शनिवार, 16 अप्रैल 2022

निवेदन

 आदरणीय योगी जी,

मैने उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान बीजेपी सरकार के फेवर में अनेक फेसबुक पोस्ट लिखे थे जो शायद पसंद किये गए। पर चुनाव के बाद पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार को आशातीत विजय से प्रतिष्ठित देखकर भविष्य के प्रति चिन्ता जताई थी। आदमी लालची है। वह क्षणिक लालच में अपना भविष्य बिगाड़ लेता है।
बीजेपी का एक बड़ा वोटिंग वर्ग गांव से आता है जो किसान, गरीब व पिछड़ा है। इनको अपने ऋण, जमीन व अन्य कारणों से तहसील में जाना ही पड़ता है।  यदि यह कार्य गांव स्तर पर ही हो जायें तो निश्चित रूप से इनका विश्वास पार्टी की ओर बढ़ेगा। अब गांव स्तर पर बीजेपी के पढ़े लिखे नौजवानों को फ्रेंचाइजी के रूप में रखा जाए जो ऑनलाइन एप्पलीकेशन को एक नॉमिनल फीस लेकर प्रोसेस करें और तहसील को जिम्मेदार बनाया जाए कि वे एक निश्चित अवधि में इनके द्वारा प्रोसेस एप्पलीकेशन के आधार पर आवश्यक सर्टिफिकेट प्रेषित करे। इससे भ्रष्टाचार कम होगा, लोगों को आजीविका मिलेगी, समय की बचत होगी और हमको ख्याति!


रविवार, 16 अगस्त 2020

अदिति दी

 अदिति दी❤❤❤❤😊


           हम फौजियों की तो कुछ जिंदगी ही कुछ ऐसी है कि हर दूसरे तीसरे साल हमारा ट्रांसफर हो ही जाता है। ट्रांसफर के बाद ट्रांजिट एकोमोडेशन में रहना, ढेर सारे क्रमबद्ध बनाये गए बक्से जिनको जरूरत के अनुसार खोलना फिर पूरी एकोमोडेशन का अलॉटमेंट ! और फिर दोबारा ट्रांसफर। 

    अपने पति के नए ट्रांसफर के पश्चात एक बार मैं फिर एक नए शहर में आ बसी। फिर वही चक्कर, बच्चों के लिए नए स्कूल और अपनी नौकरी के लिए एक नया कॉलेज ढूँढना। सारी समस्याएं सेटल्ड हुई और मैं नौकरी करने के लिए अपने नए स्कूल में पहुंच गई। स्टाफ रूम में मुझको अदिति मैम के बगल में बैठने की सीट मिली। मेरी उनसे बातचीत हुई और वह मुझे एक बहुत ही स्पष्ट वक्ता लगीं। 

       कुछ दिन स्कूल में रहने के पश्चात मुझको मालूम चला कि अदिति मैम के पति आर्मी में कर्नल थे और रिटायर हो गए हैं। वे एक बड़े सम्पन्न परिवार से थीं। पर पता नहीं क्यों उनकी रेपुटेशन स्कूल में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसा क्यों है मुझे कुछ समझ में नहीं आया। पर मैंने महसूस किया कि वे तो दूध का दूध और पानी का पानी करने वाली महिला थीं। उनके कामों में तो कोई बनावट नहीं थी। फिर भी मुझे ऐसा लगने लगा था कि उनसे दोस्ती बढ़ाकर कहीं मैं फँस न जाऊं। उनकी और मेरी कोई बराबरी भी न थी । मेरे पति तो काफी छोटे पद पर थे। पर मेरी मजबूरी थी कि स्टाफ रूम में मुझको सदैव उनके पास ही बैठना पड़ता था। 

         समय बीतता गया और मेरी उनके साथ दोस्ती दिन-प्रतिदिन गहरी होती ही चली गई । मानो मेरी बड़ी बहन हों। पर वह सदैव मेरे साथ भी पाई पाई का हिसाब किया करतीं थीं। ना किसी का लेना ना किसी का देना। पर अपने दो-तीन वर्ष के स्टे के दौरान मैंने देखा की उन्होंने मुझको एक से एक खूबसूरत गिफ्ट भेंट किए थे। पर जब भी मैंने उनसे कोई छोटी सी भी चीज मंगाई तो चाहे वह पांच ही रूपयों की भी क्यों ना हो उन्होंने पैसे तुरन्त मुझसे मांग लिए। यह एक अजीब बात थी। एक और तो वह महंगे गिफ्ट भी मौके बेमौके ऐसे ही दे दिया करती थीं और दूसरी ओर वह पाई पाई का हिसाब रखती थीं । मुझको भी कोई आपत्ति न थी क्योंकि मैं भी रुपियों सम्बन्धी हिसाब को बड़ा स्पष्ट रखने पर विश्वास रखती थी। 

        फिर वही हुआ । मेरी पति का ट्रांसफर ऑर्डर आ गया और हमारे शहर छोड़ कर जाने का समय निश्चित हो गया। मैंने सोचा की अदिति दी के मेरे ऊपर बहुत सारे अहसान हैं और जब मैं स्कूल छोड़ कर जाऊंगी तो वह अपनी आदत के अनुरूप मुझको जरूर ही कोई अच्छा गिफ्ट भेंट करेंगी। अतः उनके अहसान से बचने के लिए मैंने अपने पति से कहा कि इस मौके पर मैं अदिति जी को एक बहुत सुंदर और महंगी साड़ी भेंट करना चाहती हूँ ताकि वे सदैव मुझको याद रखें । मेरे पति ने पूर्ण सहमति दे दी और मैंने उनके लिए शानदार कांजीवरम की साड़ी खरीदी।

    साड़ी देते समय मैंने कहा - "मैम, आप जब भी इसे पहनेंगीं मुझे याद जरूर करेंगीं। "

    उन्होंने कहा -"तुमको इतनी महंगी साड़ी नहीं लानी चाहिए थी। याद दिलाने के लिए महंगी चीज की जरूरत नहीं होती। बहुत छोटी छोटी चीजें भी बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।"- मैं उनकी बात को समझ नहीं पायी।

       हमारे जाने के दिन आ गए। ठीक जाने की सुबह वह अपने हस्बैंड के साथ मेरे घर आयीं और उन्होंने एक छोटा सा डिब्बा मुझको भेंट किया और मुस्कराकर कहा -"अनुराधा, देखना मैं तुमको रोज सुबह-शाम याद आया करूँगी।"

       मैंने जल्दी में डिब्बे को एक बक्से में रख लिया क्योंकि मुझको उसको खोलने के लिए अब अवसर ही नहीं था। हम दूसरे शहर में चले गये। काफी समय बाद वह डिब्बा मुझको एक बक्से में मिला। मैंने बड़ी ही आतुरता से उसको खोला तो पाया कि उसमें एक छोटा सा प्लास्टिक का आटा निकालने का स्कूप रखा हुआ है। मुझे समझ में नहीं आया अदिति मैम ने इतना छोटा और सस्ता गिफ्ट मुझको क्यों दिया होगा!इससे अच्छा तो होता कि वह मुझको गिफ्ट ही नहीं दी देतीं। खैर मैंने उस आटे के स्कूप को अपने आटे के बर्तन में दैनिक प्रयोग के लिए रख दिया। सचमुच, मेरे लिए यह बहुत बड़े आश्चर्य का विषय है कि रोज सुबह और शाम आटा निकालते समय आज भी मुझको अदिति दी की याद आ जाती है। मैं उनको कभी भूल नहीं पाती हूँ। अब मुझे समझ में आया है कि उन्होंने इतना छोटा व इतने कम पैसे का पर इतना महत्वपूर्ण गिफ्ट मुझको क्यों भेंट किया था। सचमुच अदिति जी आप अद्भुत व्यक्तित्व की धनी हैं।

नाराजगी

 अप्पू एक बहुत ही प्यारा बच्चा है। मोहल्ले के नुक्कड़ पर उसके पिताजी की किराना की दुकान है। मैं सालों पहले जब इस मोहल्ले में आयी तो अप्पू छोटा सा बच्चा था। तब वह ठीक से बोल भी नहीं पाता था। उसके पिताजी अक्सर उसको दुकान पर ले आते थे। मैं सुबह शाम जब भी स्कूल से पढ़ाकर लौटती तो मेरी आँखें बरबस दुकान की ओर चली जातीं थी शायद इसका कारण अप्पू का आकर्षण था। मुझे देखकर वह शरमा कर अपनी आँखें नीची कर लेता था मैं जब कभी दुकान पर जाती तो अप्पू से बातचीत की कोशिश जरूर करती। धीरे-धीरे हमारे बीच एक मधुर संबध सा स्थापित हो गया था । अब वह कुछ बड़ा भी हो गया। वह अब मुझे देखते ही नमस्ते करने लगा। दुकान के कार्यो में वह अपने पिताजी का हाथ भी बटाने लगा। दुकान से चीजें वह फटाफट ढूॅंढ कर लाता और थैलियों में भरकर तौलने की भी कोशिश करता। शिक्षक होने के नाते मुझे यह सदैव लगता था कि वह कुशाग्र बुद्वि बालक है। एकदिन मैंने उसके पिताजी से कहा कि वह अप्पू का किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करवा दें। अप्पू बड़े ध्यान से मेरी बातें सुनता रहा फिर बाल सुलभता से बोला-”आंटी, मैं आपके ही स्कूल में पढॅ़ूंगा. मुझे आप पढ़ायेंगी न? बड़े होकर मैं भी आपकी तरह बच्चों को पढ़ाने स्कूल जाऊॅंगा ।" मैंने धीमे से हामी भर ली पर मैं जानती थी कि अप्पू को मेरी क्लास में आने में अभी कई वर्ष लगेंगे। फिर एकदिन उसके पिताजी ने अप्पू का दाखिला सचमुच हमारे स्कूल में करा दिया। साल पर साल बीतते गये। अप्पू सदा मुझसे पूछता कि मैं उसको कब पढ़ाऊंगी? मैं उसकेे भोलेपन पर मुस्करा देती। फिर एकदिन वह वक्त भी आ गया जिसकी अप्पू सालों से प्रतीक्षा कर रहा था। अब वह मेरी ही कक्षा में था। वह बहुत खुश था। उसकी वर्षो की मनोकामना पूरी हो गयी थी। मुझे भी मन ही मन अप्पू की इच्छा पूरी होने की खुशी थी।आखिर उसने इस बात का वर्षो तक इंतजार किया था।अप्पू क्लास के सभी बच्चों और अपने दोस्तों के बीच मेरी बहुत की तारीफ किया करता था।मेरी थोड़ी सी भी बुराई सुनने को वह तैयार न था।कभी कभी तो वह इस बात पर कक्षा में झगड़ा भी कर डालता था। अर्धवार्षिक परीक्षायें हुई। मेरे विषय संस्कृत में अप्पू के बहुत अच्छे नंबर आये थे। किन्तु उसका कक्षा के सबसे अच्छे विद्यार्थी से एक नंबर कम था। अतः वह अपनी कापी लेकर मेरे पास आया और उसने बड़े ही अपनेपन से मुझसे कहा-”मैडम, मेरा एक नंबर बढ़ा दीजिए न।“ 

” क्यों अप्पू? तुम्हारे तो बहुत अच्छे नंबर आयें हैं ।“ मैंने आश्चर्य से पूछा। वह कुछ नहीं बोला। उसको पूरी आशा थी कि मैं उसका नंबर बढ़ा दॅूंगी। काफी देर बाद उसने मुझसे अपने मन की बात बताई। मैं खिलखिलाकर हँस दी और फिर उसे समझाया-”अप्पू, तुम्हें और ज्यादा मेहनत करनी चाहिए। मात्रा कक्षा में सबसे ज्यादा अंक आ जाने से कोई फायदा नहीं है। तुम्हारा मुकाबला तो ढेर से अन्य विद्याथिर्यो से भी है जिनको तुम जानते भी नहीं हो और शायद वे कहीं और पढ़ रहे हैं। ”

तब अप्पू ने रोआंसा होकर कहा-”मैडम, बस एक अंक की ही तो बात है। बढ़ा दीजिए न।“ उसकी बात सुनकर मैैंने उसे फिर समझाया कि प्रश्न एक अंक का नहीं है। असल में बात सिद्वान्त की है और इसलिए मैं अंक नहीं बढ़ा पाऊंगी। तब अप्पू ने जिद छोड़ दी और वह कापी जमा करके अपनी सीटमें बैठ गया। मुझे लगा कि उसको मेरी बात समझ में आ गयी है। रिजल्ट निकले सात आठ दिन बीत गये। अप्पू कक्षा में प्रथम आया किन्तु रिजल्ट के बाद एक दिन मुझे महसूस हुआ कि अप्पू अब मेरे सामने नहीं आता है। वह कक्षा में मुझसे निगाहें भी नहीं मिलाता है। उसने मुझे नमस्ते करनी भी करनी छोड़ दी है। उसमें आये परिवर्तन के लिए मैं हैरान थी। मैं समझ नहीं पा रही थी अप्पू इस प्रकार का व्यवहार क्यों करने लगा है। उसने हमारे घर भी आना छोड़ दिया। हमारे घर के अन्य लोग जब उसको दिखाई देते तो वह उनको भी अभिवादन न कर देखा अनदेखा करने लगा। अप्पू में आये इस बदलाव को देखकर मैं चक्कर में पड़ गयी। उसे पता नहीं क्या हो गया था। क्लास में वह खोया-खोया सा दिखाई पड़ता था। उसके व्यवहार में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? यह मेरी उत्सुकता का विषय था।

फिर उस रात न जाने मेरे मन में कैसे एक विचार आया। मुझे लगा मैंने अप्पू की उदासी का कारण जान लिया है। मैंने फिर चैन की नींद ली। दूसरे दिन शाम को अप्पू अपने पिताजी के साथ दुकान में बैठा था। मैं थैला लेकर उसकी दुकान में पहुँची। मैंने अप्पू से एक किलो चीनी देने को कहा। अप्पू जब चीनी तौल चुका तो मैंने अप्पू से कहा-”अप्पू, मेरी थैली में थोड़ी ज्यादा चीनी भरो।मुझे लग रहा है कि चीनी कम है।"

तब अप्पू बोला-”नहीं मैडम, चीनी तो पूरी है। मैंने कम नहीं तौली है।“

”पर अपनी जान-पहचान वालों को तो तुम्हें कुछ ज्यादा तौलना चाहिए।“ मैंने उसे समझाते हुए कहा।

”पर मैडम, हमारी दुकान में तो सब जान पहचान वाले ही ग्राहक आते हैं। यदि मैं ज्यादा चीजें तौला करूंगा तो हमको कुछ समय में ही घाटा हो जाएगा। हम सभी को पूरा और अच्छा सामान बेचते हैं।” उसने बड़े ही आत्म-विश्वास से कहा। ”बिल्कुल ठीक अप्पू! तुम तो बहुत समझदार हो। पर अब तुम यह बताओ कि जब तुम अपनी दुकान में किसी को भी ज्यादा चीज तौल कर नहीं देते हो तो तुम यह उम्मीद कैसे करते हो कि शिक्षक अपने छात्रों को उचित से ज्यादा नम्बर दे दे? तुम मुझसे इसीलिए नाराज हो न कि मैंने तुम्हारा एक अंक नहीं बढ़ाया था?“- मैंने अप्पू से प्रश्न किया।

अप्पू ने शर्म से अपनी ऑंखें नीचे कर ली। फिर उसने आँखें झुकाए हुए कहा - "मैडम, मुझे अपनी गलती समझ में आ गई है। सच, आपने मेरी आँखें खोल दी हैं।“ फिर उसने अपनी पलकें उठाकर मुझे देखा।अपनी पुरानी मुस्कराहट के साथ।अब उसकी आँखों में कोई शंका या नाराजगी न थी। दूसरे दिन से अप्पू पहले की भांति ही प्रफुल्लित था।


रविवार, 9 अगस्त 2020

दादाजी

 दादाजी


        दादाजी सत्तर साल के हो चुके हैं पर हैं बिल्कुल फिट। आज भी वे सारे कार्यों को बड़ी बखूबी से निभाते हैं। इंटरनेट की दुनिया में फेसबुक हो या व्हाट्सएप या फिर गूगल सर्च, दादा जी का कोई मुकाबला नहीं है। मैं अक्सर देखा करता हूँ कि दादा जी अपने दोस्तों को उनकी समस्याओं के समाधान बारे में अक्सर बताया करते हैं । इसीलिए उनके सारे दोस्त उनको एक अच्छा गुरु भी मानते हैं। 

    इतने ज्यादा स्मार्ट दादाजी होने के बाद भी उनकी घर में की जाने वाली हरकतें मुझे पसंद नहीं थी। डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए दादा जी जब बिस्कुट को चाय में डुबो डुबो कर खाते हैं तो मुझको यह कतई भी अच्छा नहीं लगता था। 

        "यह भी कोई खाने का तरीका है ?" - मैं मन ही मन सोचता था। 

         जब कोई बाहर वाला आदमी डाइनिंग टेबल पर बैठा हुआ हो और दादा जी अपने बिस्कुट चाय में डूबा कर खा रहे होते थे तो स्थिति बहुत ही असामान्य सी हो जाती थी। चाय पीने का तो दादाजी को अत्यधिक शौक है। कितनी ही बार भी चाय दे दी जाए वो कभी मना नहीं करते हैं। पर बेचारे शुगर के मरीज होने के कारण वे चाय में चीनी नहीं लेते थे। सुबह की चाय हो या फिर दोपहर की चाय या फिर खाना खाने के बाद तुरंत पीने की चाय वो कभी मना नहीं करते थे।पर हद तो तब हो जाती थी जब खाना खाने के तुरंत बाद भी यदि वो चाय पीते तो साथ में बिस्कुट जरूर मांगते थे। मैं पूछता था -" दादाजी, आपने अभी तो खाना खाया है अब आप फिर बिस्कुट खाने बैठ गए ?"

    दादाजी हँस कर कहा करते थे - " बेटा तुम नहीं समझोगे ! यह बुड्ढों की बातें हैं। जब तुम बड़े हो जाओगे तो शायद बहुत सारी बातें तुम को समझ में अपने आप आ जायेंगी। " - बस यूँ ही हँस कर वे बातों को टाल दिया करते।

    फिर एक बार छोटी बुआ घर में आयीं। खाना खाने के तुरंत बाद दादा जी ने चाय की डिमांड की थी । बुआ ने उनको चाय बना कर दी और मुझसे कहा -"अरविंद जाओ मीठे बिस्कुट का पैकेट दादा जी को ला कर दे दो। "

     मैंने कहा बुआ से कहा - "उन्होंने तो अभी खाना खाया है। अब वह बिस्कुट लेकर क्या करेंगे ? उनको भूख कहाँ लगी होगी? "

    बुआ ने हँस कर कहा - "तुम नहीं समझोगे ।"

     मैंने कहा - "बुआ समझा दो न ?"

     तब बुआ जी ने कहा -"दादा जी की चाय फीकी होती है । इसलिए वह एक या दो बिस्कुट चाय के साथ लेकर अपने मुँह के जायके को ठीक कर लेते हैं। इस प्रकार कम चीनी लेकर वे डॉक्टर की राय का पालन कर लेते हैं। सच में अपने ऊपर अंकुश लगाना बहुत मुश्किल काम है।"

     तब मैंने बुआ से पूछा - "बुआ, एक बात और बता दीजिए। ये दादाजी बिस्कुट को चाय में डूबा कर क्यों खाते हैं ? मुझे यह बड़ा अटपटा लगता है।"

     बुआ जी ने हँस कर कहा - "यह बात तुमको तब समझ में आएगी जब तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारे दाँत टूट गए होंगे ।" और फिर बुआ जी जोर जोर से हँसने लगी।

          तब मैं मन ही मन सोचने लगा कि मुझे अपने को दादाजी की स्थिति में रखकर ही दादाजी के बारे में विचार बनाना चाहिए। यदि मैं जीवन में ऐसा करूँ तो शायद मुझको बहुत सी बातें अपने आप समझ में आ जायेंगी। आखिर लोगों की कुछ अपनी निजी समस्याएँ भी तो होती हैं !

हिसाब बराबर

 हिसाब बराबर


         एसी चेयर कार के उस कंपार्टमेंट में अपनी सीटों को ढूँढते हुए जब मेरी नजर उन पर पड़ी तो मैं तो तुरन्त उनको पहचान गया। वह हमारे शहर में एक प्रतिष्ठित सरकारी पद पर कार्य कर चुके थे। जब उनका हमारे शहर से ट्रांसफर हुआ था तो उनको फेयरवेल भी हमारे घर से हुआ था। उनसे इस शुभ अवसर पर जब बातचीत हो रही थी तो मेरी माता जी ने मेरा परिचय उनसे करवाया और कहा था - "पांडे जी, यह मेरा बेटा है और इसी वर्ष इसने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की है। यदि आपका आशीर्वाद मिल जाए तो अवश्य ही कोई अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाएगी।"

        उस समय तो मैं अपनी माताजी से कुछ नहीं बोला पर बाद में मैंने अपनी माता  जी को समझाया -"अम्मा, मुझे कोई क्लास फोर्थ की नौकरी तो मिलने वाली नहीं है। जो मात्र सिफारिश से दे दी जाये। मुझे तो यूपीएससी से इम्तिहान पास करना पड़ेगा तभी कोई नौकरी मिलेगी। इसलिए आप मेरी नौकरी के बारे में कभी भी किसी से कुछ भी ना कहें।"

      बात आई और चली गई। फिर मुझे यूनिवर्सिटी में एक पद प्राप्त हो गया और सौभाग्य से मुझको एक ट्रेनिंग के लिए भी सेलेक्ट कर लिया गया। यह ट्रेनिंग टोक्यो जापान में होने वाली थी। पर मेरे पास तो पासपोर्ट ही नहीं था। अब जल्दी पासपोर्ट बनवाने के लिए मेरे लिए जरूरी था कि मैं अपने डाक्यूमेंट्स को किसी बड़े अधिकारी से सत्यापित कर के भिजवाऊँ। मैं बहुत परेशान था। 

     तब माताजी ने कहा यह तो बहुत आसान है तुम पाण्डे जी के पास चले जाना वह तुम्हारा काम कर देंगे। मैं उनके घर में गया और मैंने सारी बातें उनको बतलाईं। तब उन्होंने मुझको प्रत्युत्तर दिया -"बेटा, यह तो ठीक है। पर इस कार्य को वही कर सकता है जो कम से कम पिछले दो वर्ष से तुम को भली भांति जानता हो।"

     मैं उनकी बात का आशय समझ गया और धीरे से उनके घर से चलता बना। खैर ईश्वर एक रास्ता बंद करता है तो कहते हैं कि वह दूसरा रास्ता खोल देता है। यही कुछ मेरे साथ भी हुआ। मेरा पासपोर्ट बन गया किसी दूसरे अफसर की अनुशंसा पर। मैं जापान से लौट कर वापस आया तो पता चला कि मेरा सेलेक्शन यूपीएससी में हो गया है। फिर आने वाले समय में मैंने न जाने कितने लोगों का पासपोर्ट हेतु वेरिफिकेशन किया। आज इतने साल बाद आज ट्रेन में उनसे सामना न जाने कितनी बीती बातों की याद दिला रहा था। मैंने उनको देखा और अनायास ही अनदेखा भी कर दिया। जाने कुछ घटा ही ना हो।

       पूरी यात्रा के दौरान मैं उनके ऊपर निगाहें बनाए रखा और मैंने देखा वह बड़ी असमंजस में हैं। लगातार बीच बीच में वे मुझको देख रहे थे। मैं मन ही मन उनकी दुविधा का आनंद लेता रहा। आखिर में ट्रेन गंतव्य में पहुंची। स्टेशन आ चुका था और मुझको लेने के लिए मेरा स्टाफ चलती ट्रेन में चढ़कर यह बताने के लिए पहुंच चुका था कि वे कितने कुशल हैं। अब पांडे जी की दुविधा चरण में पहुंच चुकी थी। वह अपने को रोक न सके। 
   उन्होंने खड़े होकर पूछा -"आप बिशन हो ना? 

      मैंने सपाट आँखों से उनकी ओर को देखा और कहा -"  जी मैं बिशन स्वरूप, एसएसपी ! शायद आज आपने अखबार में मेरे आने का समाचार देख लिया होगा। इसीलिए शायद आप मुझे पहचान रहे हैं।"

     फिर बिना उनकी ओर देखे अपने स्टाफ की ओर अग्रसर हो गया। मैंने स्टाफ को बताया कि कौन कौन सा मेरा सामान है। स्टाफ के जय हिंद सर, जय हिंद सर के अभिवादन के बीच मैंने पांडे जी की आवाज सुनी। वह कह रहे थे -"मैं, जेके पांडे, एडीशनल डायरेक्टर................"

     मैंने उनकी बातों को अनसुना कर दिया और दरवाजे की ओर बढ़ चला। साथ में चल रही मेरी बहन ने मुझसे कहा-    " आपने पहचाना नहीं उनको ?  वे तो पांडे अंकल हैं।"

    शायद पांडे जी हमारे पीछे कान लगाए हमारी बातें सुन रहे थे। यह जानकर मैंने थोड़ी जोर से कहा - "हमारे मैनुअल में बताया गया है कि आप उसी आदमी को पहचानते हैं जिसको आप कम से कम दो साल से जानते हों। मैं तो निजी रूप से उनको एक दिन के लिए भी नहीं जानता हूँ।"

       मैं पांडे जी के चेहरे पर आते हुए उतार-चढ़ाव को नहीं देख पाया क्योंकि वह मेरे पीछे से थे। पर मैंने अपना हिसाब ईश्वर की कृपा से पूरा कर लिया था। फिर थोड़ी ऊँची आवाज में कहा -" तुम नहीं समझोगी। यह एक पुराना हिसाब था जो आज बराबर हो गया है।"😊😊

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

हैरानी

★■हैरानी■★

जिंदगी 
तुझसे हैरान हूँ
बार बार
इस बात से 
परेशान हूँ
ये दिलकश 
जिंदगी के लम्हे
क्यों 
इस तरह गुजार दिये।
कुछ पल
शिकायतों में
और कुछ
आशंकाओं में
निकाल दिये ।
क्यों समझ न सका
कुछ भी तो नहीं
यहाँ अपना
आया हूँ यहाँ मैं 
कुछ पल 
किसी से उधार लिये !
ये सामान
जो किसी का भी नहीं कभी 
इकट्ठा
कर बैठा हूँ क्यों 
इतने अरमान लिये ।
कल सुबह की तो
खबर नहीं
क्यों जीता रहा
अब तक 
इतना अभिमान लिये ?
अब जब 
ज़िंदगी का अर्थ समझा 
जड़ व चेतन का 
फ़र्क़ समझा 
शायद देर हो चुकी 
तभी तो कहते हैं आयु व बुद्धि में
साथ नहीं होता।
बस ख़ुशी है अब इतनी
जाऊँगा यहाँ से
बिना कोई अरमान लिये😋😋

हेम/  16.04.2018
डाक्टर हीरक भट्टाचार्य की डेंटल क्लीनिक से 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

भाषा

★★भाषा ★★

खराब हूँ
क्या करूँ
अपनी ही भाषा बोलता हूँ।
सबकी बातें
एक ही तराज़ू में
तौलता हूँ ?
नहीं कर पाता हूँ
कहीं भी काट छाँट
सच के लिये
क्यों रखता हूँ 
एक सा ही बाँट ?
ऐसे कहीं
जिंदगी चलती है ?
दूसरे की भाषा भी तो
यहाँ समझनी पड़ती है  !
यह जिंदगी है
जनाब !
वक्त व स्थान के हिसाब से
यहाँ भाषा 
पल पल बदलती है
अपनी ही भाषा का 
अनचाहा मोह 
अच्छा नहीं है यहाँ
नफे नुकसान को
समझे बिना
सच बोलना
अच्छा  है कहाँ ?
समझदार हो
समझ लो जरा
रोम में रोमन बोले बिना
सफलता मिलती है कहाँ ?😎😎
पर ये लोग हैं
हर हाल ही में 
बोलते ही रहते हैं
खराब ही रहता हूँ
तब भी 
क्या करूँ
जब चेहरों को
देख कर मैं यहाँ बोलता हूँ !!🙁🙁

हेम/ 08.04.2018

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

अद्भुत अँधेरे

माँ लौटा दे मुझको
अंधेरे से वे पल 
नाभि से जुड़ा 
जब तेरी शय्या पर पड़ा था
धक धक 
वो धक धक 
तेरी दिल की धड़कनों का
मैं ने न जाने कितना 
अद्भुत संगीत सुना था 
खन खन वो खन खन
चूड़ियों की वो खन खन
हँसी का वो अमृत
न जाने वो मैंने कब कब पिया था 
माँ लौटा दे मेरे 
अँधरे से वो पल !! 
सूनसान था
छाया था अँधेरा
ये कैसी थी दुनिया
ये कैसा था डेरा
न डर था कहीं भी
न कोई था संकट
कहाँ कब पता था
तू भूखी थी सोयी
नहीं ये भी पता था
तू खुश थी या रोयी
मुझे तो तेरा स्पर्श मिला था
तेरे छूने पर मैं इतरा के हिला था !!
माँ लौटा दे मेरे
अँधेरे से वो पल
जब ममता में तेरी
मैं पल पल जिया था !
कहाँ से मैं आया 
कैसे मैं आया 
कब ये मिला था 
मुझे यह स्पंदन 
कैसे बना मैं
माटी से चंदन
सुनी थी कब तू ने 
मेरे दिल की पहली धड़कन 
छुआ था कब मुझको
जब मैं पहली बार हिला था 
मारी थी कुलांचें 
बताने को तुझको 
प्रकट हो गया हूँ 
जताने को तुझको
कोई लौटा दे मेरे
वे सुनहरे अँधेरे
जिसमें नहीं थे
साँझ और सवेरे !!
है कैसी पहेली
है कैसी ये दुनिया
शुरू में अँधेरा
अन्त में भी तो अँधेरा !!
अँधेरे से अँधेरे का
अजब सिलसिला है
पर कभी क्या कोई
उससे भी मिला है ??

हेम/23.03.2018
I

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

फर्क

बात बात में
फर्क होता है
एक बात से दर्द
कहीं बात का 
मलहम सा होता है
कोई हाल चाल
जब कभी पूछता है
एक में समाचार जानने की उत्सुकता
दूसरे में किसी का ख्याल होता है ।
इसीलिए कहता हूँ 
बात बात में
फर्क होता है।
कहीं झूठी स्वागत की हँसी
कहीं जबान पर दिखावटी सा दर्द
पर हर कोई क्या कभी
अपना हमदर्द होता है ?
कोशिश करो
महसूस तो करो
तभी तो एक हाथ गरमजोशी से भरा
और एक हाथ सर्द होता है !
तभी तो बात बात में
फर्क होता है।
वैसे ही
जैसे हँसी हँसी में फर्क होता है
एक हंसी में आमंत्रण
एक में तिरस्कार होता है
एक हँसी से आनन्द
एक से फसाद होता है
एक हँसी से
महफ़िल खिलखिला जाती है
दूसरी हँसी
न जाने कितनों रुलाती है!
इसीलिए बात बात में
फर्क होता है।

हेम/19.12.207

रविवार, 10 दिसंबर 2017

मुस्कान


मुस्कान

क्या मैं थका हूँ
या फिर परेशान हूँ  
पल पल मैं देता
क्या इम्तिहान हूँ ?
कभी इस से 
कभी फिर उससे
या फिर सभी से भी 
नसीहतें लेता हूँ
जो 
जो भी देता है 
वह समेट लेता हूँ
कान से सुनकर
हाथ में लपेट लेता हूँ
काम का तो जेब में
बेकाम जमीन को भेंट देता हूँ
दूसरे के झूठ को भी
धीरे से समेट लेता हूँ
पर झूठे को कभी
झूठा नहीं कहता हूँ
बेवकूफ सा बन कर
बस मुस्कुरा देता हूँ
अपनी मुस्कराहट का 
मन ही मन मजा लेता हूँ
न जहर पीता हूँ
न उड़ेलता हूँ
नीलकंठ तो हूँ नहीं
पर कुछ कुछ झेल लेता हूँ
बुराइयों के बीच भी
अच्छाईयों से खेल लेता हूँ।

हेम/10.12.2017

मंगलवार, 6 जून 2017

*झूठ*
झूठ के पाँव नहीं होते
झूठ की यादाश्त भी नहीं
बहुत देर तक झूठ 
ग्रहण की तरह कभी
ठहर पाता भी नहीं
झूठ तो बर्फ है
पिघलना तो इसकी फितरत है
सच तो पानी है
बर्फ की जो हकीकत है
झूठ की खपच्चियों क्या कभी
क्या सच की
बल्लियां बन सकी हैं?
और इन बल्लियों पर
क्या विश्वास की कभी
हरी भरी बेल चढ़ी है?
झूठ की जीत नहीं होती
जीत कर भी
हारा होता है
अहम बहल सकता है
कुछ क्षण
पर सच ही प्यारा होता है
झूठ की औलाद भी
झूठ ही होती है
किसी ने सच ही कहा है
जीवन में जैसी बुवाई
वैसी ही कटौती है
झूठ को तो होती है
फिर और झूठ के
सहारे की जरुरत
लिखो कुछ भी रेत में
शाश्वत रह सकती क्या
विश्वास की कभी कोई इबारत ?
सच
तुम तो सयाने हो
बात देखकर बदल देते हो
झूठ के आँगन को भी
बनावट से सहेज लेते हो
पर सच छिपता है कहीं?
किसी कोने में
नजर आ ही जाता है
झाड़ू सा
खुदबखुद कहीं
बातों में टपक जाता है
और एक हम भी तो हैं
नासमझ
पर पहले से नहीं !
थोड़ा खेल
वख्त हमें भी सिखा बैठा है
हर दिखावट का जवाब
अच्छा अभिनय ही तो है
यह बता बैठा है
इसलिये वजूद के लिये
किरदार निभा रहा हूँ
न जाने कितनी बार
अपने मन को मार रहा हूँ
फुरसत के क्षणों में
जब बातों की तस्वीर
मन में उकेरता हूँ
तुम नजर आते हो
खिलखिलाते से
एक अच्छे यार की तरह
पर मेरी कामयाबियों पर
तेरे साथियों के चेहरे का अवसाद
कोने में खड़ी झाड़ू की तरह
क्यों सच को है जता जाता !
पर रिश्तों की
मजबूरियों हीं तो हैं
मैं भी अपनी हँसी लिये
सबके गले लग जाता हूँ।
यादों का जहर

क्या ज़हर
यादों का भी होता है ?
सदाबहार के बीज की तरह
कहीं भी
किसी भी जगह

उग जाता है।
कभी दिल, कभी दिमाग
कभी आँखों, कभी जुबान
या फिर चेहरे से
बार बार टपक आता है।
खुशी के हर पल को
धीरे से अपने वजूद से ढक लेता है।
हर बीज से एक पेड़
हर पेड़ से हज़ारों बीज
अंतहीन सिलसिला
जो कभी नहीं रुकता है!
हाँ जहर
यादों का भी होता है।

१७-०५-२०१७/हेम
**थोड़ा**

गुस्सा कितना भी आयेपर दिल में प्यार जरूरी हैजीवन को यदि जीना हो तोथोड़ी तकरार जरूरी हैरिश्ते तो रिश्ते होते हैंदिल को कौन समझता हैइजहार को कोई क्या जानेथोड़ा उपहार जरूरी हैतर्कों की बातें नहीं करोपूरा सच तो बेमानी हैसुख से जीवन जीना हो तोथोड़ा झूठ जरूरी हैहीरा देखा पन्ना देखादेखा है नवरत्नों कोसोने के सिंहासन में भीथोड़ा ताँबा तो जरूरी है।
१८-०५-२०१७/हेम

ये कविता मैं अपनी बहन डॉ दीपा धवन के वाल से चुरा रहा हूँ जो उन्होंने लिखी है। इसके भाव मुझे इतने अच्छे लगे कि मैं इसमें बिना अधिकार कुछ जोड़ गया हूँ। क्षमा के साथ प्रस्तुत है

"रिश्तों का सच"

कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं

जी चाहता है कुछ नाम रख लूँ

क्या पता किसी ख़ास घड़ी में 

पुकारने की जरूरत पड़ जाए

जब नाम वाले 

सभी रिश्ते नाउम्मीद कर दें 

और बस यह एक नाम 

आखिरी उम्मीद बन जाये

कुछ रिश्ते बेकाम होते हैं

जी चाहता है

 काम तमाम कर दूँ 

और उनकी परछाइयों को 

यादों के आकाश सेधुंए सा उड़ा दूँ 

जो धीरे-धीरे उड़ कर 

अंधेरों में गुल हो जायें

बोझिल से ये रिश्ते 

ज़िंदगी को ओर बोझिल न कर

जिंदगी से अदृश्य हो जायें

कुछ रिश्ते बेशर्त होते हैं 

बिना किसी अपेक्षा केप्रस्फुटित होते हैं

जी चाहता है अपने जीवन की सारी शर्तें 

उन पर निछावर कर दूँ 

जब तक जिऊँ

बेशर्त इन्हें निभाऊँ

जीवन के हर पल

इनको ही गाऊँ

कुछ रिश्ते बासी होते हैं 

गर्म करने परसूखे व कड़कड़े हो जाते हैं

नष्ट हो जाते हैं

या फिर खोलने पर

बास भर जाते हैं

जी चाहता है 

इस बन्द थैली को

अतीत के कूड़ेदान में फेंक दूँ 

ताकि मन का वातावरण 

दूषित होने से बच जाए

कुछ रिश्ते बेकार होते हैं 

जैसे दीमक लगे दरवाज़े 

जो भीतर से खोखलेपर बाहर साबूत से दिखते हैं

जी चाहता है 

दरवाज़े उखाड़ करआग में जला दूँ 

और उनकी जगह शीशे के दरवाजे लगा दूँ 

ताकि जो भी जिंदगी में आये

आर पार दिख जाये

न फिर दरवाजा टूटेना 

दीमक लग पाये

कुछ रिश्ते शहर से होते हैं

जिसमें अनचाहे भी ठहरे होते हैं

कहाँ-कहाँ से आते हैं

फिर न जाने कहाँ चले जाते हैं

इनका अपना रास्ता है

क्षण भर को ही सही हमारा इनसे वास्ता है

कुछ चाहने से पहलेचले जाते हैं

एक नया अनुभव दे जाते हैं

कुछ रिश्ते बर्फ से होते हैं 

आजीवन जमे रहते हैं 

जी चाहता है 

इस बर्फ की पहाड़ी पर चढ़ जाऊँ

और अनवरत एक मोमबत्ती जलाए रक्खूँ

ताकि धीरे-धीरे सही

ज़रा-ज़रा-से बर्फ पिघलती रहे

फिर देख सकूँ 

अंदर क्या छिपा रखा है

कुछ रिश्ते अजनबी होते हैं

हर पहचान से परे 

कोई अपनापन नहीं 

कोई संवेदना नहीं

जी चाहता है 

शायद कुछ भी नहीं चाहता है

इनके लियेक्यों जियूँ व क्यों मरूँ

कुछ रिश्ते खूबसूरत होते हैं 

इतने कि खुद की भी नज़र लग जाती है

जी चाहता है इनको काला टीका लगा दूँ 

लाल मिर्च से नज़र उतार दूँ 

न जाने कब कहाँ किसकीनज़र लग जाये 

इन्हेंजी चाहता है पलकों मेंछिपा लूँ 

इनकोकुछ रिश्ते बेशकीमती होते हैं

सुराहीदार गर्दन में सजेगहने से

नाजुक व खिलखिलाते हुए

खूबसूरत और अनमोल 

जिन्हें खरीदा नहीं जा सकता 

जी चाहता है इनको छिपा कर रखूँ

ताकि देखने वालों की ईर्ष्या से बचूँ

कुछ रिश्ते आग से होते हैं

कभी दहकते

कभी धधकते हैं

अपनी ही आग में जलते हैं

दूसरों को भी जलाते हैं

जी चाहता है पानी की बूंदें बरसा दूँ

न उसको जलने दूँ

न ख़ुद को जला दूँ

कुछ रिश्ते चाँद होते हैं

कभी अमावस 

कभी पूर्णिमा 

कभी अन्धेरा 

कभी उजाला 

जी चाहता है 

चाँदनी अपने पल्लू में बाँध लूँ 

और चाँद को दीवार पे टाँग दूँ 

ताकि कभी अमावस का 

अंधेरानहीं आ पाये रिश्तों में

कुछ रिश्ते फूल से होते हैं

खिले-खिले सुगंधित रहते बारह मास

जी चाहता है 

इनके सभी काँटों को चुन चुन कर चुरा लूँ

ताकि कभी कोई चुभन ही न हो

ज़िंदगी हरदम सुगन्धित रहे 

कोमल व खिली-खिली

कुछ रिश्ते ज़िंदगी होते हैं

खूबसूरत जीवन की तरह

बदन में साँस बनकर 

रगों में लहू बनकर

अनवरत बहते रहते हैं 

जी चाहता है हर पल चुरा लूँ इनका 

और ज़िंदगी चलती रहे यूँ ही

रिश्ते फूल, तितली, जुगनू, काँटे

रिश्ते चाँद, तारे, सूरज, बादल

रिश्ते खट्टे, मीठे, नमकीन, तीखे

रिश्ते लाल, पीले, गुलाबी, सफ़ेद, स्याह

रिश्ते कोमल, कठोर, लचीले, नुकीले

रिश्ते दया, माया, प्रेम, घृणा, सुख, दुःख, 

रिश्ते आग, धुआँ, हवा, पानी

रिश्ते गीत, संगीत, मौन, चुप्पी, शून्य, कोलाहल

रिश्ते स्वर्ग रिश्ते नरक

रिश्ते बोझ, रिश्ते सरल

रिश्ते मासूम, 

रिश्ते ज़हीनरिश्ते फरेब, 

रिश्ते जलीलरिश्ते जीवन, 

रिश्ते सपनेउपमाओं बिम्बों से सजे

संवेदनाओं से घिरे 

रिश्ते रिश्ते होते हैं 

जैसे समझोरिश्ते वैसे होते हैं

शनिवार, 9 जुलाई 2016

असमंजस

असमंजस

या तो तुम्हारी दुनिया इतनी बड़ी है
जिसमें  मेरा वजूद ही नहीं है 
या फिर सिमट कर  हो गयी इतनी छोटी
बीते पलों का कोई अक्स ही नहीं है .

या तो कसम खा रखी है तुमने  
सच को न आने दोगे लबों पर
या फिर अपने मुस्कराने के पीछे 
राजों को कहीं दफना दिया है.

या तो भूल चुके हो सब कुछ
यादों का कोई  बसेरा नहीं है 
या फिर कोशिशों से थक कर 
साँसों में अपनी छिपा के रखा है.

शनिवार, 2 मई 2015

अब नहीं बाबूजी

अब नहीं बाबूजी 
कहानी: हेम चन्द्र जोशी 
hanuman mandir.jpg के लिए चित्र परिणाम
शहर के मुख्य चैराहे पर स्थित उस हनुमान मंदिर से मेरी बहुत सी भूली बिसरी बातें जुड़ी हुई हैं। मैं बचपन में पिताजी के साथ अक्सर हर मंगलवार को मंदिर जाया करता था।
मेरे मन में सदा यही लालच रहता था कि मंदिर जाने पर ढेर सारा प्रसाद खाने को मिलेगा। आंखे बंद किए भगवान के सामने खड़े पिताजी को देखकर मैं अक्सर सोचता था कि वो आखिर भगवान से मांगते क्या हैं ? ऐसे मौकों पर मैं प्रसाद की थैली पर आंखे गड़ाए रखता था। पुजारी जी जब टीका व चरणामृत देने के बाद प्रसाद की थैली से मिठाई निकालते तो मुझे ऐसा लगता था कि मानो कोई मेरे हिस्से की मिठाई ले रहा हो।
फिर मैं धीरे धीरे कुछ बड़ा हो गया। मुझे अच्छे व बुरे काम में फर्क समझ में आने लगा। अब मैं अपनी छोटी बहन की चाकलेट भी कभी कभी मौका मिलने पर चुपके से निकाल कर खाने लगा था। जब बहन रो-रो कर सारे घर को सिर पर उठा लेती थी तो मुझे अपनी शैतानी पर बड़ा मजा आता था।
आखिर चोरी के बाद पकड़े जाने से बचने का अपना ही सुख था। पर जब बहन भगवान को साक्षी मानकर चोर को दण्ड देने की प्रार्थना करती तो मैं मन ही मन घबरा जाता था। मैं हनुमान जी से अक्सर माफी मांग कर बहन के  श्राप  से मुक्त होने की कोशिश करता था।
मंदिर जाने का यह सिलसिला कुछ ऐसा चला कि कभी टूटा ही नहीं। मंदिर के आसपास इकट्ठे होने वाले एक एक भिखारी, प्रसाद मांगने वाले लड़कों व ठेले वालों को मैं पहचानने लगा। यदि कहीं उनमें से कोई मुझे नहीं दिखता तो मेरी आंखे दूर तक उसको ढूंढती सी नजर आती। कुछ ऐसी ही हालत मेरे बारे में भी थी। मंदिर के आसपास के सभी लोग मुझे अच्छी तरह पहचानने लगे थे। प्रसाद के छोटे छोटे टुकड़ों को ठेलम-ठेल के बीच चारों ओर से लपकते हुए हाथों में बांटकर मुझे पुण्य लूटने की असीम संतुष्टि होती थी।
मैं नियमित रूप से एक विशेष मिठाई के ठेले से ही प्रसाद खरीदता था। 
मिठाई की दुकान.jpeg के लिए चित्र परिणाम
इसी ठेले वाले के साथ एक लड़का मुझे हमेशा काम करता दिखाई देता था। मैंने मन ही मन उसका नाम कालू रख छोड़ा था। ग्राहकों के चप्पल जूतों का ध्यान रखना, उनके हाथ पैर  धुलवाना आदि उसका काम था। इसी सुविधा के कारण उस ठेले पर ग्राहकों की कुछ ज्यादा ही भीड़ रहा करती थी।
मंदिर से लौटते समय मैं प्रसाद का एक छोटा सा टुकड़ा कालू को भी देता था। वह मुस्कुरा कर उसको मुंह में डाल लेता था। मेरे नियमित रूप से मंदिर आने पर कालू बहुत प्रभावित था। मेरे लिए उसके मन में अपार  श्रद्धा थी। उसकी बातों से पता चलता था कि उसकी हनुमान जी के प्रति असीम आस्था है। वह मुझे हमेशा संतुष्ट दिखाई देता था।
hanuman mandir.jpg के लिए चित्र परिणाम
मैं कभी कभी सोचता था कि मिठाई वाले ने क्यों अपने लड़के को इस काम में लगा रखा है ? वह क्यों नहीं उसको पढ़ाता-लिखाता है।
एक दिन मुझे मालूम चला कि वह मिठाई वाले का बेटा न होकर उसका नौकर है। कालू के पिता नहीं थे और उसकी मां उसकी देखरेख करती थी। कालू स्कूल भी जाता था और इधर-उधर काम करके अपना स्कूल का खर्चा भी चलाता था। मुझे कालू से थोड़ी हमदर्दी सी हो गई लेकिन मात्र मेरी हमदर्दी से कालू का पेट तो भर नहीं सकता था। कालू हमेशा मुझे काम करता मिलता था। पर मैं उसको कभी कुछ दे नहीं सका। वह तो मात्र प्रसाद के एक छोटे से टुकड़े को पाकर ही मेरे ऊपर निछावर था।
एक दिन मैने देखा कि कालू दुकान से दूर खड़ा है। मुझे दुकान वाले ने बताया कि उसने कालू को निकाल दिया है क्योंकि उसने दुकान में चोरी करने की कोशिश की है।
कालू ने उसकी बातों का प्रतिकार करते हुए कहा - "बाबू जी यह झूठ बोल रहे हैं। मैंने आज तक चोरी नहीं की है। ये मेरे काम के पैसे नहीं देना चाहते हैं इसीलिए ऐसा कह रहे है। आप मेरे पैसे दिलवा दीजिए नहीं तो मैं स्कूल की फीस नहीं जमा करवा पाऊँगा।" - उसने कातर दृष्टि से बहुत सी उम्मीद के साथ मुझसे कहा।
पता नहीं क्यों कालू की कातर वाणी भी मुझे भेद नहीं पाई। मुझे मन ही मन लगा कि कालू ने जरूर चोरी की होगी। मुझे कालू के भोलेपन में उसकी चालाकी दिखाई देने लगी। मैंने धीरे से मिठाई वाले से कहा -  "सच भाई! आज के जमाने में किस पर विश्वास किया जाए कुछ समझ मे नहीं आता है।"
मैं भगवान के दर्शन कर पुण्य लूटता हुआ घर वापस चला आया। इसके बाद कई मंगलवारों को मुझे कालू नजर नहीं आया। फिर महीनों बाद एक दिन कालू मुझे मंदिर के बाहर खड़ा मिला। मुझे देखते ही वह मेरी ओर चला आया। वह शायद मेरा ही इंतजार कर रहा था। उसने उदास आंखो से कहा - "बाबूजी मेरी मां बहुत बीमार है। कुछ रूपये उधार दे दीजिए। मैं आपका रूपया जरूर वापस कर दूंगा। आप तो भक्त है। सदा ईश्वर पर विश्वास करते हैं। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपको पैसा अवश्य वापस कर दूंगा।"
मैंने कालू को देखा। मुझे लगा वह सच बोल रहा है। मुझे चुप देखकर उसने कहा - "साहब आप पता नहीं कितने रूपये व मिठाई भगवान पर चढ़ा जाते हैं। ढेर सारा पेट्रेIल मंदिर आने के लिए खर्च कर डालते हैं।  एक पचास का नोट मुझे भी उधार दे दीजिए। साहब मेरी मां बच जाएगी।" - उसने व्याकुल आवाज में कहा। उसकी रोनी सी आवाज ने मुझे आहत तो कर दिया किन्तु उस पर पचास रुपया खर्च करने का औचित्य मेरा मन नहीं समझ सका। मैंने उसकी बात का कोई भी जवाब नहीं दिया। मैं आगे बढ़ने लगा तो वह मेरे पैरों में गिर पड़ा और बोला- "बाबूजी मेरी मां मर जाएगी। मैं अनाथ हो जाऊँगा। मेरे ऊपर कृपा करिये बाबूजी। मेरी माँ को बचा लीजिए।"
मैंने टालने के लिए मजबूर होकर कहा - " मेरे पास रुपए नहीं हैं।"
"बाबूजी प्रसाद चढ़ाने के रुपए ही मुझे उधार दे दीजिए। यह मेरे लिए वरदान के समान होगा।" - उसने कहा.
मैंने उसकी बातें अनसुनी सी कर दीं। मैं एक रूढ़ीवादी की तरह भगवान के दर्शन करने चला गया। जब मैं वापस आया तो वह प्रसाद का टुकड़ा प्राप्त करने के लिए वहां पर उपस्थित नहीं था। मेरा मन खिन्नता से भर गया। मुझे लगा कि मुझे उस पर विश्वास करना चाहिए था। उसकी सहायता करनी चाहिए थी। आज प्रसाद चढ़ाकर अवश्य ही भगवान प्रसन्न नहीं हुए होंगे। भगवान तो सदा दुखियों के साथ ही रहते हैं।
कालू की सहायता न करने का मुझे बेहद अफसोस था। कालू की पीड़ा मेरे मन में घर कर गई। हर मंगलवार को मैं अब मंदिर के आसपास कालू को ढूंढा करता था। मुझे बेहद अफसोस था कि मैंने उसकी सहायता नहीं की। उसके असीम विश्वास को मैंने ठेस पहुंचाई थी। अब मैं कालू की सहायता करके प्रायश्चित करना चाहता था।
फिर एक दिन जब मैं यात्रा के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा और टिकट खरीदकर मैं चाय पीने के लिए एक ठेले पर खड़ा था कि तभी किसी की आवाज आयी - "बाबूजी नमस्कार! कैसे हैं आप ?"
boot polisher.jpg के लिए चित्र परिणाम
मैंने देखा कि हंसता हुआ कालू मेरे सामने खड़ा है। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी मासूमियत नहीं थी। मुझे लगा कि वह एकाएक काफी सयाना हो गया है। एक छोटा सा बच्चा इतनी कम उम्र में इतना परिपक्व कैसे बन जाता है ? मेरे मन में कई प्रश्न उठने लगे। इससे पहले कि मैं कालू से कुछ पूछता उसने जाने की इजाजत मांगी। मैंने प्रायश्चित के कारण बटुवे से सौ रुपए का एक नोट कालू को देना चाहा पर कालू ने बड़ी ही गंभीरता से कहा - "बाबूजी मुझे अब रुपयों की आवश्यकता नहीं है। मैं भीख भी नहीं लेता। आज मैं अनाथ हूं। इस दुनिया में अकेला। उस दिन आपने मुझे रुपए नहीं दिए पर किसी और को भी मेरे ऊपर दया नहीं आई। थोड़े से पैसों के कारण मेरी मां चली गई। जब मनुष्य के दुख को मनुष्य नहीं समझ सकता है तो आप कैसे मान लेते हैं कि ऐसे मनुष्यों की पुकार को ईश्वर सुनता होगा ?"
"माफ करना मुझे।" - मैंने प्रायश्चित की अग्नि में जलते हुए सौ रुपए का नोट पकड़ाने का प्रयास किया।
"अब नहीं बाबूजी। यह नोट मेरी मां को अब वापस नहीं ला सकता।" - कालू ने सिर हिलाते हुए कहा और फिर वह धीरे से वापस मुड़ गया। मैंने डबडबाई आंखों से देखा कि कालू के कंधे पर आज स्कूल के बस्ते के स्थान पर पालिश वाला झोला लटका हुआ था। उसकी इस हालत के लिए मैं भी एक हद तक जिम्मेदार था। इस पीड़ा से विमुक्त होने का मेरे पास कोई मौका नहीं था।
boot polisher.jpg के लिए चित्र परिणाम

बुधवार, 25 मार्च 2015

थैंक्यू डाक्टर

थैंक्यू  डाक्टर
कहानी: हेम चन्द्र जोशी 




मेरा काम ही ऐसा है कि छोटे बच्चे मेरे पास आना पसंद नहीं करते हैं। जो आता भी है उसे जाने कितना बहला व फुसला कर उनके माता-पिता मेरे पास लाते हैं। मेरे क्लीनिक के आगन्तुक कक्ष तक तो अक्सर सब ठीक ठाक चलता है। पर डैंन्टल चेयर पर बैठते-बैठते करीब-करीब सभी बच्चे की सांसे थम सी जाती है।
एक दिन की बात है। एक व्यस्ततम दिन का कार्य निपटा कर मैं क्लीनिक से घर पहुंचा ही था। तभी मुझे लगा कि बाहर कोई आया है। मालूम करने पर पता चला कि एक महिला एक बच्ची के साथ खड़ी  हैं। वे बच्ची को दिखाना चाहती थी। मैं बहुत थका हुआ था। थोड़ी  देर आराम करने के बाद मुझे फिर देर रात तक शाम के मरीजों को देखना था। मुझे खीज सी आ गई थी। फिर भी मै यह सोच कर बाहर निकला कि मैं  उनको शाम को क्लीनिक में आने को कह दुंगा। बाहर निकलते-निकलते न जाने कहां से मुझे मां की नसीहतें याद आ गई। पहले दिन जब मैंने अपने घर में क्लीनिक खोली थी तो मां ने मुझसे कहा था - " बेटा अपने घर व क्लीनिक से कभी किसी को निराश वापस मत भेजना यही तुम्हारी सफलता की कुंजी होगी।" यह विचार आते आते मेरी थकान न जाने कहाँ  फुर्र हो गई । 
"नमस्कार डाक्टर साहब। मैं असमय कष्ट देने के लिए क्षमा चाहती हूं। पर क्या करुं। मेरी बेटी कुछ देर पहले स्कूल में गिर गई थी। इसका सामने का दांत थॊडा सा टूट गया है। यदि आप देख लेते तो बड़ी  कृपा होगी।" एक सधी आवाज में उन्होंने विनती की। 
मैंने बच्ची का दांत देखा और उनसे कहा कि घबराने की कोई बात नहीं हैं। साथ ही हिदायत दी कि यदि दांत में ठंडा गरम लगे तो दिखाने चली आयें  और ध्यान रखें  कि दांत काला न पड.ने पाये। यह कह कर  मैंने एक कागज में कुछ दवाईयाॅ लिख कर उन्हें  दे दीं।
कुछ दिन बाद वह बच्ची अक्सर रिक्शे में बैठी मुझे स्कूल जाते दिखती थी। मैं  समझ गया कि उसका घर कहीं आस पास ही है। करीब एक दो माह के बाद वह महिला फिर एक दिन मेरे क्लीनिक में उस बच्ची का हाथ थामे आई। बच्ची कुछ रूआंसी सी थी। उन्होंने पुरानी बात का ज्रिक करते हुए मुझे बताया कि दांत टूटी हुई जगह से हल्का सा काला पड.ने लगा है। 
उनकी चिंता को दूर करते हुए मैंने  कहा,- "घबराने की आवश्यकता नहीं हैं, दूध के इस दांत को तो टूटना ही है। बस इसे समय से पहले निकालना पड़ेगा । नया दांत फिर कुछ समय बाद अपने आप निकल आयेगा। 
वह नन्ही बच्ची सौम्या हमारी बातों को बडे. ध्यान से सुन रही थी। उसने झट से अपने मुहॅं पर हाथ रखते हुए कहा-  "अंकल मैं दांत नहीं निकलवाउंगी । मुझे बहुत दर्द होगा।" 
मै हंस पड़ा मैंने पूछा- "बेटा तुम्हारा तो अभी तक एक दांत भी नहीं  टूटा  है। फिर तुम्हें  कैसे मालूम कि बहुत दर्द होता है?"
सौम्या बहुत देर तक चुप रही। कई बार पूछने पर उसने बताया कि यह बात घर से चलते समय उसके भाई ने उसे बताई थी। तब मैंने कहा कि उसे भाई ने उससे झूठ कहा है। उसके बिल्कुल दर्द नहीं होगा। उसने बड़ी  मुश्किल से अपना मुहॅं खोला। इंजेक्शन की सुई देखते-देखते उसकी आॅंखे डबडबा उठी। फिर मेरे इंजेक्शन लगाने की कोशिश को उसने एक झटके में अपना हाथ चला कर विफल कर दिया। इंजेक्शन की सुंई टेढ़ी हो गई। आखिरकार हार मानकर उसकी मां  उसे लेकर वापस चली गई क्योंकि फिर सौम्या ने अपना मुहॅं खोला ही नहीं।
लेकिन सौम्या के इस प्रकार चले जाने से समाधान तो होना नहीं था। मजबूरन कुछ समय बाद सौम्या को दोबारा मेरे पास आना पड़ा अब दांत काफी नीचे तक खराब हो चुका था। उसका निकालना अब अति आवश्यक था वर्ना इंफैक्शन जड़ तक बढ़ सकता था। मैंने सौम्या की हिम्मत बढ़ाते  हुए कहा- "बेटे तुम्हारे बिल्कुल दर्द नहीं होगा। तुम कुर्सी के दोनों  डन्डों को जोर से पकड. कर रखो । मैं दवाई लगा देता हूं। यदि दवाई लगाने में दर्द हो तो तुम हाथ हिला देना। मैं समझ जाऊँगा। इसके बाद हम सोचेगें दांत उखाड़ना  है कि नहीं?’ 
सौम्या ने मेरे चेहरे को ध्यान से देखा। शायद वह यह पढ़ने की कोशिश कर रही थी कि मै उससे सच बोल रहा हूं या झूठ  ? फिर उसने एक नटखट मुस्कान के साथ हाथ बढ़ाते हुए कहा- "तब करिये  प्रौमिस ! आप दांत नहीं उखाड़ेंगे. "
"प्रौमिस बेटे।" - मैंने अपने गले को छूते हुए कहा। 
सौम्या ने ज्यों ही अपना मुहॅं खोला, मैंने फुर्ती से दायें हाथ में छुपाया हुआ इंजैक्शन उसे लगा दिया। मैं जानता था कि सौम्या को मात्र सुईं का भय सता रहा था अन्यथा एनैस्थिसिया के इंजैक्शन का दर्द तो साधारण इंजैक्शन से भी कम होता है। सौम्या जोर से रोने लगी। दर्द नहीं वह घबराहट का रोना था। अतः मैंने सौम्या के हाथ में एक दांत का टुकड़ा रखते हुए कहा- "तुम झूठमूठ रो रही हो। दांत को दवाई लगते ही अपने आप निकल आया और अब तुम्हारे कोई दर्द नही हो रहा है।"
सौम्या एक मिंनट को अचकचा गई। उसने उलट पुलट कर दांत देखा। फिर पाया कि वास्तव में उसके कोई दर्द नहीं हो रहा था। फिर वह क्यों रो रही है ? उसने रोना हल्का कर दिया। फिर उसने अपनी मां व मेरे चेहरे की ओर देखा। दोनों के चेहरो पर हल्की सी मुस्कराहट को देख कर वह समझ गई कि उसको धोखा दे दिया गया है। वह आश्चर्यचकित थी कि बिना दर्द के उसका दांत कैसे बाहर निकल गया अतः अब वह दुगने वेग से रोने लगी। कुछ देर समझाने के बाद वह शान्त हो गई। अब तक मेरा इंजैक्शन काम कर चुका था। दांत की जडे. सुन्न हो चुकी थीं। मैं जानता था कि अब दांत निकालने पर सौम्या को को कोई दर्द नहीं होना था। मैने सौम्या से पानी का कुल्ला करने को कहा। फिर दांत की जड. में रूई लगाने के लिए मुहं खॊलनॆ को कहा। सौम्या की हिम्मत वापस आ गई। उसने दोबारा मुहॅं खोल दिया। अब मैंने  बड़ी  आसानी से उसका खराब दांत उखाड. कर बाहर कर दिया। सौम्या थोड़ी  घबराई जरूर पर असली काला दांत अब उसके हाथ में था। 
"यह क्या हैं अंकल ? " - उसने आश्चर्य से पूछा।
"बेटे, यह हैं तुम्हारा असली काला दांत जो गिर जाने से टूट गया था।" मैंने  हंस कर उत्तर दिया। 
"तो वह पहले वाला दांत ?" - वह धीरे से बुदबुदाई और फिर नाराज होकर बोली-  "अंकल, आपने दो बार मुझसे झूठ बोला है। साथ ही साथ आपने अपने प्रैामिस को भी तोड़ा है। जाइये  मैं  आपसे बात नहीं करती।"- वह रूठ कर बोली। 
थोड़ी  देर बातचीत के बाद उसकी मां वापस जाने को मुड़ी। उन्हॊने सौम्या से कहा- "बेटा अंकल से थैक्यू कहो। देखो तुम्हारा दांत ठीक हो गया।"

पर नाराज सौम्या ने बार बार कहने के बाद भी थैंक्यू नहीं  कहा। फिर अंत में बोली- " अंकल झूठ बोलते हैं और अपना वादा भी तोड. देते हैं। मैं इनको थैंक्यू नहीं कहूंगी।" 
मैं मुस्करा कर रह गया। उनके जाने के बाद मैं अपने काम में व्यस्त हो गया। इसके बाद सौम्या मुझे कई बार रिक्शे से स्कूल जाती दिखती रहती थी। पर जब भी उसका रिक्शा मेरे पास से गुजरता तो वह किसी बच्चे की ओट में छिप जाती। कभी कभी मुझे लगता था कि सौम्या से झूठ बोलकर कहीं मैने गलती तो नहीं की थी ? आखिर एक छोटी घटना से बच्चे का दिल इतना टूट सकता हैं मैं सोच भी नही सकता था।
इस बात की बीते छह-सात महीने हो गए थे।एक दिन मैं क्लीनिक में काम कर रहा था। तभी भड़ाक की आवाज के साथ क्लीनिक का दरवाजा खुला। मैंने देखा सौम्या दौड़ी चली आ रही हैं। मैंने नाराज होकर कहा- " यह क्या बदतमीजी हैं बेटे, दरवाजा इस तरह खोलते हैं क्या ?" 
"अंकल आप अपना सिर नीचे करिये । मुझे कान में एक जरूरी बात कहनी है।" - सौम्या ने एक मधुर आवाज में कहा। मैंने अपना कान नीचे कर दिया। सौम्या ने कान में कुछ न कहकर, धीरे से मेरे गाल को अपने नन्हे होठों से चूम लिया। फिर एक लिफाफा मेरे हाथों में थमा दिया। 
"यह क्या हैं सौम्या ? " -मैने आश्चर्य से पूछा। 
"खोलकर तो देखिये अंकल।" - सौम्या ने उत्तर दिया। 
लिफाफे के अन्दर सौम्या के द्वारा बनाया हुआ एक कार्ड था। जिसमे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था। - "थैक्यू डाक्टर।"
मेरे लिफाफा खेालते-खेालते सौम्या वापस भाग चली थी। मैंने सौम्या की ओर देखते हुए आवाज लगाई। - " यह किसलिए सौम्या ? "
मेरे प्रश्न पूछने तक वह दरवाजे के पास पहुँच चुकी थी। उसने पलट कर मेरी ओर देखा। फिर मुस्कुराते हुए अपनी अंगुली से छोटे से निकलते हुए दांत पर इशारा करके बोली- "इस सुन्दर दांत के लिए अंकल।" दूसरे ही क्षण वह वह भड़ाक से दरवाजा बंद करके बाहर चली गई। 
"यह सब क्या चक्कर था डाॅक्टर ? " - मेरे मरीजों व सिस्टर ने एक स्वर में आश्चर्य से मुझसे पूछा। 
"आप लोग नहीं समझेगें। एक नन्हें मरीज ने मुझे माफ ही नहीं किया वरन् मेरे विश्वास को कई गुना बढ़ा दिया हैं।"- मैंने  मुस्कराते हुए कहा और दुगने उत्साह से अपने काम में लग गया।
ये अजब सी चाहत है मेरी, कुछ बता सकता मैं नहीं. या तो चाहिए सब कुछ मुझको, या तो फिर कुछ भी नहीं.