शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

शिखर की अंतरिक्ष यात्रा By Hem Chandra Joshi


बाल उपन्यास
शिखर की अंतरिक्ष यात्रा



शिखर बहुत खुश था क्योंकि उसे अभी अभी अपने मामा जी का पत्र मिला था. उस के मामा अंतरिक्ष में स्थित भारत के विक्रम साराभाई नगर में वैज्ञानिक थे. पत्र इस प्रकार थाः

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष नगर,
दिनांक 22 नवंबर, 2025

प्रिय शिखर ,
सदा खुश रहो तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है. मुझे एक विशेष वैज्ञानिक योजना में काम करना है. जिसमें मैं बार-बार अंतरिक्ष नगर व पृथ्वी के बीच भ्रमण करूंगा. इस बीच यदि तुम चाहो तो 4-5 दिन के लिए मेरे साथ अंतरिक्ष नगर आ सकते हो. अपने माता पिता से पूछ कर चलने कि योजना बना लेना. यहाँ रजत और कनी तुमको बहुत याद करते हैं .

बहुत बहुत प्यार. शेष मिलने पर.


तुम्हारा,
छोटा मामा


शिखर अक्सर मामा जी के पास जाने की कल्पना करता था. उसकी बहुत इच्छा थी कि वह चन्दा मामा व प्यारी धरती को एक साथ निहार सके. उसने पुस्तकों में धरती के अनेक चित्र देखे थे. विज्ञान की किताबो में पढ़ा था कि पृथ्वी भी चंद्रमा की तरह गोल है. वह सोचता था कि अंतरिक्ष से अपनी धुरी पर घूमती हुई धरती कैसी दिखाई देती होगी ? शायद आकाश में लटके एक बडे ग्लोब की भांति , किसी लट्टू की तरह चक्कर काटती दिखई देती होगी ? वह सोच सोच कर रोमांचित हो उठता था.

इसीलिए वह मामाजी से मिलने पर सदा एक ही प्रश्न करता था, ”अंतरिक्ष से धरती कितनी तेजी से घूमती हुई दिखलाई देती है?“

तब मामा हंस कर कहते, ”’शिखर तू तो बिलकुल बुद्वू है. पृथ्वी कोई घूमती हुई थोड़ी दिखती है.... वह तो बिलकुल ऐसे ही दिखती है, जैसे कि चंद्रमा “

शिखर यह सुन कर सोच में पड़ जाता. उसे कुछ समझ में न आता था. मामा की यह बात उसे बार बार चक्कर में डाल देती थी. उसे कक्षा में बताया गया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर लट्टू की भांति घूमती है, जिस के कारण यहां रात और दिन होते हैं. पृथ्वी जरूर घूमती दिखाई देनी चाहिए. उस का विचार था कि मामा ने ध्यान से धरती को कभी देखा नहीं होगा. वह अचकचा कर पूछता, ”बिलकुल चन्द्रमा की तरह ? तो पहचान कैसे करूंगा?“

मामाजी हंस कर कहते, ”अब तुम को एक बार अंतरिक्ष में ले जाना ही पडे़गा. सच, धरती अंतरिक्ष से बहुत संुदर दिखती है. इस को तो अपने हरे रंग के कारण कोई भी पहचान सकाता है.“

अब मामाजी अपना वादा पूरा करने वाले थे. शिखर ने अंतरिक्ष नगर जाने की तैयारी जोर शोर से शुरू कर दी. एक अटैची में ढेर सारा सामान एकत्र करना शुरू कर दिया. शिखर के पिताजी ने उसे समझाया कि उसे कम से कम सामान ले कर जाना चाहिए. पर सामान कम रखते रखते भी उस की अटैची भारी हो गई, इतनी भारी कि उस के लिए उसे ले कर चलना मुश्किल हो गया. लेकिन उस के हिसाब से सभी सामान जरूरी था. उस ने घर में किसी की बात न सुनी.

मामाजी के आते ही उस ने शिकायत की. तब उन्होंने कहा, ”कोई चिंता की बात नहीं है. मेरे पास अपना कोई सामान नहीं है, इसलिए मैं सब कुछ संभाल लूँगा .“
शिखरप्रसन्न हो उठा। उस को ख़ुशी थी कि वह रजत व कनी के लिए खरीदे हुए उपहार, यानी चाकलेट व खिलौने आसानी से ले जा पाएगा जो उसे इनाम में मिली थीं. आखिर किताबें दिखा कर उस ने मामी से भी तो शाबाशी लेनी थी.



अन्तरिक्ष मे चोरी 

आखिर एक दिन वह मामा के साथ अंतरिक्ष स्टेशन  में पहुंच गया. अंतिरक्ष शटल  में बैठने से पहले उन्हें विशेष  प्रकार के कपडे दिए गए, जिन का नाम अंतरिक्ष सूट था. आव’यक सुरक्षा जांच के बाद वे अपनी सीटों पर जा बैठे. अटैची उन से स्टेशन पर ही ले ली गई. अटैची में एक रंगबिरंगा स्टिकर लगाने के बाद उन को एक टोकन दे दिया गाया.

शिखर चिंतित हो गया कि कहीं कोई उस की अटैची से किसी प्रकार की छेडछाड न कर बैठे. उस ने सोचा था कि वह यात्रा में अटैची को उपने पास ही रखेगा. इसी वजह से उस ने उसे में ताला भी नहीं लगाया था. पूरी यात्रा में उस को यही  चिंता सताती रही कि कहीं उस के सामान की चोरी ने हो जाए. उस को अत्यधिक चिंतित देख कर मामा ने उस को बताया कि सब यात्रियों का सामान अंतरिक्ष शटल के सामान कक्ष में बंद है. वहां अब कोई नहीं जा सकता, पर  शिखर की चिंता कम न हुई.

अंत में वे अंतरिक्ष नगर पहंच गए. शटल से उतरने के बाद उन्होंने थोडी दे अंतरिक्ष स्टेशन में इंतजार किया. जल्दी ही यात्रियों का सामान आ गया. मामाजी ने टोकन दे कर अपनी अटैची ले ली. शिखर से रहा नही गया. उस ने उपनी अटैची देखने के लिए ज्यों ही उस को उठाया, चौंक गया. अटैची एकदम हलकी  की. घर  में उसे अटैची उठाने में बहुत परेशानी  हो रहीं थी. पर अब तो अटैची एकदम खाली थी.

वह जोर से चिल्लाते हुए मामाजी से बोला, ”मैं ने कहा था न... यह देखिए, मेरा सामान अंतरिक्ष यान में चोरी हो गया“ है कहतेकहते उसे की आंखों से आंसू टपकने लगे. 

”क्या हुआ, बेटे?“ मामाजी ने घबरा कर पूछा. उन को समझ में नहीं आया कि शिखर को चोरी का पता कैसे चता है, क्योंकि अटैची तो अभी खोली नहीं गई. 

उन्होंने पूछा, ”क्या खो गया है?“

”अभी बताता हूं?“ सुबकते हुऐ उस ने कहा. फिर अटैची खोली तो देखा कि सामान ठीक वैसे का वैसा ही रखा हुआ है. वह आ’चर्यचकित था. उस ने अटैची बंद की. फिर दोबारा उस को उठा कर देखा अटैची बहुत हलकी थी. 

उस ने अटैची को ले कर चलने की कोशिश की तो पाया कि वह उस को आराम से ले कर चल सकता है. शिखर हैरानी से अटैची को देखने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह इतनी हल्की कैसी हो गई है.


अंत में वे अंतरिक्ष नगर पहुँच गए. शटल से उतरने के बाद उन्होंने थोडी दे अंतरिक्ष स्टेशन में इंतजार किया. जल्दी ही यात्रियों का सामान आ गया. मामाजी ने टोकन दे कर अपनी अटैची ले ली. शिखर से रहा नही गया. उस ने उपनी अटैची देखने के लिए ज्यों ही उस को उठाया, चोंक गया. अटैची एकदम हलकी  की. घर  में उसे अटैची उठाने में बहुत परेशानी हो रहीं थी. पर अब तो अटैची एकदम खाली थी. 
वह जोर से चिल्लाते हुए मामाजी से बोला, ”मैं ने कहा था न... यह देखिए, मेरा सामान अंतरिक्ष यान में चोरी हो गया“ है कहते कहते उसे की आंखों से आंसू टपकने लगे. 
”क्या हुआ, बेटे?“ मामाजी ने घबरा कर पूछा. उन को समझ में नहीं आया कि शिखर को चोरी का पता कैसे चता है, क्योंकि अटैची तो अभी खोली नहीं गई थी .
            उन्होंने पूछा, ”क्या खो गया है?“
”अभी बताता हूं?“ सुबकते हुऐ उस ने कहा. फिर अटैची खोली तो देखा कि सामान ठीक वैसे का वैसा ही रखा हुआ है. वह आ’चर्यचकित था. उस ने अटैची बंद की. फिर दोबारा उस को उठा कर देखा अटैची बहुत हलकी थी.
उस ने अटैची को ले कर चलने की कोशिश की तो पाया कि वह उस को आराम से ले कर चल सकता है. शिखर हैरानी से अटैची को देखने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था  कि वह इतनी हल्की कैसी हो गई है.
फिर उस ने मामा जी की ओर देख कर कहा , ”सामान तो सही सलामत है, पर मेरी अटैची बहुत हलकी  हो गई है. घर से चलते वक्त मैं अटैची को ठीक से उठा भी नहीं पा रहा था, पर अब मैं इसे आराम से ले कर चल सकता हूं. क्या मैं ज्यादा ताकतवर हो गया हूँ ?“
मामाजी खिलखिला कर हंस पडे, शिखर ने देखा कि कई यात्री व अंतरिक्ष स्टेशन के कर्मचारी भी उनके साथ हंस रहे हैं उसे समझ में न आया कि इस में हंसने की क्या बात हैं.
मामाजी व शिखर अपने घर की ओर चल दिए. रास्तें में मामा ने समझाया, ”बेटे, चुंबक की तरह पृथ्वी हर चीज को अपनी ओर खींचती हैं, जिस के कारण हम को वस्तु का भार महसूस होता हैं पृथ्वी से दूरी बढने पर यह खिचाव कम होता जाता है और वस्तु हलकी होती जाती है. यह खिचाव यहां अंतरिक्ष स्टेशन में धरती के मुकाबले बहुत कम है... इसीलिए यहां हर चीज पृथ्वी के मुकाबले बिना भार की मालूम होती है. यही कारण है कि तुम्हें अपनी अटैची इतनी हलकी लग रहीं है.“
शिखर ने कुछ और चीजों को भी उठा कर देखा तो पाया कि हर चीज बिना भार की है.
अदभुत  शांति
अंतरिक्ष स्टेशन  पर जगह जगह टीवी परदे लगे हुए थे, जिन में उड़ान से संबंधित विभिन्न सूचनाएं दी जा रही थीं. बीचबीच में में उद्घोषिका महत्वपूर्ण सूचनाओं को अलग से बाता रहीं थी. एकाएक स्टेशन में लगे टीवी परदों में आपातकालीन सूचना प्रसारित होने लगी. सूचना के अनुसार, एक कर्मचारी को दिल का दौरा पडा था, अतः ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर को तुरंत बुलाया जा रहा था सूचना लगातार प्रसारित हो रहीं थी. ऐसा लगता था कि ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर किसी उन्य मरीज को देखने में व्यस्त है, जिस के कारण उस को आने में देर हो रही है.
तभी शिखर  की नजर एक बड़े से बोर्ड के ऊपर गई, जिस पर लिखा थाः
चेतावनी
यात्रियों को चेतावनी दी जाती है कि वे अपने अंतरिक्ष सूट को ठीक प्रकार से पहन लें. सभी यात्री दरवाजे को पार करते ही खुले अंतरिक्ष में प्रवेश करने जा रहे है अतः अंतरिक्ष  स्टेशन  अंतरिक्ष नगर को जोडने वाले पुल पर चलते समय वे कदापि अपने  अंतरिक्ष सूट को ने खेलें बिना अंतरिक्ष सूट के अंतरिक्ष पुल पर प्रवेश  करना मृत्यू को आमंत्रण देने के समान हैं.
आज्ञा से,
अन्तरिक्ष स्टेशन निदेशक.
शिखर  ने देख कि सभी यात्री अपने अपने अंतरिक्ष सूट ठीक प्रकार से बांध रहे है. मामाजी ने उस का सूट भी ठीक कर दिया टीवी परदों पर अभी भी उद्घोषिका ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर को तुंरत  मरीज तक पहुंचने का निवेदन कर रही थी.
मामाजी ने अंतरिक्ष सूट को बांधते हुए शिखर  को बताया कि अन्तरिक्ष नगर   अन्तरिक्ष स्टेशन आपसे में एक पुल से जुडे हुए हैं. दरवाजे को पार करते ही वे अन्तरिक्ष में बने इस पुल पर प्रवेश  करेंगे. अतः वह पुल से एकसाथ अन्तरिक्ष नगर स्टेशन को देख सकेगा.
मामाजी का हाथ पकड कर शिखर  ने ज्यों ही पुल में खुलने वाले दरवाजे को पर किया कि उस को अजीब सा महसूस हुआ उसे समझ मे नहीं आया कि एकाएक यह क्या हो गया है? वहां कोई शोर  और आवाज थी, बल्कि   अदभुत शांति  थी. ऐसी शांति,  जो उस ने कभी महसूस नहीं की थी.
अरे, मेरे कानों को क्या हो गया?, शिखर  मन नही मन बुदबुदाया उसने मामाजी से घबरा कर कहा मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है मुझे क्या हो रहा हैं
पर मामाजी पर उस की बात का कुछ  भी असर हुआ वह सीधे चलते ही रहें. शिखर  ने उनसे चिल्ला कर फिर कहा. उस  को लगा कि वह चिल्ला तो  रहा है.  पर आवाज नहीं हो रही. ‘क्या कानों के साथ मेरी आवाज भी गायब हो गई?, उस ने सोचा  कि वह नाहक ही अंतरिक्ष नगर चला आया. उस की आवाज सुनने की शक्ति,  दोनों ही समाप्त हो चुकी हैं उसने सामने की टीवी स्क्रीन पर देखा. उद्घोषिका की आवाज भी उस को सुनाई नहीं दे रही थी. पर स्क्रीन  पर लिख रहा थाः 
डाक्टर, आप तुरंत हार्ट अटैक के मरीज को देखने के लिए पहुंचें. मरीज की हालत बहुत चिंताजनक है.’
तभी शिखर  ने देखा, उनके अंतरिक्ष शटल का चालक उनकी ओर बड़ी तेजी से चला रहा है. चालक ने उनके आगे चलने वाले एक लंबे खूवसूरत व्यक्ति को जोर से झंझोडा.
उस व्यक्ति ने जब पलट कर देखा तो चालक ने उस के हाथ में एक कागज थमा दिया. पुल के उपर का एकाएक यातायात थम गया. जगह कम होने के कारण लोग आगे नहीं बढ सकते थे. ब वह व्यक्ति कागज को पढ रहा था तो शिखर ने भी उचक कर देखा कागज पर लिखाथाः

कर्नल कृपाल,

स्टेशन में ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर किसी अन्य मरीज को देखने में व्यस्त हैं. हमारे कंप्यूटर में उपलब्ध सूचना के आधार पर यह मालूम हुआ है कि पूरी अंतरिक्ष स्टेशन में आप ही एक मात्र डाक्टर हैं. यदि आप बुरा मानें तो कृपया हार्ट अटैक के मरीज को प्राथमिक चिकित्या देने की कृपा करें. हमारा विश्वाश है कि सेना के अनुशासित  डाक्टर होने की वजह से आप हमें निराश  नहीं करेंगें.’
शिखर ने देखा कि कर्नल कृपाल ने सहमति से आपना सिर हिला दिया. एकाएक पुल पर लगी बेल्ट उलटी दिशा  में चलने लगी यात्री फिर अंतिरिक्ष स्टेशन पर वापस पहुच गए. दरवाजे को पर करते ही शिखर  चोंक उठा.  उस के कान आवाज फिर ठीक हो गई थी उस को स्टेशन का कोलाहल और लोगों की बातचीत फिर सुनाई देने लगी.
उस ने अपनी समस्या के बारे में मामा जी को बताया तो वह मुसकराए और बोले, ”मैं तो तुम को बताना भूल ही गया था. यह अनुभव तो अंतरिक्ष में सभी को होता है. आवाज को एक जगह से दूसरी जगह तक जाने के लिए किसी किसी चीज की जरूरत होती है. यह चीज हवा, पानी या फिर कोई तार भी हो सकता है, जो कि दोंनों जगहों को आपस में आपस में जोडता हो. अंतरिक्ष के चारों ओर हवा या अन्य कोई चीज तो है नहीं. इसलिए तो तुम कोई आवाज सुन सके और ही कोई तुम्हारी बात सुन सका.  पृथ्वी पर चारों ओर हवा होती, जिस के कारण ही आवाज एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती है अंतरिक्ष में हम पृथ्वी की भांति बातचीत नहीं कर सकते.“
पर मामाजी हम इस समय भी तो अंतरिक्ष में ही स्टेशन के अंदर हम पृथ्वी की भांति ही कैसे बातचीत कर पा रहे है?“

क्योंकि अंतरिक्ष स्टेशन में भी पृथ्वी भांति ही हवा है, जिस के कारण आवाज एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा पा रही है इसी के कारण हम बातचीत कर पा रहे है.“
 कर्नल कृपाल को अंतरिक्ष स्टेशन में छोडने के बाद सभी यात्री दोबारा अंतरिक्ष नगर जाने के लिए तैयार  हो गए.
अंतरिक्ष नगर
पुल से शिखर ने देखा कि अंतरिक्ष यान स्टेशन, विक्रम साराभई अंतरिक्ष नगर के एक कोने में स्थित है. उस समय स्टेशन सूर्य के प्रकाश  से जगमगा रहा था. अंतरिक्ष पुल पर भी दोपहर जैसा प्रकाश   फैला हुआ था.
एक छोटे से दरवाजे से गुजरते हुए उन्होंने अंतरिक्ष नगर में प्रवेश किया शिखर  को लगा कि बातावरण में एकाएक बदलाव गया है. मामाजी ने उसे अंतरिक्ष सूट उतारने को कहा. उन्होंने  बताया कि अंतरिक्ष नगर के अंदर पृथवी की भांति  ही बनावटी वातावरण बनाया गया है अतः अंतरिक्ष सूट की आवश्यकता  अब नहीं है.
बनावटी वातावरण?“ शिखर  ने आश्चर्य  से पूछा, ”इसका क्या मतलब होता है?“
बेटे, धरती पर हमारे चारों ओर हवा होती है. इस हवा से हम आक्सीजन नाम की गैस लेते है. यह गैस हमारे जीवन के लिए जरूरी है अन्यथा हमारा दम घुट जाएगा और हम मर जाएंगे. इस के अलाबा हमारे चारों ओर का वातावरण तो  बहुत ठंडा  होना चाहिए और ही बहुत गरम... ”मामाजी ने कहा.
 शिखर  ने बात काट कर कहा, ”इस का मतलब अंतरिक्ष नगर में इन सब बातों की व्यवस्था की गई है यहां हवा के साथ साथ हमारे शरीर  के हिसाब से ताप भी निश्चित  रखा जाता  है.“
बिलकुल ठीक. पर इस के साथ एक और बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है... वह है हवा का दबाव. धरती की सतह से काफी उंचाई तक हवा फैली रहती है. यह हवा हमें चारों  ओर से एक निश्चित  ताकत से दबाती है वैसा ही दबाव हमें अंतरिक्ष में भी बनाए रखना पड़ता है.“
पर मामाजी. आप ने यह तो बताया ही नहीं कि हम अंतरिक्ष सूट क्यों पहनते है?“
अंतरिक्ष सूट 2 प्रकार से हमारी सहायता करता है. इस के अंदर  आवश्यक  हवा का दबाव बनाए रखा जाता है ताकि हमें अंतरिक्ष में किसी प्रकार की परेशानी  हों
 और यह दूसरी तरह से हमारी सहायता कैसे करता है?“ शिखर  ने पूछा.
            बेटे, सूर्य की किरणें में पराबैगनी नामक किरणें भी होती है, जो हमारे “’शरीर के लिए नुकसानदायक हैं. अंतरिक्ष सूट उन से भी हमारेशरीर की रक्षा करता है.“
बातचीत करते हुए शिखर और मामाजी काफी दूर चले गए. शिखर  ने पाया कि अंतरिक्ष नगर उपर की ओर से पूरी तरह से किसी पारदर्शी  प्रकार  जैसी वस्तु से ढका हुआ है. सूर्य की किरणें उस से छन कर  अन्दर  रहीं थी. मामाजी ने बताया कि इन पारदर्शी से सूर्य का मात्र वही प्रकाश अंदर सकता है, जो जीवन के लिए हानि रहित है.
इस का मतलब सूर्य का पराबैगनी प्रकाश अंतरिक्ष नगर के अन्दर नहीं पा रहा हैशिखर ने पूछा.
बिलकुल ठीक
पर इन  शीशों बीच में  विशेष प्रकार के  शीशों की कतार क्यों हैं?“
मामाजी बोले, ”यह सूर्य के प्रकाश से बिजली पैदा करने वाले उपकरण है इन्हें सौर सेल कहते है. अंतरिक्ष में इन्हीं की सहायता से बिजली पैदा की जाती है
शिखर को  बिजली बात सुन कर एक बात याद आई. उस ने पाया कि पूरे अंतरिक्ष नगर में कहीं पर भी प्रकाश  की कोई व्यवस्था  दिखाई नहीं दे रहीं. रास्ते में भी बल्ब ट्यूबलाइटे कहीं नहीं दिखाई दे रही थीं.  अभी वह इस बारे में प्रश्न  पूछने ही वाला था कि मामाजी ने कहा, ”शिखर  हमारा घर या है. वह देखो, छत पर कौन बैठा है?“

शिखर  ने सिर उठा कर देखा सामने छत पर बैठे कनी और रजत मुस्करा रहे थे. दोंनो ने चिल्ला कर कहा, ”मां, शिखर गया है.

   मुस्करा दिखाई अन्दर वातावरण छोटे लिखा एकाएक आगे शीशों विशेष  शीशे “



चालू है 
कैंचियों से मत डराओ तुम हमें
हम परों से नहीं होसलों से उड़ा करते हैं
PURCHASE MY BOOK:
कितना सच? कितना झूठ?? at:
http://pothi.com/pothi/node/79

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

कटघरा: Hindi story by Hem Chandra Joshi


कटघरा


मेरे जीवन की यह एक अविस्मरणीय घटना है । अपनी प्रथम नियुक्ति पर मैंने कांकेर हायर सेकेण्डरी स्कूल में गणित के प्राध्यापक का कार्यभार संभाला था । छात्रा जीवन की एनसीसी की उपलब्धियों को देखकर प्रधानाचार्य जी ने मुझे गर्मियों में लगने वाले एनसीसी कैम्प का प्रभारी बना दिया ।
गर्मियों की छुट्टियां शुरू हुई । कैम्प को लगे हुए आठ-दस दिन बीत चुके थे। एक सुबह ढेर सारे कैडेट मेरे टैण्ट के सामने आ खड़े हुए । उनकी शिकायत थी कि कैम्प से उनकी चीजें लगातार चोरी हो रही हैं । मैंने उनको समझाकर वापस भेज दिया । किन्तु मैं सोच में पड़ गया ।
मैंने अन्य विद्यालयों से आए शिक्षकों से इस विषय पर विचार-विमर्श किया । सभी इस बात से एकमत थे कि कैडेटों में से ही कोई एक चोर हो सकता है । पर एक बड.ी समस्या थी कि चोर का पता कैसे चले ? अतः मैंने कुछ खास बच्चों को अलग-अलग बुलाया । उनको विशेष निर्देश दिए । पर हमारी सारी सतकर्ता के बावजूद अगले दिन सुबह की दौड़ के समय एक कैडेट की घड़ी चोरी चली गई । अब हम सभी परेशान हो उठे । उस समय एनसीसी के कैडेट सुबह की दौड़ के बाद नाश्ता कर रहे थे । मैं अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श करने में व्यस्त था । तभी मुझे कुछ लड़कों की जोर-जोर से बोलने की आवाजें सुनाई दी । मैंने आवाज की दिशा में देखा । चार-पांच कैडेट अपने एक साथी को पकड़े चले आ रहे थे।
‘क्या बात है रिपु दमन ?’ मैंने कैडेटों के साजेंन्ट से पूछा ।
‘सर, चोर पकड़ा गया ।’ उसने बड़े ही आत्म-विश्वास के साथ कहा ।
‘मैं चोर नहीं हूं सर । ये सब झूठ बोल रहे हैं । मैंने आज तक कभी चोरी नहीं की है ।’ वह दुबला व सांवला लड़का बोला । उसके स्वर में पूर्ण आत्मविश्वास था ।
‘सर, यही लड़का चोर है । हमने इसे रंगे हाथों पकड़ा है ।’ सार्जेन्ट ने कहा।
रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद भी इतनी हिम्मत ? मैंने मन ही मन सोचा और फिर साजेंन्ट से पूछा- ‘घड़ी कहां है रिपुदमन ?’
कैडेट एक स्वर में बोले- ‘सर, इसने घड़ी अपने बक्से में ताला लगाकर छिपा दी है । हमने बहुत कोशिश की पर इसने ताले की चाभी हमें नहीं दी ।’
मैंने देखा कि उनमें से एक लड़का पुराना सा जंग लगा बक्सा अपने सिर पर उठाए खड़ा था । मैंने चोर से कड़क कर पूछा- ‘क्या नाम है तुम्हारा ?’
’जी, कालीचरन ।’ लड़के ने सहम कर कहा ।
‘चोरी क्यों की ?’ मेरा अगला सवाल था ।
लड़के की आंखों में आंसू भर आए । वह कुछ नहीं बोला । पर वह घबरा गया था । उसकी घबराहट मुझे बता रही थी कि वह चोर है ।
मैं चीख कर बोला- ‘मैं पूछ रहा हूं कि तुमने चोरी क्यों की ? तुम्हारे घर का माल है क्या ? चलो, बक्से को खोलो जल्दी से।’
‘नहीं-नहीं, सर । मेरा बक्सा मत खुलवाइए । विश्वास करिये । मैंने चोरी नहीं की । मैं चोर नहीं हूं सर ।’ उसने आग्रह किया ।
‘पहले चोरी करता है फिर रोता है । तेरे आंसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । जल्दी अपना बक्सा खोल ।’ लड़कों में से कोई बोला ।
‘सर, मैं बक्सा नहीं खोलूंगा । मैंने कोई चोरी नहीं की है । मेरी इज्जत का सवाल है ।’ लड़के ने प्रतिकार किया ।
‘चोर की भी कोई इज्जत होती है क्या ? बक्सा तो तुमको खोलना ही पड़ेगा।’ मैंने गुस्से में कहा ।
‘सर, अगर आपको मेरे ऊपर विश्वास नहीं है तो अपने टैन्ट में ले जाकर मेरा बक्सा खोल कर देख लीजिए । पर मैं अपना बक्सा सबके सामने नहीं खोलूंगा।’ कालीचरन ने जोर देकर कहा ।
चोर इतना ढीठ भी हो सकता है ? मैंने मन ही मन सोचा । इसकी इतनी हिम्मत कि मेरे साथ बहस करे । तुम्हारी इज्जत का सवाल है मास्टर ब्रजबिहारी ! मेरे अन्दर का अहम जाग उठा । मैंने गुस्से में कहा ‘रिपुदमन, चाबी छीन कर बक्सा खोल दो ।’
‘नहीं...। आप ऐसा नहीं कर सकते सर । आप मेरी इज्जत से नहीं खेल सकते । मैं चोर नहीं हूं सर.. । सर रोक लीजिए इनको । सर मैं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा ।’ वह चीखता रहा । उसकी हर चीख शायद मुझको आत्म संतुष्टि की ओर ले जा रही थी । आखिर मेरे बिछाए जाल में चोर फंस कर छटपटा रहा था । मैं मन ही मन अपनी प्रशासनिक योग्यता पर निछावर था । आखिर कालीचरन की चीख पुकार के बीच लड़कों ने चाबी उससे छीन ही ली ।
‘ये लीजिए सर चाबी ।’ रिपुदमन ने चाबी मेरी और बढ़ायी ।
एकाएक कालीचरन ने धमकी दी कि यदि सबके सामने उसका बक्सा खोला गया तो वह सिर पटक कर अपना माथा फोड़ लेगा । अतः मुझे उसकी बात माननी पड़ी। कालीचरन स्वयं बक्सा उठाकर मेरे टेन्ट में चला आया । वह अब एकदम खामोश था । उसके चेहरे में मायूसी थी । मैंने बक्से की तलाशी शुरू करी।
बक्से में सबसे ऊपर लाल कपड़े में लपेट कर कोई पुस्तक रखी हुई थी । जिज्ञासावश मैंने कपड़ा हटाया । गीता का स्वाध्याय और चोरी ? मैं असमंजस में पड़ गया । मैंने गीता बिना लपेटे एक ओर रख दी । कालीचरन ने मुझे गुस्से से देखा । फिर उसने गीता लपेट कर करीने से रख दी ।
फिर मैंने एक-एक करके उसकी डेªस की कमीज, पैन्ट, कैप आदि झाड़े । मुझे कुछ नहीं मिला । तभी मेरी आंखों में चमक आ गई । बक्से के तले में एक थैला रखा हुआ था । मैं समझ गया कि उसी में चोरियों का माल रखा गया है । मेरे हाथ में थैला आया देखकर कालीचरन ने बहुत आग्रह किया कि मैं उस थैले को न खोलूं । पर यह संभव कब था ? मैंने एक झटके में थैले का मुंह खोल कर सामान जमीन में उलट दिया । दृश्य देखकर मैं आवाक् रह गया । जमीन में आधी खाई मक्खन की टिक्कियां, डबल रोटी, केक व मिठाई के टुकड़े बिखरे पड़े थे । यह सब कैडेटों को नाश्ते में दिया गया सामान था । पर चोरी के समान का दूर-दूर तक कहीं, पता नहीं था । मैंने कालीचरन की ओर देखा और चीखा- ‘यह सब क्या है कालीचरन ? चोरी का समान कहां है ? यह सब बचा हुआ सामान तुमने क्यों इकट्ठा कर रखा है ?’
कालीचरन कुछ न बोला । उसने बिखरा हुआ सामान बीनना शुरू करा । मैं सकते की हालात में अपलक उसको देखने लगा । तभी उसने आधा खाया मोतीचूर का लड्डू उठाया । तब मेरा माथा चकरा गया । मोतीचूर के लड्डू तो आज पहली बार सुबह के नाश्ते में बांटे गए थे । फिर मोतीचूर का लड्डू इसके बक्से केअन्दर कैसे ? ओह ! इसका मतलब नाश्ते की मेज से कालीचरन खाने का समान जेब में रख कर लाया था । पर क्यों ? यह मेरे लिए एक पहेली था । पर यह सत्य था कि वह चोर नहीं था । मैं शर्मिन्दा हो कर बोला- ‘कालीचरन बेटे, मुझे माफ कर देना । पर यह सब क्या है मेरे बेटे ? कालीचरन ने उदास आंखों से मेरी ओर देखा । मेरे स्नेह वचन सुनकर वह भावुक हो उठा । फिर कुछ रूक कर बोला- ‘सर, आपने मेरी इज्जत बचा ली । यदि सबके सामने आप तलाशी लेते तो मैं मुंह दिखाने लायक नहीं रहता ।
‘पर यह सब क्या है? मैंने फिर पूछा ।
कालीचरन बोला- ‘सर, यह गरीबी हैं। मैंने यह सामान अपने छोटे भाई-बहनों के लिए इकट्ठा करा है । सर, मैं कैम्प में पेट भर कैसे खा सकता हूं? पता नहीं मेरे भाई-बहन घर में आधा पेट भोजन भी कर पाते होंगे कि नहीं? आधा पेट खाने की आदत है न हमको। फिर मिठाई, बिस्कुट व मक्खन तो हमारे लिए दुर्लभ खाना है, सर ।’ वह रूआंसा हो उठा।
मैं ठगा सा खड़ा देखता रहा । ‘मुझे माफ करना बेटे। मैं सिर्फ यही बुदबुदा सका । कालीचरन बक्सा उठाए अपनी टैन्ट की ओर चला गया ।
वर्षों बीत गए हैं। तब से आज तक, मुझे कई मौकों में ऐसा लगता है कि मैं आज भी कालीचरन के कटघरे में खड़ा हूंॅॅॅ । पता नहीं कालीचरन अब कहां होगा ? क्या वास्तव में उसने मुझे माफ कर दिया है ?



कैंचियों से मत डराओ तुम हमें
हम परों से नहीं होसलों से उड़ा करते हैं
PURCHASE MY BOOK:
कितना सच? कितना झूठ?? at:
http://pothi.com/pothi/node/79

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

अब नहीं बाबूजी


Resubmitted

अब नहीं बाबूजी


शहर के मुख्य चैराहे पर स्थित उस हनुमान मंदिर से मेरी बहुत सी भूली बिसरी बातें जुड़ी हुई हैं। मैं बचपन में पिताजी के साथ अक्सर हर मंगलवार को मंदिर जाया करता था।
मेरे मन में सदा यही लालच रहता था कि मंदिर जाने पर ढेर सारा प्रसाद खाने को मिलेगा। आंखे बंद किए भगवान के सामने खड़े पिताजी को देखकर मैं अक्सर सोचता था कि वो आखिर भगवान से मांगते क्या हैं ? ऐसे मौकों पर मैं प्रसाद की थैली पर आंखे गड़ाए रखता था। पुजारी जी जब टीका व चरणामृत देने के बाद प्रसाद की थैली से मिठाई निकालते तो मुझे ऐसा लगता था कि मानो कोई मेरे हिस्से की मिठाई ले रहा हो।
फिर मैं धीरे धीरे कुछ बड़ा हो गया। मुझे अच्छे व बुरे काम में फर्क समझ में आने लगा। अब मैं अपनी छोटी बहन की चाकलेट भी कभी.कभी मौका मिलने पर चुपके से निकाल कर खाने लगा था। जब बहन रो-रो कर सारे घर को सिर पर उठा लेती थी तो मुझे अपनी शैतानी पर बड़ा मजा आता था। 
आखिर चोरी के बाद पकड़े जाने से बचने का अपना ही सुख था। पर जब बहन भगवान को साक्षी मानकर चोर को दण्ड देने की प्रार्थना करती तो मैं मन ही मन घबरा जाता था। मैं हनुमान जी से अक्सर माफी मांग कर बहन के शाप से मुक्त होने की कोशिश करता था।
मंदिर जाने का यह सिलसिला कुछ ऐसा चला कि कभी टूटा ही नहीं। मंदिर के आसपास इकट्ठे होने वाले एक.एक भिखारी प्रसाद मांगने वाले लड़कों व ठेले वालों को मैं पहचानने लगा। यदि कहीं उनमें से कोई मुझे नहीं दिखता तो मेरी आंखे दूर तक उसको ढूंढती सी नजर आती। कुछ ऐसी ही हालत मेरे बारे में भी थी। मंदिर के आसपास के सभी लोग मुझे अच्छी तरह पहचानने लगे थे। प्रसाद के छोटे.छोटे टुकड़ों को ठेलम-ठेल के बीच चारों ओर से लपकते हुए हाथों में बांटकर मुझे पुण्य लूटने की संतुष्टि होती थी।
मैं नियमित रूप से एक विशेष मिठाई के ठेले से ही प्रसाद खरीदता था। इसी ठेले वाले के साथ एक लड़का मुझे हमेशा काम करता दिखाई देता था। मैंने मन ही मन उसका नाम कालू रख छोड़ा था। ग्राहकों के चप्पल जूतों का ध्यान रखनाए उनके हाथण्पैर धुलवाना उसका काम था। इसी सुविधा के कारण उस ठेले पर ग्राहकों की कुछ ज्यादा ही भीड़ रहा करती थी।
मंदिर से लौटते समय मैं प्रसाद का एक छोटा सा टुकड़ा कालू को भी देता था। वह मुस्कुरा कर उसको मुंह में डाल लेता था। मेरे नियमित रूप से मंदिर आने पर कालू बहुत प्रभावित था। मेरे लिए उसके मन में अपार श्रध्दा थी। उसकी बातों से पता चलता था कि उसकी हनुमान जी के प्रति असीम आस्था है। वह मुझे हमेशा संतुष्ट दिखाई देता था।
मैं कभी.कभी सोचता था कि मिठाई वाले ने क्यों अपने लड़के को इस काम में लगा रखा है ? वह क्यों नहीं उसको पढ़ाता-लिखाता है।
एक दिन मुझे मालूम चला कि वह मिठाई वाले का बेटा न होकर उसका नौकर है। कालू के पिता नहीं थे और उसकी मां उसकी देखरेख करती थी। कालू स्कूल भी जाता था और इधर-उधर काम करके अपना स्कूल का खर्चा भी चलाता था। मुझे कालू से थोड़ी हमदर्दी सी हो गई लेकिन मात्र मेरी हमदर्दी से कालू का पेट तो भर नहीं सकता था। कालू हमेशा मुझे काम करता मिलता था। पर मैं उसको कभी कुछ दे नहीं सका। वह तो मात्र प्रसाद के एक छोटे से टुकड़े को पाकर ही मेरे ऊपर निछावर था।
एक दिन मैने देखा कि कालू दुकान से दूर खड़ा है। मुझे दुकान वाले ने बताया कि उसने कालू को निकाल दिया है क्योंकि उसने दुकान में चोरी करने की कोशिश की है।
कालू ने उसकी बातों का प्रतिकार करते हुए कहा”बाबू जी यह झूठ बोल रहे हैं। मैंने आज तक चोरी नहीं की है। ये मेरे काम के पैसे नहीं देना चाहते हैं इसीलिए ऐसा कह रहे है। आप मेरे पैसे दिलवा दीजिए नहीं तो मैं स्कूल की फीस नहीं जमा करवा पाऊँगा।“ उसने कातर दृष्टि से बहुत सी उम्मीद के साथ मुझसे कहा।
पता नहीं क्यों कालू की कातर वाणी भी मुझे भेद नहीं पाई। मुझे मन ही मन लगा कि कालू ने जरूर चोरी की होगी। मुझे कालू के भोलेपन में उसकी चालाकी दिखाई देने लगी। मैने धीरे से मिठाई वाले से कहा” सच भाई! आज के जमाने में किस पर विश्वास किया जाए कुछ समझ मे नहीं आता है।“
मैं भगवान के दर्शन कर पुण्य लूटता हुआ घर वापस चला आया। इसके बाद कई मंगलवारों को मुझे कालू नजर नहीं आया। फिर महीनों बाद एक दिन कालू मुझे मंदिर के बाहर खड़ा मिला। मुझे देखते ही वह मेरी ओर चला आया। वह शायद मेरा ही इंतजार कर रहा था। उसने उदास आंखो से कहाण्”बाबूजी मेरी मां बहुत बीमार है। कुछ रूपये उधार दे दीजिए। मैं आपका रूपया जरूर वापस कर दूंगा। आप तो भक्त है। सदा ईश्वर पर विश्वास करते हैं। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपको पैसा अवश्य वापस कर दूंगा।“
मैंने कालू को देखा। मुझे लगा वह सच बोल रहा है। मुझे चुप देखकर उसने कहा ”साहब आप पता नहीं कितने रूपये व मिठाई भगवान पर चढ़ा जाते हैं। ढेर सारा पेट्रेIल मंदिर आने के लिए खर्च कर डालते है। एक पचास का नोट मुझे भी उधार दे दीजिए। साहब मेरी मां बच जाएगी।“ उसने व्याकुल आवाज में कहा। उसकी रोनी सी आवाज ने मुझे आहत तो कर दिया किन्तु उस पर पचास रुपया खर्च करने का औचित्य मेरा मन नहीं समझ सका। मैंने उसकी बात का कोई भी जवाब नहीं दिया। मैं आगे बढ़ने लगा तो वह मेरे पैरों में गिर पड़ा और बोला ”बाबूजी मेरी मां मर जाएगी। मैं अनाथ हो जाऊँगा। मेरे ऊपर कृपा करिये बाबूजी। मेरी माँ को बचा लीजिए।“
मैंने टालने के लिए मजबूर होकर कहा ण् ”मेरे पास रुपए नहीं हैं।“
”बाबूजी प्रसाद चढ़ाने के रुपए ही मुझे उधार दे दीजिए। यह मेरे लिए दान के समान होगा।
मैंने उसकी बातें अनसुनी सी कर दीं। मैं एक रूढिवादी की तरह भगवान के दर्शन करने चला गया। जब मैं वापस आया तो वह प्रसाद का टुकड़ा प्राप्त करने के लिए वहां पर उपस्थित नहीं था। मेरा मन खिन्नता से भर गया। मुझे लगा कि मुझे उस पर विश्वास करना चाहिए था। उसकी सहायता करनी चाहिए थी। आज प्रसाद चढ़ाकर अवश्य ही भगवान प्रसन्न नहीं हुए होंगे। भगवान तो सदा दुखियों के साथ ही रहते हैं।
कालू की सहायता न करने का मुझे बेहद अफसोस था। कालू की पीड़ा मेरे मन में घर कर गई। हर मंगलवार को मैं अब मंदिर के आसपास कालू को ढूंढा करता था। मुझे बेहद अफसोस था कि मैंने उसकी सहायता नहीं की। उसके असीम विश्वास को मैंने ठेस पहुंचाई थी। अब मैं कालू की सहायता करके प्रायश्चित करना चाहता था।
फिर एक दिन जब मैं यात्रा के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा और टिकट खरीदकर मैं चाय पीने के लिए एक ठेले पर खड़ा था कि तभी किसी की आवाज आई ”बाबूजी नमस्कार! कैसे हैं आप ?“
मैंने देखा कि हंसता हुआ कालू मेरे सामने खड़ा है। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी मासूमियत नहीं थी। मुझे लगा कि वह एकाएक काफी सयाना हो गया है। एक छोटा सा बच्चा इतनी कम उम्र में इतना परिपक्व कैसे बन जाता है ? मेरे मन में कई प्रश्न उठने लगे। इससे पहले कि मैं कालू से कुछ पूछता उसने जाने की इजाजत मांगी। मैंने प्रायश्चित के कारण बटुवे से सौ रुपए का एक नोट कालू को देना चाहा पर कालू ने बड़ी ही गंभीरता से कहा ”बाबूजी मुझे अब रुपयों की आवश्यकता नहीं है। मैं भीख भी नहीं लेता। आज मैं अनाथ हूं। इस दुनिया में अकेला। उस दिन आपने मुझे रुपए नहीं दिए पर किसी और को भी मेरे ऊपर दया नहीं आई। थोड़े से पैसों के कारण मेरी मां चली गई। जब मनुष्य के दुख को मनुष्य नहीं समझ सकता है तो आप कैसे मान लेते हैं कि ऐसे मनुष्यों की पुकार को ईश्वर सुनता होगा“
”माफ करना मुझे।“ मैंने प्रायश्चित की अग्नि में जलते हुए सौ रुपए का नोट पकड़ाने का प्रयास किया।
”अब नहीं बाबूजी। यह नोट मेरी मां को अब वापस नहीं ला सकता।“ कालू ने सिर हिलाते हुए कहा और फिर वह धीरे से वापस मुड़ गया। मैंने डबडबाई आंखों से देखा कि कालू के कंधे पर आज स्कूल के बस्ते के स्थान पर पालिश वाला झोला लटका हुआ था। उसकी इस हालत के लिए मैं भी एक हद तक जिम्मेदार था। इस पीड़ा से विमुक्त होने का मेरे पास कोई मौका नहीं था।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

अन्तरिक्ष मे चोरी

कैंचियों से मत डराओ तुम हमें
हम परों से नहीं होसलों से उड़ा करते हैं
PURCHASE MY BOOK:
कितना सच? कितना झूठ?? at:
http://pothi.com/pothi/node/79

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

(2)

अन्तरिक्ष मे चोरी 

आखिर एक दिन वह मामा के साथ अंतरिक्ष स्टेशन  में पहुंच गया. अंतिरक्ष शटल  में बैठने से पहले उन्हें विशेष  प्रकार के कपडे दिए गए, जिन का नाम अंतरिक्ष सूट था. आव’यक सुरक्षा जांच के बाद वे अपनी सीटों पर जा बैठे. अटैची उन से स्टेशन पर ही ले ली गई. अटैची में एक रंगबिरंगा स्टिकर लगाने के बाद उन को एक टोकन दे दिया गाया.

शिखर चिंतित हो गया कि कहीं कोई उस की अटैची से किसी प्रकार की छेडछाड न कर बैठे. उस ने सोचा था कि वह यात्रा में अटैची को उपने पास ही रखेगा. इसी वजह से उस ने उसे में ताला भी नहीं लगाया था. पूरी यात्रा में उस को यही  चिंता सताती रही कि कहीं उस के सामान की चोरी ने हो जाए. उस को अत्यधिक चिंतित देख कर मामा ने उस को बताया कि सब यात्रियों का सामान अंतरिक्ष शटल के सामान कक्ष में बंद है. वहां अब कोई नहीं जा सकता, पर  शिखर की चिंता कम न हुई.

अंत में वे अंतरिक्ष नगर पहंच गए. शटल से उतरने के बाद उन्होंने थोडी दे अंतरिक्ष स्टेशन में इंतजार किया. जल्दी ही यात्रियों का सामान आ गया. मामाजी ने टोकन दे कर अपनी अटैची ले ली. शिखर से रहा नही गया. उस ने उपनी अटैची देखने के लिए ज्यों ही उस को उठाया, चौंक गया. अटैची एकदम हलकी  की. घर  में उसे अटैची उठाने में बहुत परेशानी  हो रहीं थी. पर अब तो अटैची एकदम खाली थी.

वह जोर से चिल्लाते हुए मामाजी से बोला, ”मैं ने कहा था न... यह देखिए, मेरा सामान अंतरिक्ष यान में चोरी हो गया“ है कहतेकहते उसे की आंखों से आंसू टपकने लगे. 

”क्या हुआ, बेटे?“ मामाजी ने घबरा कर पूछा. उन को समझ में नहीं आया कि शिखर को चोरी का पता कैसे चता है, क्योंकि अटैची तो अभी खोली नहीं गई. 

उन्होंने पूछा, ”क्या खो गया है?“

”अभी बताता हूं?“ सुबकते हुऐ उस ने कहा. फिर अटैची खोली तो देखा कि सामान ठीक वैसे का वैसा ही रखा हुआ है. वह आ’चर्यचकित था. उस ने अटैची बंद की. फिर दोबारा उस को उठा कर देखा अटैची बहुत हलकी थी. 

उस ने अटैची को ले कर चलने की कोशिश की तो पाया कि वह उस को आराम से ले कर चल सकता है. शिखर हैरानी से अटैची को देखने लगा. उसे समझ में नहीं आ रहा था  कि वह इतनी हल्की कैसी हो गई 
है.

चालू है 

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008



बाल उपन्यास
शिखर की अंतरिक्ष यात्रा



शिखर बहुत खुश था क्योंकि उसे अभी अभी अपने मामा जी का पत्र मिला था. उस के मामा अंतरिक्ष में स्थित भारत के विक्रम साराभाई नगर में वैज्ञानिक थे. पत्र इस प्रकार थाः

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष नगर,
दिनांक 22 नवंबर, 2025

प्रिय शिखर ,
सदा खुश रहो तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है. मुझे एक विशेष वैज्ञानिक योजना में काम करना है. जिसमें मैं बार-बार अंतरिक्ष नगर व पृथ्वी के बीच भ्रमण करूंगा. इस बीच यदि तुम चाहो तो 4-5 दिन के लिए मेरे साथ अंतरिक्ष नगर आ सकते हो. अपने माता पिता से पूछ कर चलने कि योजना बना लेना. यहाँ रजत और कनी तुमको बहुत याद करते हैं .

बहुत बहुत प्यार. शेष मिलने पर.



तुम्हारा,
छोटा मामा


शिखर अक्सर मामा जी के पास जाने की कल्पना करता था. उसकी बहुत इच्छा थी कि वह चन्दा मामा व प्यारी धरती को एक साथ निहार सके. उसने पुस्तकों में धरती के अनेक चित्र देखे थे. विज्ञान की किताबो में पढ़ा था कि पृथ्वी भी चंद्रमा की तरह गोल है. वह सोचता था कि अंतरिक्ष से अपनी धुरी पर घूमती हुई धरती कैसी दिखाई देती होगी ? शायद आकाश में लटके एक बडे ग्लोब की भांति , किसी लट्टू की तरह चक्कर काटती दिखई देती होगी ? वह सोच सोच कर रोमांचित हो उठता था.

इसीलिए वह मामाजी से मिलने पर सदा एक ही प्रश्न करता था, ”अंतरिक्ष से धरती कितनी तेजी से घूमती हुई दिखलाई देती है?“

तब मामा हंस कर कहते, ”’शिखर तू तो बिलकुल बुद्वू है. पृथ्वी कोई घूमती हुई थोड़ी दिखती है.... वह तो बिलकुल ऐसे ही दिखती है, जैसे कि चंद्रमा “

शिखर यह सुन कर सोच में पड़ जाता. उसे कुछ समझ में न आता था. मामा की यह बात उसे बार बार चक्कर में डाल देती थी. उसे कक्षा में बताया गया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर लट्टू की भांति घूमती है, जिस के कारण यहां रात और दिन होते हैं. पृथ्वी जरूर घूमती दिखाई देनी चाहिए. उस का विचार था कि मामा ने ध्यान से धरती को कभी देखा नहीं होगा. वह अचकचा कर पूछता, ”बिलकुल चन्द्रमा की तरह ? तो पहचान कैसे करूंगा?“

मामाजी हंस कर कहते, ”अब तुम को एक बार अंतरिक्ष में ले जाना ही पडे़गा. सच, धरती अंतरिक्ष से बहुत संुदर दिखती है. इस को तो अपने हरे रंग के कारण कोई भी पहचान सकाता है.“

अब मामाजी अपना वादा पूरा करने वाले थे. शिखर ने अंतरिक्ष नगर जाने की तैयारी जोर शोर से शुरू कर दी. एक अटैची में ढेर सारा सामान एकत्र करना शुरू कर दिया. शिखर के पिताजी ने उसे समझाया कि उसे कम से कम सामान ले कर जाना चाहिए. पर सामान कम रखते रखते भी उस की अटैची भारी हो गई, इतनी भारी कि उस के लिए उसे ले कर चलना मुश्किल हो गया. लेकिन उस के हिसाब से सभी सामान जरूरी था. उस ने घर में किसी की बात न सुनी.

मामाजी के आते ही उस ने शिकायत की. तब उन्होंने कहा, ”कोई चिंता की बात नहीं है. मेरे पास अपना कोई सामान नहीं है, इसलिए मैं सब कुछ संभाल लूँगा .“शिखरप्रसन्न हो उठा। उस को ख़ुशी थी कि वह रजत व कनी के लिए खरीदे हुए उपहार, यानी चाकलेट व खिलौने आसानी से ले जा पाएगा जो उसे इनाम में मिली थीं. आखिर किताबें दिखा कर उस ने मामी से भी तो शाबाशी लेनी थी.


चालू है