमा दीदी का पत्र मिला । मेरी छुटटी के प्रार्थना पत्र में मेरी मां  देहावसान की सूचना दी गयी थी। सारे स्कूल को मेरी मां की मृत्यु की सूचना मिल गयी थी । एक मैं ही थी जिसे इस बात की जानकारी घर पहुंच कर हुयी । उमा दीदी ने लिखा थाः-

प्यारी सुरूचि,

            तुम्हारी मां की मृत्यु का समाचार सुनकर हम सभी दोस्त व्यथित हैं। किसी भी स्नेही का विछोह हमारे लिये दुखदायी होता है। किन्तु  माता के विछोह का दुख तो अकल्पनीय है। मैं इसको भली भांति समझ सकती हूं। किन्तु  क्रूर समय की यह नजाकत है कि वह किसी को भी नहीं छोड़ती है। हम सभी नश्वर हैं। ऐसे मौकों एक ही बात रह जाती हैं कि हम अपनी सहनशक्ति को और गहरायी तक खोजें तथा भगवान की इच्छा के सामने नत-मस्तक हो जायें। सचमुच, इस दुनिया में मां का कोई पर्याय नहीं है। मुझे सदैव इस बात का अफसोस रहेगा कि कि मैं उनके दर्शन न कर सकी। तू यह मत समझना कि मां तुम्हारे साथ नहीं हैं । वे आज भी किसी न किसी रूप में हमारे साथ जीवित हैं। उनकी बातों को याद रखना। तुम पाओगी कि हर जरूरत के मौके पर वे सदैव तुम्हारे आस पास ही होंगी। सच, वे आज भी हमारे साथ हैं

तुम्हारी दीदी
उमा
            सच, उमा दीदी का पत्र पढ़कर दुख की उस बेला में मुझे असीम शक्ति व शान्ति प्राप्ति हुयी। मैं ने शाम तक उस पत्र को कई बार पढ़ा।

            दिन बीतने लगे। जीवन की दिनचर्या फिर वापस चलने लगी। धीरे-धीरे सभी रिश्तेदार भी चले गये। दुख कुछ कम हो गया और यादें रह गयीं । सच, समय जिसने इतना क्रूर आघात किया था अब वह मलहम बनकर मेरे साथ था। जीवन की यह कैसी विडम्बना थी? मैं कभी समझ नहीं पायी।

            फिर आगे का समय कुछ ऐसा कटा कि मैं छुटिटयों में घर वापस ही न आ पायी।  मां के जाने के बाद घर घर नहीं रह गया था । बिट्टू भी मेरे साथ हास्टल आ गया था। घर आने को कोई कारण भी न था। हम दोनों को सदैव मां की याद आती थी। फिर एक जाड़ो की छुट्टियों में मैं और बिट्टू घर वापस आये। रात भर मुझे मां की याद आयी। सुबह जब मैं आंगन में टहलने को आयी तो मैंने देखा कि अमरूद के पेड़ से ढेर सारे तोते मेरी आहट सुनकर फुर्र से आकाश में उड़ चले थे। तोतों के खाये ढेर सारे अमरूद नीचे बिखरे पड़े थे। मुझे एकाएक मां की याद आ गयी । तेज बरसात के बीच मां ने यह अमरूद का पेड़ रोपा था। पिताजी मां पर बहुत नाराज हुये थे क्योंकि मां भीग गयी थीं। उन्होंने कहा था कि वह क्यों नाहक यह पेड़ लगा रहीं हैं। दीवार के किनारे का यह पेड़ जब बड़ा हो जायेगा तो आसपास के बच्चे अमरूद तोड़ ले जायेंगे। हम लोगों को एक भी अमरूद प्राप्त नहीं होगा। मां कुछ नहीं बोली । फिर उन्होंने कहा-ठीक है, कुछ फल आसपास के बच्चे खायेंगे और कुछ तोते । एक आध फल तो हमको भी जरूर मिल जाया करेगा। फिर ढेर सारी छाया तो यह पेड़ जरूर हम ही को देगा। मैं तो बच्चों की किलकारियों और तोतों की आवाज से ही अपना पेट भर लूंगी। आखिर हमारे आंगन में सदा जीवन तो रहेगा।तब पिताजी ने नाराज होकर कोई उत्तर न दिया था। तभी हवा के झोंको ने मां के लगाये नीबू के पेड़ कों हिला दिया। उसकी एक डाल ने हौले से मेरे माथे को सहला सा दिया । मैंने ऊपर की ओर देख। पहाड़ी नीबू  के छोटे-छोटे दाने नीबू के पेड़ पर हिल रहे थे। डाल का स्पर्श मां के ममतामयी स्पर्श के भांति ही था। मुझे लगा कि मां की ममता आज भी मेरे साथ है। मां आंगन में लगे अमरूद, नीबू, अनार व आढू  आदि के पेड़ों के रूप में आज भी हमारे साथ जीवित हैं। मुझे एक बार फिर उमा दीदी की याद आ गयी। उन्होंने अपने  पत्र में लिखा था कि मां सदैव हमारे साथ ही रहेंगी। सच, उन्होंने सच ही लिखा था। आज मां मेरे पास नहीं हैं पर उसकी भावनाओं को मैं इन पेड़ो के रूप  में स्पष्ट रूप से देख रही हूं। आज भी मुझे  अपने पास मां की अनुभूति हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे वह अद्र्श्य रूप से मेरे आस पास ही है।
हिंदी कहानी अनुभूति

शनिवार, 14 अगस्त 2010

Hindi Story: एक नम्बर

एक नम्बर 
कहानी : अनीता जोशी

 

हाईस्कूल में जब मैं कालेज में प्रथम आया तो एकाएक मैं सब की नजर मे आ गया। मेरा आत्म विश्वास बढ.ने के साथ  एक और चीज में भी बढ़ोत्तरी हो गयी । वह था मेरा घमण्ड। अब मैं अपने को कुछ अलग सा समझने लगा था। यह एकाएक कैसे हो गया मुझे पता ही नहीं हुआ। ग्यारहवीं कक्षा में पहुँचने पर सब कुछ बदल सा गया था। कक्षा के बदलने के साथ ही हमारे टीचर भी बदल गये। उन्होंने हमको इससे पहले नहीं पढ़ाया था। किताबें भी काफी मोटी हो गयी थी और विय  काफी कठिन।

पहले ही दिन टीचरों ने कक्षा में हम लोगों के नाम पूछने के साथ-साथ हाईस्कूल में प्राप्त अंको के बारे में भी पूछा। मैंने सभी को बड़े ही गर्व से बताया। मेरे हाव भाव पर किसी ने गौर किया कि नहीं, मैं जान नहीं पाया। पर अंग्रेजी के टीचर राना सर ने शायद मेरी अदा को कुछ अन्यथा ही  लिया। वह बोल पड़े,- “बेटा बहुत ही खुशी  की बात है कि तुमने कालेज में टौप किया है पर कालेज में हाईस्कूल में बच्चे ही कितने थे ? मुश्किल से मात्र दो सौ । अब तुम्हारा मुकाबला उन लाखों बच्चों से होगा  जो मेडिकल एवं इन्जीनियरिंग की परीक्षाओं में बैठेगें। तब पता चलेगा कि ऊँट कितने पानी में है।


मुझे राना सर की बात कतई पसन्द नहीं आयी। मुझे लगा कि उनको मेरे अंको को देख कर शायद कुछ  जलन सी हो गयी । पर क्यों ? मैं समझ नहीं पाया । मैने पाया कि उनका व्यवहार अन्य छात्रों  के प्रति भी कुछ ऐसा ही था। वे बार बार आगाह कर रहे थे कि हाईस्कूल के अंको पर घमण्ड करने की कोई वजह नहीं है।

धीरे-धीरे ग्यारहवीं कक्षा को भी हम पास करे गये। पर राना सर के व्यवहार में कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ । वे यदा कदा हम लोगों को धमकाते ही रहते थे। हम लोगों की भी अब उनसे डाँट खाने की आदत सी पड़ गयी।
12वीं कक्षा में पहुँचते-पहुँचते हम लोगों के कुछ पर से निकल आये। हम कुछ उद्दण्ड  भी हो चले । कभी-कभी मौका निकाल कर हम स्कूल की दीवार फ़ाँद कर स्कूल से भाग भी जाया करते थे।

उस दिन फिजिक्स का प्रैक्टिकल था । मैं घर से पढ़ कर  नहीं आया था। इसलिये मेरे लिये प्रैक्टिकल  को समझ कर करना संभव नहीं था। अतः मैंने स्कूल से दीवार फ़ाँद कर भागने की सोच रखी थी। जैसे ही छठे पीरियड के समाप्त होने की घण्टी बजी, मैं चट से दीवार फ़ाँद कर बाहर कूदने को दौड़ा। अभी मैं दीवार पर आधा ही चढ़ा था कि किसी ने पीछे से मुझे नीचे खींच लिया । मैं ने  मुड़ कर देखा तो पाया कि राना सर खडे़ थे। उन्होंने डाँटते हुये मुझसे पूछा  बेटा  कहाँ भाग रहे थे? ”

मैं हक्का-बक्का रह गया। मेरे मुॅह से आवाज नहीं निकल रही थी कि क्या उत्तर दूँ। घबराहट में मैंं बोल पड़ा-कहीं भी तो नहीं। मैं तो खाली ऐसे ही प्रैक्टिस कर रहा था।


तो फिर यह बस्ता तुम्हारे पीछे क्यों टॅगा है। क्या यह भी प्रैक्टिस कर रहा है तुम्हारे साथ । ” -राना सर ने घूर कर पूछा।

अब मैं निरुत्तर था। तब राना सर ने दोबारा पूछा- किस चीज की क्लास है अब तुम्हारी?“

जी, फिजिक्स का प्रैक्टिकल है। मैंने सिर झुका कर कहा।

पढ़ के नहीं आये थे प्रैक्टिकल इसीलिये भाग  रहे हो क्या ?“ राना सर ने कहा-आ जाओ, मेरे साथ चलो आफिस में।

 मैं समझ गया कि अब मेरी प्रिन्सिपल के सामने पेशी  होने वाली है। मैं सिर झुकाये उनके पीछे चल दिया और मन ही मन  सोचने लगा- इस राना के बच्चे को फिजिक्स की क्या समझ है जो नाहक मेरे पीछे पड़ा है।

 पर वह मुझे लेकर अपने आफिस पहुँच गये और बोले- कौन सा प्रैक्टिकल  था तुम्हारा आजमुझे किताब खोल कर दिखाओ ।” 
आप को क्या समझ मैं आयेगा प्रैक्टिकल?“ -मैंने खीझ कर उनसे कहा।


राना सर मुस्करा दिये। मैंने भी बड़ी बेरूखी से किताब खोल कर उनकी ओर बढ़ा दी ।

राना सर ने पता नहीं सरसरी निगाह से क्या देखा और फिर उस प्रयोग से संबन्धित चार प्रश्नॊ में निशान लगा कर मेरी ओर बढ़ाते हुये कहा- अब तुम बैठकर इस पाठ को पढ़ो और निशान लगाये चार प्रश्नॊ का मुझे उत्तर दो। इसके बाद मैं तुम्हें छोड़ दुँगा अन्यथा मैं तुम्हें प्रिन्सिपल के पास ले जाऊँगा। जानते हो यह पाठ बहुत महत्वपूर्ण है।
 मैंने मन ही मन राना सर को कोसा और सोचा- अंग्रेजी का टीचर अब हमें फिजिक्स पढ़ायेगा। यही होना तो अब बाकी है।और फिर मन मसोस कर पाठ को पढ़ने लगा और बहुत देर तक पढ़ता रहा। जब तक सब समझ में नहीं आ गया। पढ़ने के बाद मैंने उनसे प्रश्न सुन लेने के लिये  कहा।

तब राना सर ने कहा- अब समय हो गया है किसी और दिन सुनुँगा। पर बताओ तुमको  सब याद हो गया कि नहीं ?“

मैंने सहमति से सिर हिलाया और मन ही मन कहा- बच्चू, तुम क्या समझोगे फिजिक्स के प्रश्न-उत्तर।

समय बीतता गया और राना सर यदा-कदा मुझे उस घटना की याद दिलाते हुये कहते रहते थे कि एक  दिन वे प्रन-उत्तर जरूर सुनेंगे। मैं सहमति से हामी भरते हुये मन ही मन कहता- सर, यह अंग्रेजी का पाठ थोड़ी है जो समझ लेंगे। यह तो फिजिक्स है फिजिक्स।

फिर इण्टरमीडियेट बोर्ड की परीक्षायें हुयीं और मैंने पाया कि उसमें तीन नम्बर का सवाल उसी पाठ से आया था जो राना सर ने मुझसे जबरदस्ती  पढ.वाया था। इससे ज्यादा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब मैंने पाया कि प्री-इन्जीनियरिंग की परीक्षा में भी एक छोटा सा सवाल उसी पाठ से आया था जिसे मैं आसानी से कर गया।

इण्टरमीडियेट का रिजल्ट आया और मैं अच्छे नम्बरों से पास हो गया । प्री-इन्जीनियरिंग  की परीक्षा में भी मैं पास हो गया। जब मैं एडमिन हेतु इन्जीनियरिंग  की काउन्सिलिंग में गया तो मेरा  एडमिन कम्प्यूटर साइन्स में हो गया और वह भी एक अच्छे कालेज में। काउन्सिलिंग में बैठ एक प्रोफेसर ने मुझसे कहा- बेटे तुम बहुत भाग्यशाली हो। यदि तुम्हारा एक नम्बर भी फिजिक्स में कम होता  तो तुमको यह ब्रान्च नहीं मिलती । यह आखिरी सीट थी।

मैंने उनको धन्यवाद  कहा और एकाएक मुझे राना सर की याद आ गयी । काउन्सिलिंग से वापस लौटने के अगले दिन मैं सीधे अपने स्कूल पहुँचा और मैंनें राना सर के पैर छूते हुये सारी बातें बताई और कहा- सर आज मुझे आपके कारण अपनी मन पसन्द ब्रान्च मिल पायी है। पर सर आपको कैसे मालूम चला कि वह  पाठ इतना महत्वपूर्ण है?“

राना सर जोर से हॅस पडे.। फिर अपनी बचपन की बात को याद करते हुये कुछ रुसे हो कर बोले-बेटे, मैं ने भी इण्टरमीडियेट तक साइन्स पढ़ी  है। इन्जीनियरिंग परीक्षा में एक नम्बर कम आने से मेरा एडमिन नहीं हो पाया और मैं इन्जीनियर नहीं बन सका। जानते हो मेरी परीक्षा में इसी पाठ से पॉच नम्बर का सवाल आया था पर मैं ठीक से  पढा न होने के कारण गलती कर गया था।“  मैंने देखा कि उनकी आँखें कुछ नम हो गयी थीं। उन्हें आज भी अपने समय से पढाई न करने की वजह से हुयी चूक से हुयी अपूर्णीय क्षति के लिये दिल के किसी कौने में गहरी टीस थी।
Hindi Story : एक नंबर