गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

अगली सुबह

दीपावली के अवसर पर एक बार यह कहानी फिर



अगली सुबह


मेरे घर की चहारदीवारी कुछ नीची है। इसीलिए सड़क में आने-जाने वालों को मैं आसानी से देख लेता हूँ । इस चलती सड़क पर न जाने कितने अपरिचित होते हुए भी जाने पहचाने से हो जाते है।
उन्ही में से एक वह लड़का भी था। मैला कुचैला सा। अपनी पीठ पर एक बड़ा झोला लिए वह अक्सर मुझे कुडे़ के ढेर में से चींजे बटोरते हुए दिखाई देता था। उसके चेहरे के पीछे कभी भी असंतोष नहीं दिखाई देता था । उसकी तेज चमकदार आंखें बड़ी सर्तकता के साथ सड़क पर पड़े कूडे. का निरीक्षण करते हुई बढ. जाती थी। एक यंत्र की भांति कार्य करते हुए लोहा, प्लास्टिक आदि के टुकडों को वह फुर्ती से समेटता पल भर में आगे बढ. जाता था। जाड़ों की ठिठुरन भरी सुबह को जब वह नंगे पांवों सड़क पर चलता हुआ मुझे दिखाई देता था तो पता नहीं क्यों सर्दी की सिरहन का ऐहसास मेरे मन में हो जाता था। उम्र में वह मुझसे चार-पांच वर्ष छोटा होगा। शायद दस-ग्यारह साल का ।उस साल दीपावली से पहले ठंडक कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी। मेरी जिद के कारण पिता जी ने दीपावली से पहले ही मेरे लिए दीपावली के पटाखें खरीदवा दिए। एक दिन तो मैं पटाखों की रंगबिरंगी पन्नीयों को देख कर खुश होता रहा। कल्पना में ही बम, फुलझड़ी व अनार चलाता रहा। पर दिल कब तक मानता ? आखिरकार मै जमींन पर पटक कर बजाने वाले कुछ ’ आलू बम’ लेकर बाहर आंगन मे आ ही निकला।
मै अभी दो-चार बम ही जमीन पर पटके थे कि उनके धमाकों की आवाज को सुनकर मेरे मकान की चहार दीवारी के निकट दो मैले कुचैले बच्चे आ खडे हुए। उनमें से छोटा वाला वही लड़का था जिसको मै अक्सर कचरा बीनते हुए देखता था। दोनों बड़ी ही हसरतों के साथ मेरे बमों को एक टक देखने लगे। जमीन में पटकने पर मेरे एक दो बम बिना आवाज करे ही एक ओर लुढ़क गऐ शायद वे खराब बम थें। जब मैं घर के अन्दर जाने लगा तो उनमें से छोटा वाला लड़का धीमी आवाज में बोला ’ बाबू जी, क्या मै गिरे हुए बम बीन लूँ ?’ मै ने लापरवाही से कहा कोई भी अच्छा बम गिरा हुआ नहीं है। पर वह नहीं माना। हार कर मैने उसको आज्ञा देदी। क्षण भर में वह हिरन की भांति कुलाचें मारता हुआ चहार दीवारी को फांद कर हमारे आंगन में आ पहुंचा और उसने उन बमों कों उठा लिया जो धामाका नहीं कर पाए थे। पता नहीं कितनी देर से वह टकटकी लगाए उन बमों पर निगाह गड.ाऐ हुए था। मैने हँस कर उससे कहा कि वह सब बेकार बम है। पर वह नहीं माना। उसने मेरे सामने ही एक बम को दीवार पर मारा जो एक धमाके के साथ गूंज उठा। उसकी आंखों में संतुष्टि से भरी एक अद्वितीय चमक बिखर उठी। बचे दो बमों को लेकर वह अगले ही पल दीवार कूद कर दूसरी ओर चला गया। शायद उसे शंका थी कि मै उन्हें वापस न ले लूं। मैने देखा कि उसने वह बम अपने साथी के हाथों में थमा दिये। अब उसके साथी के चेहरे पर भी चमक थीं। तीन बमों को पाकर कोई इतना खुश हो सकता है। यह मैं सोच भी नहीं सकता था। मै तो ढेर सारे पटाखों को पाकर भी संतुष्ट न था। मेरे पूछने पर पता चला कि वह उसका बड़ा भाई है। कुछ ही पलों में दोनों अपने थैलो को लिए मेरी आंखों से ओझल हो गए।
दीपावली आने को थी, पर घर की सफाई वाला पिछले कुछ दिनों से नहीं आ रहा था। सारा आंगन काफी गंदा हो गया था। एक सुबह पिता जी ने माँ से कहा ’ दिन में किसी से आंगन साफ करवाने की कोशिश करना। आँगन बहुत गंदा हो रहा है। ’
उसी दिन जब मै बम चला रहा था कि एक लड़का हमारी दीवार पर आ खडा हुआ। मेरे दिमाग में एक बात आई। मैने लडके से पूछा ’ क्या आंगन में से बम बीनने हैं ? ’
उसने खुशी से हामी भरी। मैंने उससे कहा कि वह सारे आंगन की झाडू. लगा कर सारा कूड़ा घरसे बाहर इकटठा कर ले और बमों को बीन ले। वह मेरी बातों से सहमत हो गया। मैने अन्दर से लाकर उसके हाथ में एक झाडू. थमा दी। वह काफी देर तक आंगन को साफ करता रहा और ढेर सारा कूड़ा घर के बाहर ले गया। फिर कुछ देर तक कूडे. में बमों को ढूढने के बाद उसने रूआंसी आंखों के साथ अपने सिर को उपर किया। उसके हाथ में एक भी बम नहीं था। उसने धीमीं आवाज में कहा ’ बाबू जी आज तो एक भी बम नहीं मिला। ’ उसके चेहरे को देखकर मुझे तरस आ गया। मैंने चार बम उसके हाथ मैं रख दिऐ। वह प्रसन्न हो उठा। मैने उससे कहा कि यदि वह दीपावली की रात को आयेगा तो मैं उसे कुछ और बम दूंगा । अगले ही पल वह कूदता फांदता चल पडा।
शाम को पिता जी आये । उन्होंने आंगन को साफ सुथरा देखकर घर में पूछ-ताछ की। मां को इस विषय में कुछ भी पता नहीं था। अतः मैने डरते-डरते सारी घटना पिता जी को बताई। मुझे डर था कि पिता जी इस बात से नाराज होगे कि मैने उस बच्चे को चार बम दे डाले है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
पिता जी ने कहा ’ बेटा, हमको कम से कम दस रूपये इस काम के लिए देने पड़ते। तुमने तो मात्र दो रूपये के बमों में यह सब काम इतनी सफाई से करवा डाला है। अगर वह लड़का तुम्हे फिर दिखे तो तुम उसे कम से कम पांच रूपये के बम खरीद कर दे देना। वह बहुत खुश होगा।
’अगले दिन मै उसका इन्तजार करता रहा। फिर दीपावली की शाम भी आ गई पर वह लड़का मुझे नहीं दिखाई दिया।
मैने पिता जी से मांगकर दस रूपये के पटाखें खरीद कर उसके लिए रखे हुए थे। दीपावली की रात पटाखों के धमाके होते रहे, फुलझड़ी व अनारों की रोशनी होती रही। पर वह नहीं दिखायी दिया। मैने मन ही मन यह सोच लिया कि वह भी अपने घर दीपावली मना रहा होगा।
दीपावली की अगली सुबह मैं अपनी आदत के अनुसार सूरज उगने से पहले घुमने के लिए घर से बाहर निकला। मैंने देखा कि सुबह के अंधेरे में दूर से कोई चला आ रहा है।
पास पहुचने पर मैंने पाया कि वही लड़का कंधे में थैला लटकाये कूड़ा बीन रहा है। मैं सोच भी नही सकता था कि वह इतनी सुबह मुझे इस प्रकार मिल सकता है। अपने उन्हीं फटे पुराने कपडों में। जैसे कि दीपावली के त्यौहार का उसके लिए कोई महत्व ही नहीं रहा हो। हजारों रूपये की आतिंशबाजी व पटाखों का मलवा सड़क पर बिखरा हुआ था। पर उसके जीवन में कोई फर्क नहीं था। मैने उससे पूछा ’ कल दिन भर तुम कहाँ रहे ?मै देर रात तक तुम्हारा इंतजार करता रहा। कैसी रही तुम्हारी दीपावली ? कल रात को तुमने आतिशबाजी का खूब मजा लूटा होगा। ’
वह झिझक कर बोला ’ बाबू जी कल रात आप के दिये चार पटाखों से दीपावली मना ली थी। फिर मां ने जल्दी सुला दिया। मुझे आज सुबह काम पर जल्दी जो निकलना था। मालूम है मां हमको दीपावली की रात को सदा जल्दी सुला देती है ताकि हम सबसे पहले उठ कर ढेर सारा लोहा बीन सकें । आप बडे. लोग दीपावली की रात को ढेर सारी फुलझडिया जलाते हैं और मै अगले दिन उन सब फुलझडियों के तारों को इकट्रठा कर लेता हूँ । सच हमारा त्योहार तो आज होगा क्योंकि आज मैं और दिनों के मुकाबले ज्यादा सामान इकटठा कर पाउंगा।
मै उससे और अधिक बातें करना चाहता था। मैने उससे कहा कि वह मेरे साथ चलकर अपने पटाखे ले ले। पर वह तैयार नहीं हुआ। उसने शाम को आने का वायदा किया। जाते-जाते उसने कहा ’ बाबू जी दीपावली की सुबह साल में एक बार आती है। आज का समय बहुत कीमती है। देरी हो जाने पर कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।’ कहता हुआ वह आगे निकल गया।
मै ठगा सा सड़क पर खडा रह गया। सब लोग दीपावली की रात का इंतजार करते हैं। पर यहाँ मेरी आंखों से ओझल होता हुआ वह लड़का भी था जिसने दीपावली की अगली सुबह का इंतजार किया था।

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गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पीड़ा में सहभागी


पीड़ा में सहभागी

घर में बहुत गरीबी थी। इतनी गरीबी कि सुबह खाना खाते समय शाम के खाने का पता नहीं होता था। घर में हम पांॅच भाई बहन खाने वाले थे और कमाने वाली मात्रा हमारी मां थी। सच। कभी कभी दुखी होकर मैं सोचता था कि घर छोड़कर कहीं दूर चला जाऊंॅ । पर फिर विचार आता था कि मां के बाद घर में सबसे बड़ा मैं ही हूॅं। मुझे मां की सहायता करनी चाहिए। पर कैसे ? इसका उत्तर मैं नहीं ढूंढ पाता था। फिर हमारे कस्बे के पास एक कारखाना लगना शुरू हुआ। बहुत से लोगों को कारखाने में काम मिल गया। मैंने भी मौका देखकर कारखाने के साहब के घर मंे घरेलू नौकर की जगह प्राप्त कर ली। मेरे दिन आराम से बीतने लगे। मां की सहायता होने लगी। वेतन के साथ-साथ मुझे ढेर सारी खाने पीने की चींजें मिल जाती थीं। घर में कोई विशेष काम भी न था। वहां तो मात्रा साहब और मेमसाहब थीं। गर्मियों में तो मेरे और भी मजे हो गये। साहब का बेटा राजन गर्मियों की छुट्टियों में घर आ गया था। उसका कारखाने में कोई साथी न था। अतः काम के वक्त मैं उसका नौकर था तथा अन्य समय में मैं उसका दोस्त। कभी कभी राजन जब अपनी रंग बिरंगी किताबें पढ़ता तो मौका देखकर मैं भी पन्ने पलट लेता था। फिर पता नहीं राजन को क्या हुआ वह मुझे पढ़ना लिखना सिखाने की कोशिश करने लगा। मैंने राजन को समझाया, ”छोटे साहब, हम पढ़ लिख कर क्या करेंगे ? पढ़ाई के लिए न तो हमारे पास पैसा है और न ही वक्त। आप हमारे उपर अपना वक्त कीमती खराब न करें।“ पर शायद राजन को इस प्रकार घरेलू नौकर बने रहना मंजूर न था। वह अक्सर मेम साहब से सिफारिश करता कि वे मुझे कारखाने में नौकरी दिलवा दें। मेम साहब उसे समझातीं कि जब मैं बड़ा हो जाउंगा तो वे इस बात पर विचार करेंगी। फिर भी वह हमेशा जिद करता ओर अपनी मां से कहता, ”मां, जब यह हमारे घर में काम कर सकता है तो फिर इसे कारखाने में नौकरी क्यों नहीं मिल सकती है ? यह तो हमारे चपरासी अंगद लाल से दोगुना काम करता है। आप पापा से कह कर तो देखिए। तब मेमसाहब उसे सिर में प्यार से चपत लगातीं और कहतीं, ”पगला कहीं का। जब तुम बड़े हो जाओगे तब समझोगे। बच्चों को कारखाने में नहीं रखा जा सकता है। मुझे भी समझ नहीं आता था कि आखिर ऐसा क्यों है ? फिर एक दिन राजन की दादी भी वहां आ गयी। वे बहुत अच्छी थीं। उनको पान खाने का शौक था। दादी मां अपना पान खुद लगाया करती थीं। मैं उनकी खूब सेवा करने लगा। धीरे धीरे मैं उनसे पान लगाना भी सीख गया। अब उनको पान बना कर खिलाना मेरे काम मंे शामिल हो गया। दादी मां मेरा लगाया पान खा कर कहतीं, ”अरे तूने तो हमारे शहर के पनवारी को भी मात दे दी है। तू तो बहुत अच्छा पान लगाने लगा है। अगर तू पान की दुकान खोल ले तो सारा कस्बा तेरी दुकान से पान खाना शुरू कर देगा।” राजन को दादी मां की यह बात जॅंच गयी। उसने मुझसे कहा कि मैं क्यों नहीं कारखाना के गेट के पास पान का एक खोखा लगा लेता हूं ? उसकी बात में दम तो था पर जब मैंने दादी मां से हिसाब लगवाया तो मुझे मालूम चला कि दुकान लगाने को कम से कम एक हजार रुपयों की आवश्यकता थी। इतने सारे रुपये। मैं तो सोच भी नहीं सकता था। राजन ने मेरी मां से बातचीत की। पर मां इस बात के लिए कतई तैयार न थी। मां के पास रुपये न थे। लेकिन राजन न माना। उसने मेरे मां से पूछा कि जब मैं नौकरी नहीं करता था तब भी तो हमारे घर का खर्चा चलता था। अब मेरी कमाई के रुपयों का क्या होता है ? मेरी मां के पास राजन की बातों का कोई उत्तर नहीं था। समय बीतता गया। एक शाम मैं और राजन कमरे में बैठे खेल रहे थे। तभी राजन के पिताजी कमरे में आये। उन्होंने हम दोनों के सामने एक हजार रूपये मेम साहब को दिये। मेम साहब ने रूपये वहीं पर एक फोटो के नीचे दबा कर रख दिये। खेलने के बाद मैं काम में लग गया। शाम को जब मैं घर जाने को तैयार हो रहा था तो मेम साहब ने मुझको बुलाया। राजन वहीं पर खड़ा था। मेम साहब ने मुझसे डांटते हुये पूछा ‘‘कल्लू सच सच बता दो। तुमने रूपये कहां छिपाये हैं नहीं तो पुलिस को बुलाना पड़ेगा? ’’ मैं समझ नहीं पाया कि मेम साहब किन रूपयों की बात कर रही थीं पर राजन ने मेरे सामने गवाही दी कि उसने मुझे रूपयों को छूते हुये देखा था। मैं सकपका कर रह गया। राजन इतना बड़ा झूठ बोल सकता है। मैं सोच भी नहीं सकता था। कितना झूठा था राजन। पर मेरी सुनने वाला वहां कोई नहीं था। बगल के कमरे से दादी मां आयी और उन्होंने कहा ”बहू राजन ठीक कह रहा है। पान की दुकान खोलने के लिए इसे एक हजार रूपये चाहिए थे। चोरी जरूर इसी ने की होगी।“ मेम साहब ने मुझसे बहुत पूछा पर मैं निरूत्तर था। मेरेे पास कोई सफाई हेतु शब्द नहीं थे। राजन ने एक सुनियोजित षडयंत्र के अंदर मुझे फंसा दिया था। मेरे पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। मैं रूपये देता तो कहां से लाकर देता। अतः मेरी मां को बुलाया गया। मां ने मुझे बहुत भला बुरा कहा और मेम साहब से विनती की कि मुझे पुलिस को न दें। अंत में यह फैसला हुआ कि मेरे वेतन से सौ रूपया महीना काट लिया जायेगा। मैं खून का घूंट पी कर रह गया। कुछ दिनों बाद राजन वापस अपने कालेज चला गया पर मेरे माथे पर कलंक लगवा गया। धीरे धीरे महीने गुजरते गये। फिर गर्मियों की छुट्टियां आ गयी। राजन फिर छुट्टियों में घर वापस आ गया। मैंने मन ही मन निश्चय किया कि मैं साहब की नौकरी अब छोड़ दूंगा क्योंकि मेम साहब के एक हजार रूपये पूरे होने वाले थे। मैंने राजन से कोई बात नहीं की। मेरा जब भी उससे सामना होता तो मुझे उसकी चमकती हुयी आंखों में छिपी हुयी शरारत साफ झलकती हुयी दिखायी पड़ती। ठीक एक तारीख को मेरी मां मेरा वेतन लेने आयी। इससे पहले कि मैं मेम साहब से कुछ कहता मेरी मां ने कहा- ”मेमसाहब, कल्लू अब काम नहीं करेगा। हम गलती के लिए आपसे क्षमा चाहते हैं।“ ”ऐसा क्यों ?“ मेमसाहब ने आश्चर्य से पूछा। मेमसाहब, आज आपके एक हजार रूपये पूरे हो गये हैं। अब कल्लू के उपर कोई इल्जाम नहीं है। मैं जानती हूं कि कल्लू निर्दोष है पर फिर भी मैंने एक हजार रूपये की भरपायी कर दी है। मैं आपकी अहसानमंद हॅूं। अन्यथा बदनामी के कारण हमेंे किसी भी घर में काम नहीं मिलता। चोरों को अपने घर में कौन रखता है ? चाहे किसी को झूठा ही चोर क्यों नहीं बना दिया जाये। मेरा सीना गर्व से तन गया। मैंने आंॅखे मिला कर राजन की ओर देखा। आखिर मेरी मां को मेरी बात पर पूरा विश्वास था जो मेरे लिए गर्व की बात थी। एकाएक राजन बोला, ”ठीक है कल्लू की मांॅ। बिल्कुल ठीक है। कल्लू अब हमारे घर काम नहीं करेगा पर वह किसी और के घर भी काम नहीं करेगा। अब वह पान की दुकान खोलेगा और सब लोग उसकी दुकान के पान की तारीफ करेंगे। तुमने बिल्कुल सच कहा कि कल्लू चोर नहीं है। यह मैं भी जानता हूंॅ कि कल्लू चोर नहीं है क्योंकि उस दिन के खोये हुये एक हजार रुपये आज भी मेरे पास हैं। ये रुपये मैंने आज तक छुपा कर रखे हुये हैं ताकि मजबूर होकर तुम एक हजार रूपये जमा कर सको और कल्लू अपनी दुकान खोल सके।“ यह कहते हुये राजन ने एक हजार रुपये मेरी ओर बढ़ा दिये। राजन की बात सुनकर मैं असमंजस में पड़ गया। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं राजन को उसके इस कार्य के लिए प्रताडि़त करूं या उसकी प्रशंसा करूं। इस एक साल के अंतराल में मैं पल पल चोर होने की पीड़ा को भोगता रहा था पर यह भी सच था कि बिना राजन की सहायता से मैं वह रूपये इकट्ठे नहीं कर सकता था। मेरे मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। तब राजन ने मुझसे कहा, ”कल्लू भाई कभी कभी एक बड़े काम के लिए बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। यह मत सोचो कि पीड़ा को मात्र तुमने ही भोगा है। सत्य तो यह है कि मैं भी इस पीड़ा से साल भर तुम्हारा सहभागी रहा हूं। मुझे माफ करना दोस्त, पर मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।“ राजन की आंखों मंे बरबस खुशी के आंसू छलक आये। राजन के कहने पर मैंने वह एक हजार रूपये ले लिये और कारखाने के गेट के पास पाप का खोखा डाल लिया। जब भी दादी मां कसबे में आती तो मैं पान लेकर सुबह शाम उनके पास जाता था। छुट्टियों में राजन मेरे कहने पर पान खा लेता था तो मुझे बहुत संतोष मिलता था। घटना बहुत पुरानी हो गयी है। राजन के माता पिता यहां के कभी के जा चुके हैं। राजन भी अब पता नहीं कहां होगा। पता नहीं कितने कल्लू उसके जीवन में आकर पारस बन गये होंगे पर मेरे जीवन में तो राजन जैसा एक ही हीरा आया है। उसे मैं कैसे भूल सकता हूं। हमारा कस्बा अब बहुत बड़ा हो गया है। राजन की दया से मैं शहर के बीचों बीच कल्लू पान भंडार के नाम की प्रसिद्व दुकान चलाता हूं। मेरी दुकान का हर ग्राहक मेरे पान की तारीफ करता है। क्योंकि शायद मेरे लगाये पान में दादी मां के आशीर्वाद व राजन के प्यार की सुगन्ध बसी हुयी हैे।



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रविवार, 19 अप्रैल 2009

कुन्नू :कहानी: हेम चन्द्र जोशी

घर में मैं सबसे बड़ा हूं पर पिताजी सदा कुन्नू की ही तरफदारी करते हैं। यह कुन्नू की बच्ची घर में सबसे छोटी है पर है सबकी नानी। पिताजी को घर की एक-एक बात की खबर देती है। किसने पढ़ाई की और किसने नहीं। किसने मां का कहना नहीं माना। यह कुछ भी नहीं भूलती है। जासूसों की तरह हम सबकी टोह लेती है और फिर हमारी शिकायत करती है।
मुझे सिनेमा जाने का शौक लगा था। उस दिन मैं स्कूल से जल्दी घर चला गया। मां से मैंने झूठ बोल दिया कि स्कूल में खेल-कूद की वजह से छुट्टी हो गयी है। ठीक ढाई बजे मेरा दोस्त वीरेन्द्र साइकिल लेकर घर पर पहुंचा। वह टिकट खरीद लाया था। मैं जल्दी उससे बातें करके मां के पास पहुंचा और फिर वीरेन्द्र के साथ निकल गया। पर इस कुन्नू की बच्ची ने पता नहीं कब मेरी व वीरेन्द्र की बातें सुन लीं। फिर शाम को पिताजी के घर आने पर मेरी पोल खोल दी। बस, पिताजी ने इतना डांटा कि मेरी आत्मा कांप उठी।
मुझे लगता था कि घर में सब लोग मुझे अभी बच्चा ही समझते हैं। उस दिन पिताजी बहुत देर तक मुझको समझाते रहे। वे दुःखी थे कि वे मेरे अन्य दोस्तों के माता-पिता की भांति मेरी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते हैं। मैं उनसे पिछले कई दिन से स्कूल ड्रेस की नई पैण्ट सिलवाने के लिए आग्रह कर रहा था। पुरानी पैण्ट अब बहुत खराब हो चुकी थी। उन्होंने मुझसे पिछले महीने वादा किया था। वादे के अनुसार इस महीने मेरी नई पैण्ट सिलनी थी। पर अब पिताजी ने इरादा बदल दिया क्योंकि कुन्नू का जन्मदिन नजदीक था।
रात को मेरा मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगा। पढ़ते समय कुन्नू मेरे पास आई। उसने मुझे एक बढि़या सा पेन दिया जो उसको आज ही स्कूल में इनाम में मिला था। वह चाहती थी कि मैं उसके पेन से बोर्ड की परीक्षायें दूं। मैंने पिताजी पर आया गुस्सा कुन्नू पर निकाल दिया। उसे जोर से डांट कर भगा दिया। 
अब मैं सोच रहा था कि मैंने कुन्नू को क्यों डांटा ? वह तो अपना इनाम का पेन मुझे देने आई थी। क्या मेरा व्यवहार उचित था ? क्या मैं कुन्नू की सफलता को देखकर खीझ उठता हूँ ? उसे घर में पिताजी अच्छा मानते हैं और स्कूल में शिक्षक व विद्यार्थी। बेचारी कितने प्यार से अपना पेन देने मुझे आई थी। शायद मैं ऐसे पेन को किसी को न दे पाता। इतना सुन्दर पेन था वह । सोई हुई मासूम कुन्नू के चेहरे को देखकर मैं समझ नहीं पाता कि यह मेरी शिकायत क्यों करती है।
कुन्नू ने अपने जन्म दिन पर फ्राॅक न बनवाने का निश्चय किया। अतः पिताजी ने मेरी पैण्ट सिलने को दे दी। जन्म दिन पर कुन्नू ने अपनी सहेलियों  को भी नहीं बुलाया। मुझे समझ में नहीं आता इस कुन्नू को हो क्या गया है। यह दिन पर दिन बदलती जा रही थी। ज्यादातर समय किताबों में ही खोयी रहती थी।
मैंने तब एक नया तरीका निकाला। जब पढ़ाई का मन न हो तो कहानी की किताब पढ़ ली जाए। कहानी की किताब एक बार पढ़ना शुरू करो तो छोड़ने का ही मन नहीं चाहता। काश, मेरा इतना मन कोर्स की किताबों में लग पाता। शायद मां की इच्छा पूरी हो जाती। मैं प्रथम श्रेणी से तो पास हो ही जाता और शायद किसी इंजीनियरिंग कालेज में भी दाखिला मिल जाता । 
पिताजी को जब पता लगा कि मैं आजकल कहानी की किताबें ज्यादा ही पढ़ने लगा हूं तो वे बहुत नाराज हुए। फिर उन्होंने घर में सभी से कहा कि कोई भी मुझे पढ़ने को न कहे। शायद उन्होंने हार मान ली है। अब मेरे भाग्य में जो बनना होगा वही मैं बनूंगा। मेरे पीछे प्रयत्न करना बेकार है। यही पिताजी का अन्तिम मत है। मैं बहुत दुःखी हुआ। मैंने जी लगाकर पढ़ने का निश्चय कर लिया।
मैंने पिताजी को प्रथम श्रेणी में पास होकर दिखा दिया। इंजीनियरिंग कालेज में मेरा दाखिला भी हो गया। मां- पिताजी बहुत खुश हुए। पर उनको एक ही चिंता थी कि पढ़ाई का खर्चा कैसे चलेगा। घर में मेरे जाने की तैयारियां चल रही थीं। पिताजी इधर-उधर से रुपयो का इंतजाम कर रहे थे। आखिर इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाना कोई आसान काम तो था नहीं। आखिर पैसों का इंतजाम करके मुझे इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ने भेज दिया गया।
मैं छुट्टी में घर आया। पिताजी और मां बहुत खुश थे। कुन्नू दौड़ कर मेरे पास आई। अतुल, राकेश व कविता भी आ गई। सभी कालेज के बारे में पूछने लगे। मैंने उनको कालेज की ट्रेनिंग के किस्से एक-एक करके सुनाए।
रात को मैंने पिताजी से बातचीत की। उनको बताया कि उनका दिया खर्चा कम पड़ रहा है। महीने के आखिर में तो खाना खाने के लाले पड़ सकते हैं। कापी, किताबें, हास्टल का खर्चा, चाय-नाश्ता और खाना सभी कुछ महंगा है। मैंने पिताजी से कहा कि पिताजी क्या करूं? ऐसा न हो कि मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़े। पिताजी ने मुझे ढांढस बंधाया। चिंता न करने की सलाह दी। कहा, कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा।
अतुल ने मुझे बताया कि कुन्नू के पास घर में सबसे ज्यादा रुपए हैं। वह समय-समय पर मिले रुपए जोड़ती रहती है।  
शाम को पिताजी घर आए। उन्होंने कुन्नू को बताया कि एक अच्छी साइकिल मिल रही है। यदि वह अपने पास से पांच सौ रुपए दे दे तो वे कल ही उसके लिए साइकिल ले आएंगे। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कुन्नू ने पिताजी को रुपए देने के लिए मना कर दिया। जबकि वह पिछले चार महीने से साइकिल की जिद कर रही थी। 
उसने पिताजी से कहा कि वह अपने छह सौ दस रुपए की पूंजी से मात्रा एक सौ दस रुपए उनको दे सकती है। पिताजी ने उसको बहुत समझाया पर उसने एक न सुनी। मैं भी उसकी जिद को नहीं समझ पा रहा था। पिताजी व कुन्नू बहस कर रहे थे। मैं सोने चला गया। अगले दिन सुबह मुझे वापिस जाना था।
फिर हास्टल में एक दिन मैंने सुबह नाश्ता नहीं किया। सिर्फ खाना खाया। चाय भी एक बार ही पी। चार-पांच तारीख तक पिताजी का मनीआर्डर आएगा। पता नहीं तब तक कैसे काम चलेगा यह ही मन मैं विचार था। कालेज में पढ़ाई जोर शोर से चल रही थी। पिताजी के दिए रुपये समाप्त होने जा रहे थे। घर से मनीआॅर्डर आने में भी कुछ दिन बाकी थे।
उस दिन मैंने जैसे  ही अपनी किताब का एक पन्ना खोला मैं हक्का बक्का रह गया। किताब में एक पांच सौ का नोट बड़े ही ढंग से चिपका हुआ था। कुन्नू ने नीचे लिखा था कि शायद मेरे रुपए समाप्त हो चुके होंगे। मुझे इन रुपयों की जरूरत होगी। मैं इस महीने इन रुपयों से काम चला लूं। अगले महीने जरूर कोई दूसरा इंतजाम हो जाएगा। उसकी लिखी बात पढ़कर मेरी आंखे नम हो गई। सच, कुन्नू तुम कितनी समझदार हो गई थी। यह बात तो मैं कभी समझ ही नहीं पाया।
अब मुझे समझ में आ गया कि उसने पिताजी को साइकिल खरीदने के लिए रुपए क्यों नहीं दिए थे। कुन्नू ने मेरी आने वाली परेशानी को सोचकर अपनी सबसे प्यारी चीज का त्याग कर दिया। पर सबसे आश्चर्य की बात तो यह कि उसने मेरे और पिताजी के बीच हुई अंतरंग बात को कितनी सफाई से सुनकर किसी को जाहिर नहीं होने दिया और मेरी समस्या का समाधान कितनी सफाई से कर डाला। 
मैं बहुत शर्मिन्दा हो  गया। मैंने सदा उसे बहुत छोटा समझा। उसकी शिकायतों से सदा नाराज रहा। मैं कभी यह समझ ही नहीं पाया कि वह भी बड़ों की तरह मुझे इतना प्यार करती है। मुझे पहली बार लग रहा था कि मैं उसके सामने बहुत अदना हूं।


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रविवार, 12 अप्रैल 2009

थैंक्यू डाक्टर: कहानी: हेम चन्द्र जोशी


थैंक्यू  डाक्टर

मेरा काम ही ऐसा है कि छोटे बच्चे मेरे पास आना पसंद नहीं करते हैं। जो आता भी है उसे जाने कितना बहला व फुसला कर उनके माता-पिता मेरे पास लाते हैं। मेरे क्लीनिक के आगन्तुक कक्ष तक तो अक्सर सब ठीक ठाक चलता है। पर डैंन्टल चेयर पर बैठते-बैठते करीब-करीब सभी बच्चे की सांसे थम सी जाती है।
एक दिन की बात है। एक व्यस्ततम दिन का कार्य निपटा कर मैं क्लीनिक से घर पहुंचा ही था। तभी मुझे लगा कि बाहर कोई आया है। मालूम करने पर पता चला कि एक महिला एक बच्ची के साथ खडी हैं। वे बच्ची को दिखाना चाहती थी। मैं बहुत थका हुआ था। थोडी देर आराम करने के बाद मुझे फिर देर रात तक शाम के मरीजों को देखना था। मुझे खीज सी आ गई थी। फिर भी मै यह सोच कर बाहर निकला कि मै उनको शाम को क्लीनिक में आने को कह दुंगा। बाहर निकलते-निकलते न जाने कहां से मुझे मां की नसीहतें याद आ गई। पहले दिन जब मैंने अपने घर में क्लीनिक खोली थी तो मां ने मुझसे कहा था ’ बेटा अपने घर व क्लीनिक से कभी किसी को निराश वापस मत भेजना यही तुम्हारी सफलता की कुंजी होगी’। यह विचार आते आते मेरी थकान न जाने कहां फुर्र हो गई । 
’ नमस्कार डाक्टर साहब। मैं असमय कष्ट देने के लिए क्षमा चाहती हूं। पर क्या करुं। मेरी बेटी कुछ देर पहले स्कूल में गिर गई थी। इसका सामने का दांत थॊडा सा टूट गया हैं। यदि आप देख लेते तो बडी कृपा होगी’। एक सधी आवाज में उन्होंने विनती की। 
मैंने बच्ची का दांत देखा और उनसे कहा कि घबराने की कोई बात नहीं हैं। साथ ही हिदायत दी कि यदि दांत में ठंडा गरम लगे तो दिखाने चली आये और ध्यान रखे कि दांत काला न पड.ने पाये। यह कहके मैने एक कागज में कुछ दवाईयाॅ लिख कर उन्हे दे दी।
कुछ दिन बाद वह बच्ची अक्सर रिक्शे में बैठी मुझे स्कूल जाते दीखती थी। मै समझ गया कि उसका घर कही आस पास ही हैं। करीब एक दो माह के बाद वह महिला फिर एक दिन मेरे क्लीनिक में उस बच्ची का हाथ थामे आई। बच्ची कुछ रूआंसी सी थी। उन्होने पुरानी बात का ज्रिक करते हुए मुझे बताया कि दांत टूटी हुई जगह से हल्का सा काला पड.ने लगा हैं। 
उनकी चिंता को दूर करते हुए मैने कहा,’ घबराने की आवश्यकता नहीं हैं, दूध के इस दांत को तो टूटना ही हैं। बस इसे समय से पहले निकालना पड.ेगा। नया दांत फिर कुछ समय बाद अपने आप निकल आयेगा। 
वह नन्ही बच्ची सौम्या हमारी बातों को बडे. ध्यान से सुन रही थी। उसने झट से अपने मुहॅं पर हाथ रखते हुए कहा, ’ अंकल मैं दांत नहीं निकलवाउगी। मुझे बहुत दर्द होगा।’ 
मै हंस पड.ा ।मैंने पूछा, ’बेटा तुम्हारा तो अभी तक एक दांत भी नही निकला हैं। फिर तुम्हंे कैसे मालूम के बहुत दर्द होता हैं?’ 
सौम्या बहुत देर तक चुप रहीं। कई बार पूछने पर उसने बताया कि यह बात घर से चलते समय उसके भाई ने उसे बताई थी। तब मैंने कहा कि उसे भाई ने उससे झूट कहा हैं। उसके विल्कुल दर्द नहीं होगा। उसने बडी मुश्किल से अपना मुहॅं खोला। इंजेक्शन की सुई देखते-देखते उसकी आॅंखे डब डबा उठी। फिर मेरे इंजेक्शन लगाने की कोशिश को उसने एक झटके में अपना हाथ चला कर विफल कर दिया। इंजेक्शन की सुंई टेड.ी हो गई। आखिरकार हार मानकर उसकी मां  उसे लेकर वापस चली गई क्योंकि फिर सौम्या ने अपना मुहॅं खोला ही नहीं।
लेकिन सौम्या के इस प्रकार चले जाने से समाधान तो होना नहीं था। मजबूरन कुछ समय बाद सौम्या को दोबारा मेरे पास पड.ा। अब दांत काफी नीचे तक खराब हो चुका था। उसका निकालना अब अति अवश्यक था वर्ना इंफैक्शन जड़ तक बढ़ सकता था। मैंने सौम्या की हिम्मत बढाते हुए कहा, ’बेटे तुम्हारे बिल्कुल दर्द नहीं होगा। तुम कुर्सी के दोनों  डन्डों को जोर से पकड. कर रखो । मैं दवाई लगा देता हूं। यदि दवाई लगाने में दर्द हो तो तुम हाथ हिला देना। मै समझ जाउगा। इसके बाद हम सोचेगें दांत उखाड.ना हैं कि नहीं?’ 
सौम्या ने मेरे चेहरे को ध्यान से देखा। शायद वह यह पढने की कोशिश कर रही थी कि मै उससे सच बोल रहा हूं या झूट ? फिर उसने एक नटखट मुस्कान के साथ हाथ बढाते हुए कहा, ’ तब करिए प्रौमिस ! आप दांत नही उखाडे.गे ! ’
"प्रौमिस बेटे। ’ मैंने अपने गले को छूते हुए कहा। 
सौम्या ने ज्यों ही अपना मुहॅं खोला, मैंने फुर्ती से दाए हाथ में छुपाया हुआ इंजैक्शन उसे लगा दिया। मैं जानता था कि सौम्या को मात्र सुईं का भय सता रहा था अन्यथा एनैस्थिसिया के इंजैक्शन का दर्द तो साधारण इंजैक्शन से भी कम होता हैं। सौम्या जोर से रोने लगी। दर्द नहीं वह घवराहट का रोना था। अतः मैंने सौम्या के हाथ में एक दांत का टुक्डा रखते हुए कहा, ’ तुम झूट मूठ रो रही हो। दांत को दवाई लगते ही अपने आप निकल आया और अब तुम्हारे कोई दर्द नही हो रहा हैं।’ 
सौम्या एक मिंनट को अचकचा गई। उसने उलट पुलट कर दांत देखा। फिर पाया कि वास्तव में उसके कोई दर्द नहीं हो रहा था। फिर वह क्यों रो रही हैं ? उसने रोना हल्का कर दिया। फिर उसने अपनी मां व मेरे चेहरे की ओर देखा। दोनों के चेहरो पर हल्की सी मुस्कराहट को देख कर वह समझ गई कि उसको धोखा दे दिया गया हैं। वह आश्चर्यचकित थी कि बिना दर्द के उसका दांत कैसे बाहर निकल गया अतः अब वह दुगने वेग से रोने लगी। कुछ देर समझाने के बाद वह शांन्त हो गई। अब तक मेरा इंजैक्शन काम कर चुका था। दांत की जडे. सुन्न हो चुकी थी। मैं जानता था कि अब दांत निकालने पर सौम्या को को कोई दर्द नहीं होना था। मैने सौम्या से पानी का कुल्ला करने को कहा। फिर दांत की जड. में रूई लगाने के लिए मुहं खॊलनॆ को कहा। सौम्या की हिम्मत वापस आ गई। उसने दोवारा मुहॅं खोल दिया। अब मैने बडी आसानी से उसका खराब दांत उखाड. कर बाहर कर दिया। सौम्या थोड.ी घबराई जरूर पर असली काला दांत अब उसके हाथ में था। 
’ यह क्या हैं अंकल ? ’ उसने आश्चर्य से पूछा।
’ बेटे, यह हैं तुम्हारा असली काला दांत जो गिर जाने से टूट गया था।’ मैने हंस कर उत्तर दिया था। 
’ तो वह पहले वाला दांत ? ’ वह धीरे से बुदंबुदाई और फिर नाराज होकर बोली, ’ अंकल, आपने दो बार मुझसे झूठ बोला हैं। साथ ही साथ आपने अपने प्रैामिस को भी तोड.ा हैं। जाइऐ मै आपसे बात नही करती।’ वह रूठ कर बोली। 
थोड.ी देर बातचीत के बाद उसकी मां वापस जाने को मुड़ी। उन्हॊने सौम्या से कहा, ’ बेटा अंकल से थैक्यू कहो। देखो तुम्हारा दांत ठीक हो गया।’ 
पर नाराज सौम्या ने बार बार कहने के बाद भी थैक्यू नहीे कहा। फिर अंत में बोली, ’ अंकल झूठ बोलते हैं और अपना वादा भी तोड. देते हैं। मैं इनको थैक्यू नहीं कहूंगी।’ 
मैं मुस्करा कर रह गया। उनके जाने के बाद मैं अपने काम में व्यस्त हो गया। इसके बाद सौम्या मुझे कई बार रिक्शे से स्कूल जाती दिखती रहती थी। पर जब भी उसका रिक्शा मेरे पास से गुजरता तो वह किसी बच्चे की ओट में छिप जाती। कभी कभी मुझे लगता था कि सौम्या से झूठ बोलकर कहीं मैने गलती तो नहीं की थी ? आखिर एक छोटी घटना से बच्चे का दिल इतना टूट सकता हैं, मै सोच भी नही सकता था।
इस बात की बीते छह-सात महीने हो गए थे।एक दिन मैं क्लीनिक में काम कर रहा था। तभी भड.ाक की आवाज के साथ क्लीनिक का दरवाजा खुला। मैंने देखा सौम्या दौड़ी चली आ रही हैं। मैंने नाराज होकर कहा, ’ यह क्या बदतमीजी हैं बेटे, दरवाजा इस तरह खोलते हैं ?’ 
"अंकल आप अपना सिर नीचे करिए। मुझे कान में एक जरूरी बात कहनी हैं।’ सौम्या ने एक मधुर आवाज में कहा। मैंने अपना कान नीचे कर दिया। सौम्या ने कान में कुछ न कहकर, धीरे से मेरे गाल को अपने नन्हे होठों से चूम लिया। फिर एक लिफाफा मेरे हाथों में थमा दिया। 
’ यह क्या हैं सौम्या ? ’मैने आश्चर्य से पूछा। 
’खोलकर तो देखिये अंकल।’ सौम्या ने उत्तर दिया। 
लिफाफे के अन्दर सौम्या के द्वारा बनाया हुआ एक कार्ड था। जिसमे बड़े-बडे़ अक्षरों में लिखा था। ’थैक्यू डाक्टर।’
मेरे लिफाफा खेालते-खेालते सौम्या वापस भाग चली थी। मैंने सौम्या की ओर देखते हुए आवाज लगाई। ’ यह किसलिए सौम्या ? ’ 
मेरे प्रश्न पूछने तक वह दरवाजे के पास पहंुच चुकी थी। उसने पलट कर मेरी ओर देखा। फिर मुस्कुराते हुए अपनी अंगुली से छोटे से निकलते हुए दांत पर इशारा करके बोली, ’ इस सुन्दर दांत के लिए अंकल।’ दूसरे ही क्षण वह वह भड़ाक से दरवाजा बंद करके बाहर चली गई। 
’यह सब क्या चक्कर था डाॅक्टर ? ’ मेरे मरीजों व सिस्टर ने एक स्वर में आश्चर्य से मुझसे पूछा। 
’आप लोग नहीं समझेगें। एक नन्हें मरीज ने मुझे माफ ही नहीं किया वरन् मेरे विश्वास को कई गुना बढ़ा दिया हैं।’ मैने मुस्कराते हुए कहा और दुगने उत्साह से अपने काम में लग गया।

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रविवार, 5 अप्रैल 2009

शाबाश मोतीचूर: कहानी: हेम चन्द्र जोशी


SUNDAY, 5 APRIL 2009



शाबाश मोतीचूर
बहुत पहले की बात है। जंगल के छोर पर एक बरगद का वृक्ष था। जिसमेंकबूतरों का झुण्ड रहता था। उनके नेता का नाम शान्तिप्रिय था। वहबुद्विमान  दूरदर्शी कबूतर था। उसके नेतृत्व में सारे कबूतर ऊँची-ऊँचीउड़ाने भरते और मीलों की यात्रा करने के बाद भी थकते नहीं थे। सभी कबूतरमेहनत से दाना चुगतेपानी पीते  आकाश में स्वछंद विचरते थे।

इस दल में एक मोतीचूर नामक युवा कबूतर भी था। वह बड़ा पराक्रमी बलशाली था। एक दिन वह उड़ता-उड़ता राजप्रसाद में जा पहॅुंचा। यहां परराजा ने अपने नन्हें युवराज के लिए ढेर सारे कबूतर पाल रखे थे। ढेर सारेदाने  कबूतरों के झुण्ड को देखकर वह लालायित हो उठा। उसने एक लम्बीउड़ान भरी और अपने नेता शान्तिप्रिय के पास जाकर उसे राजमहल के बारेमें बताया।

स्थान देखकर शान्तिप्रिय के मन में विचार आया-‘स्थान सुन्दर सुरक्षित है।दाना-पानी की व्यवस्था भी अच्छी हैकिन्तु इतनी सुविधाएं उपभोग करनेसे हमारी आने वाली सन्तानें अयोग्य हो जाएगी। वे मात्रा  पालतू कदूतर वनकर रह जायेंगे। इसलिए उसने इस राज प्रासाद में रहने के विचार को उचितनहीं समझा। सब कवूतर मान गये पर मोतीचूर अनमना हो गया। मोतीचूरअक्सर राज प्रासाद की मीनारों पर जा बैठता। वह टुकर-टुकर नीचे बैठेकबूतरों  उनके खाने-पीने को निहारा करता।

जब शान्तिप्रिय को पता चला तो उसने मोतीचूर से कहा- ‘मोतीचूरतुमहमारे दल के उपनेता हो। राजमहल में रहने का लालच तुम्हारे विवेक परहावी हो रहा है इसलिए तुम वहाॅं मत जाया करो। तुम्हारा आचरण दल केअन्य पक्षियों के लिए हितकारी नहीं है।‘ लेकिन मोतीचूर राजप्रासद के मोहको त्याग  सका। वह महल की छत से आंगन में घूमते कबूतरों और प्रचुरमात्रा में उपलब्ध दाने को लालच से देखा करता। राज प्रासाद के कबूतरों केनेता का नाम आश्रित था। एक दिन मौका देखकर वह स्वयं मोतीचूर के पासउड ़कर आया और बोला, ‘हे सफेद कमल से सुकोमलहंस की भांति सुन्दरकबूतरतुम किस प्रयोजन से प्रतिदिन राज प्रासाद की मुंडेर पर बैठते हो,अगर तुम चाहो तो हमारे दल में शामिल हो सकते हो।‘ वह मोतीचूर केमनोभावों का पढ़ना चाहता था।

आश्रित के निमंत्राण को पाकर मोतीचूर खुश हो गया। अब जब उसके दल केकबूतर ऊँची ऊँची उड़ाने भरने का प्रयास करते और दाना पानी खोजते तबमोतीचूर चुपके से राज प्रसाद में पहुंच जाता। वह दिन भर वहीं दाना पानीचुंगता और कभी कभी पिंजरे के अंदर भी चला जाता। पर शाम होने के पूर्वही वह अपने दल में जा मिलता।

समय बीतता गया मोतीचूर ने लंबी उड़ाने भरनी छोड़ दीं। वह आराम तलबहो गया। और पिंजरे मंे ही रहने लगा। उसे आकाश की ऊंचाईयों से डरलगने लगा। मोतीचूर को दल में  पाकर उसकी खोज की गयी। ढूंढते ढूंढतेउसके मां बाप भाई बहन  मित्रा उसे समझाने आये और बोले हे मोतीचूरतुम महान पराक्रमी  बहादुर कबूतर हो। तुम हमारे दल के उप नेता हो।आने वाले समय में तुम्हें हमारा नेतृत्व करना है। तुम्हारे इस प्रकार पिंजरेमें सजावट की वस्तु की तरह रहना शोभा नहीं देता। तुमने क्या सोच कर येमार्ग सुना है ? समझदारी से काम लो और हमारे साथ चलो। पर जब मोतीचूरनहीं माना तो वे हताश होकर वापस चले गये। समय बीतता गया।राजकुमार बड़ा हो गया। कबूतरों से उसका दिल भर गया। उसने राजा सेबोलने वाले तोतों की फरमाईश की।अब राजकुमार के लिए ढेर सारे तोतेलाये गये। कबूतरों  को हटाकर महल के एक माली को सौंप करके लकड़ी केघरों में रख दिया गया। अब  तो उनको ठीक से दाना पानी मिलता और ही उनकी देखभाल होती। सभी कबूतर दुखी थे। किन्तु वे स्वतंत्रा जीवननिर्वाह करने  उड़ने का साहस नहीं कर सके।

फिर एक दिन माली ने कबूतरों की देखरेख से तंग आकर उनको एक बहेलियेको बेच दिया। बहेलिया शहर की हाट में बैठकर कबूतरों को बेचने लगा।

मोतीचूर को एक कुम्हार खरीद कर ले गया। बहेलिये ने महीन धागे सेमोतीचूर के उड़ने वाले पर बांध दिये थे। कुम्हार का नन्हा सा बेटा मोतीचूरको बहुत प्यार करता। उधर मोतीचूर अपनी पिछली जिंदगी को याद करकरके आहत होता जब वह उंचे आसमान में उड़ते पक्षियों को देखता तोउसकी आंखे नम हो जातीं।

एक दिन मोतीचूर का धागा टूट गया। उसने अपने पंख फड़फड़ाये। उसकीटांगे जमीन से उठ पड़ी।वह थोड़ी सी उंचाई पर जा बैठा। किन्तु उंचाई से नीचेदेखने पर उसे भय लगने लगा। वह  उड़ने की हिम्मत कर सका ओर  हीउतरने की। उसकी टांगे  शरीर कांपने सा लगा। कुम्हार ने उठाकर उसकोफिर उसके काबुक में डाल दिया।

सौभाग्य से एक दिन मोतीचूर के पुराने साथी कुम्हार की झोंपड़ी के पासआये। उन्हांेने मोतीचूर को वहां बैठे देखा। सभी साथियों ने खुशी से आवाजदी - ‘मोतीचूरमोतीचूर

मोतीचूर ने उपर देखा। उसके साथी उसको बुला रहे थे। उसके नेत्रों से आंसुओंकी धारा बहने लगी। उसने रूंधे गले से कहा - ‘मित्रोंा तुम इतने समय सेकहां थे ? आओनीचे आओ। बात करेंगे। कबूतरों ने कहा, ‘मोतीचूर नीचे हमेंखतरा है। तुम उड़कर हमारे पास  जाओ।

मोतीचूर का शरीर कांपने लगा पर वह उड़  सका। उसने रोते हुये कहादोस्तो मैं उड़ना भूल गया हूं। मेरे परों में अब उड़ने की शक्ति नहीं रही।

उसके मित्रोंा को बहुत आश्चर्य हुआ। वे अपने नेता शान्तिप्रिय को बुलाकरलाये। शान्तिप्रिय उतर कर भूमि पर आया। उसने अपनी चोंच से मोतीचूरको ढेर सारा प्यार किया और कहा ‘मोतीचूर तुम मेरे पुत्रा के समान हो।निराशा ने तुम्हारे पराक्रम को कुंठित कर दिया। तुम आज भी उतने हीबलशाली  पराक्रमी हो। आओमेरे साथ उड़ो।

पर मोतीचूर नहीं माना। उसने कातरता से कहा, ’हे स्वामीमैंने आपकी बातनहीं मानी। इसीलिए मेरी यह हालत हुयी है। आप मुझे इसी हाल में छोड़जायें। मुझे अब कोई आशा नहीं है। यह कह कर मोतीचूर जोर जोर से रोनेलगा।

तब तक शान्तिप्रिय ने दल के अन्य कबूतरों को धीरे से समझा दिया था।मोतीचूर को दिलासा देते हुये बातों बातों में शान्तिप्रिय उसे कुम्हार कीझोंपड़ी के उपर ले आया। वहां पहुंचकर उसने यकायक मोतीचूर को धक्का देदिया। मोतीचूर घबरा कर नीचे गिरा और डर के मारे उसने डैने चलाने शुरूकर दिये ताकि वह भूमि पर उतर सके। किन्तु शान्तिप्रिय की योजना केअनुसार ढेर सारे कबूतरों ने मोतीचूर के नीचे कबूतरों की एक चादर सी बनादी। सभी कबूतर धीरे धीरे उपर उड़ते गये। मजबूरन मोतीचूर को उपर उड़नापड़ा।

काफी उंचाई पर पहुंचने के बाद सभी कबूतर उड़ कर एक ओर हट गये।मोतीचूर ने देखा कि वह काफी उपर उड़ रहा है। नीचे छोटे छोटे पेड़  खेतदिखाई दे रहे थे। मोतीचूर घबरा गया। उसका गला डर से सूख गया। घबराहटमें उसके डैने धीमे पड़ गये। वह लड़खड़ाने लगा। उसका सिर घूमने लगा।

मोतीचूर जैसे ही नीचे गिरने लगा उसे शान्तिदूत की आवाज सुनाई दी, ’मोतीचूर मोतीचूर। घबराओ नहीं तुम वही बहादुर और पराक्रमी मोतीचूरहो। हमारे दल के उपनेता। संभलो और अपने डैने चलाओ। तुम मृतकों केसमान ही जीवन जी रहे हो। इसलिए मृत्यु से मत डरो और जीवन के लिएडैने चलाओ। मोतीचूर डैने चलाओ-डैने चलाओ।

मोतीचूर की चेतना शान्तिदूत की चिल्लाहट से वापस लौटी। उसने डैनेचलाने शुरू कर दिये और पल भर में ही वह उपर और उपर उड़ने लगा। उसनेमस्ती में कलाबाजियां खानी शुरू कर दीं। नीचे से उसके मित्रा चीख रहे थे, ’शाबाश मोतीचूरशाबाश तुम जीत गये मोतीचूर तुम जीत गये।


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